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Kalpesh Yagnik


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चाहे उसे भारी फायदा मिले, तो भी 'लीडर' की हल्की बात धक्का पहुंचाती है

Kalpesh Yagnik|Nov 16, 2012, 14:33PM IST

एपल के प्रति उसके प्रशंसकों की जो आस्था है वह ईश्वर जैसी है। किंतु आज यह देखकर

शर्मिंदगी हुई कि ईश्वर भेड़चाल में शामिल हो गए क्योंकि उन्हें स्पर्धाÓ से कुछ डर लगा। कुछ

फायदा उठाने की सूझी!Ó

---                                                                             -लंदन के ब्लॉगर जॉन रैंडल

                                         2 नवंबर 2012 को आइपैड मिनी के लांच पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए

जब लीडरÓ की बात आती है तो सारी दुनिया एक-सा सोचने लगती है। लीडर नेतृत्व करने/देने वाला होता है। विकट समस्या है कि उसे केवल नेतृत्व करना होता है/होगा।   वह फॉलोअर/अनुयायी नहीं बन सकता। एक छोटा सा भी कदम नेतृत्व क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगा सकता है। लगा ही देता है। चाहे नेतृत्व को न कोई कहने जाए। न कोई समझ पाए। दुनिया की सबसे धनवान कंपनी एपल लंबे समय से टेक्नोलॉजी कंपनियों में शीर्षस्थ बनी हुई है। शुक्रवार, 2 नवंबर को जब उसने आइपैड मिनी लांच किया, तो रोम, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया और चीन में करोड़ों की तादाद में फैले उसके प्रशंसकों को गहरी हताशा हुई। वैसी ही, जैसी कि अमेरिका में हुई। इसलिए नहीं कि आइपैड मिनी में कोई कमी है। वह तो काफी प्रभावशाली गैजेट है। वैसा ही जैसा कि एपल का कोई भी प्रोडक्ट होता है। एपल केवल उपयोग करने वाले अंतिम व्यक्ति को ध्यान में रखकर ही हर मशीन तैयार करता है। निश्चित ही कारोबार के लिए। पैसे कमाने के लिए। शोहरत पाने के लिए। जैसा कि सभी व्यापार-उद्योग करते हैं। एपल के संस्थापक स्टीव जॉब्स ने भी संभवत: शुरुआत यही सोचकर की होगी। किंतु उनमें इनोवेशन की स्वाभाविक उत्कंठा थी। प्रयोग की सहज सोच और थी। और इन सभी को आकार देने का माद्दा था। कठोर क्रियान्वयन ने उन्हें और एपल को एक अनूठी जीवनशैली बना दिया। एक प्रेरक संस्थान बना दिया। उन्हें आविष्कार के लिए आयकनÓ माना गया। जबकि उन्होंने कभी कोई खोजÓ नहीं की। किंतु जो कुछ बनाया उससे लोगों को, उपयोग करने के दौरान, कुछ ऐसा अनुभवÓ मिला जिससे उनके प्रोडक्ट कृतियांÓ बन गए। आविष्कार कहे गए। उद्यमियों-कंपनियों के आदर्श बन गए। दुनियाभर के इंजीनियरिंग-टेक्नोलॉजी के शोधार्थियों, मैनेजमेंट और बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन के विद्यार्थियों की प्रेरणा और हमेशा नया, ज्यादा अलग करने को तत्पर युवाओं के लिए ऊर्जा स्रोत।


किंतु वही एपल, जब मिनी आइपैड लेकर आया तो तमाम खूबियां एक तरफ रह गईं। कारण: 7 इंच आकार वाले टेबलेट पूरी ताकत, पूरी क्षमता के साथ बाज़ार में पहले से मौजूद हैं। वो भी गूगल जैसी कंपनी के। अमेजॉन के। गूगल नैक्सस 7 यूरोप में उतना ही सफल चल रहा है जितना अमेरिका में। अमेज़ॉन का किंडल फायर एचडी श्रेष्ठ आर्थिक परिणाम दे रहा है। उधर, सबसे बड़ा एपल-विरोधी, प्रथम प्रतिद्वंद्वी, सैमसंग तो आकार-प्रकार को लेकर इतना लचीला, इतना आसान बन गया है कि आप अंदाज़ से भी कोई साइज बोल दीजिए- सैमसंग के पास मिल जाएगा। नहीं मिलेगा तो तय जानिए, कुछ ही दिनों में बना देगा। स्मार्टफोन में गैलेक्सी 2 फिर 3 और हाल ही में मिनी । बस, यह भी एपल के करोड़ों दीवानों के गुस्से का कारण है। सैमसंग को पेटेंट कानून के अंतर्गत एपल ने बुरी तरह कोर्ट में हराया। इसमें साइज को ही मुख्य बिंदु बनाया। हर एप, हर फीचर के चौकोर, गोल, अंडाकार होने-न होने का मामला उठाया। जिस पर अमेरिकी अदालत ने पांच हजार करोड़ रुपए का जुर्माना सैमसंग पर लगाया। उसी सैमसंग की नकलÓ से मिनी आइपैड निकाल दिया!! वॉलस्ट्रीट में जिस गूगल का कड़ा मुकाबला कर हराया, उसी की तर्जÓ पर 7 इंच आकार कर दिया!


जिस किंडल को बखूबी समझकर, उसकी लोकप्रियता को बड़ी कारोबारी संभावना के रूप में भांपकर एपल ने इतना काम किया, इतना नया बना दिया कि 2010 में दुनिया में खोजÓ की तरह आइपैड की धमाकेदार प्रस्तुति सामने आई। उसी किंडल के पीछे-पीछेÓ यह क्या किया एपल ने!


क्या यह $गलत किया? पैसों के लाभ की दृष्टि से फिलहाल बिल्कुल नहीं। पांच लाख मिनी बिकने जा रहे हैं। पचास लाख की आशा स्पष्ट है। करोड़ों की कमाई होगी। किंतु यूज़र्स ठगे से रह गए हैं। ब्रिटिश अखबार गार्डियन के टेक्नोलॉजी टीकाकार ज्यां-लुई-गैसे ने धाराप्रवाह समझाया है कि किस तरह एपल पहली बार फॉलोअरÓ बनकर दयनीय अवस्था में दिख रहा है, लीडरÓ की गौरवशाली मुद्रा में नहीं। श्रेष्ठतम् होने से बहुत ही अधिक कीमत रखने पर भी एपल का कोई प्रोडक्ट आइपॉड, आइफोन या आइपैड कभी उपयोग करने वालों की नाराज़गी का शिकार नहीं बना। लोगों ने खुशी से पैसे दिए। किंतु लीडरÓ के लिए। फॉलोअरÓ के लिए नहीं।

एक और बात $गलत की एपल ने। मात्र छह माह में ही न्यू आइपैडÓ यानी 3 निकालने के बाद अचानक अब आइपैड 4 निकाल दिया! यूरोप के एपल प्रशंसक तो उबल पड़े हैं सुनकर। टेक साइट पर जॉन सिरास्का ने प्रतिनिधि टिप्पणी की है: कुछ ही दिनों में मेरा नया-नया आइपैड 3 पुराना घोषित हो गया। अब तो कुर्सी कहीं से ऊपर-नीचे हो रही हो तो उसे समतल करने के लिए इस पैड का उपयोग करना पड़ेगा! कटाक्ष तीखा ज्यादा तो है पर सटीक है। क्योंकि कम से कम एक साल तो मिले लोगों को! और कंपनी भी तो इतना वक़्त ले ताकि वास्तव में कुछ नया दे सके। स्टीव जॉब्स की सीख से हट गया है एपल। इसमें कुछ गलत नहीं है। नए सीईओ टिम कुक यदि अपना कुछ नया करते हैं तो बहुत अच्छी बात है। क्योंकि न तो वे जॉब्स बन सकते हैं, न बनना चाहिए। स्वयं जॉब्स ने उन्हें वॉल्ट डिज्ऩी का उदाहरण देकर समझाया था कि मेरे जाने के बाद यह मत सोचना कि जॉब्स होते तो क्या करतेÓ, क्योंकि हर व्यक्ति अलग सोचता है। हर हालात अलग होते हैं। निर्णय अलग ही होते हैं।


किंतु कुक या अब का एपल कुछ नया करता, कुछ हटकर करता, कुछ क्रांतिकारी परिवर्तन लाता। भले ही जोखिम होती। नया तो होता। अब, वैसे भी आइपॉड, आइफोन और आइपैड सब हो चुके हैं। एपल की कुल संपत्ति 545 अरब डॉलर है। यानी 29.43 लाख करोड़ रुपए। अमेरिकी सरकार से ज्यादा कैश। अकेले आइपैड ही 10 करोड़ बिक चुके हैं। मात्र दो वर्ष में। सबसे अधिक प्रसिद्धी, उससे भी अधिक अपेक्षा।


हमेशा, इतना अलग करना, लगातार नया करते रहना, असंभव ही है। किंतु करना ही होगा। नेतृत्व जो करना है। चाणक्य की कालजयी सीख है- किसने कहा चंद्रगुप्त, कि नेतृत्व पाने, राजा होने का अर्थ सुख पाना है? वास्तव में ठीक उल्टा है। नेतृत्व का अर्थ ही दुख है। दुखों को अपनाना ही होगा। अपितु, आलिंगन करना होगा।Ó

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