हमारे आसपास कई रिपब्लिकन कई तरह के ओबामा
पिकासो को उनके अंतिम दिनों में किसी प्रदर्शनी में अकेले
नहीं जाने दिया जाता था।
ऐसा इसलिए क्योंकि वे अपनी ही एक श्रेष्ठ पेंटिंग को बेहतर
बनाने के लिए उसे बदलते
देखे गए थे!
-
पिकासो के किस्सों से
बराक ओबामा ‘वैसीÓ जीत हासिल नहीं कर पाए? इकोनॉमी की इतनी बुरी हालत रहने
पर भी मिट रोमनी उन्हें हराने में सफल क्यों नहीं हुए? और भी कई गंभीर प्रश्न। अमेरिकी चुनाव से उठे हैं। हमारे चुनाव के लिए
भी प्रासंगिक हैं। उससे भी बढ़कर, हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े
हुए हैं। उनकी राजनीतिक विफलता। हमारी अपने-अपने
क्षेत्रों में विफलता। एक जैसी ही है। कैसे?
ओबामा हैरान हैं कि उन्हें इतनी कड़ी टक्कर कैसे मिल सकती है? ओवर कॉफिडेंस यानी अतिआत्मविश्वास।
याद कीजिए, अधिक
समय नहीं हुआ। उत्तरप्रदेश में राहुल गांधी।
गांव-गांव, मंच-मंच
पर आक्रोशित मुद्रा में। गरजते। मायावती की हार तय। किंतु सपा की ‘सत्ता की चाबीÓ
कांग्रेस
के ही पास है- यही प्रचार था। कहां रही कांग्रेस? चौथे या
पांचवें क्रम पर। अतिआत्मविश्वास।
अन्ना हजारे। लाखों की भीड़। ‘मैं भी अन्ना।Ó
संसद
पूरी, एकसाथ
झुकी थी। कहां है भीड़। मुंबई में मुट्ठीभर। बाद में टीम तक टूट गई। अतिआत्मविश्वास।
राजनीति ही क्यों हमारे क्रिकेट के भगवान। 99 से 100वां शतक करने में ३३
पारियां १२ माह। अतिआत्मविश्वास। सौ साल
के इतिहास में ओलिंपिक में व्यक्तिगत स्वर्ण न मिल पाने के कलंक को स्वर्णिम
निशाने से धोने वाले अभिनव बिंद्रा। इस ओलिंपिक में? अति आत्मविश्वास। बॉलीवुड के बादशाह। सौ से भी अधिक स्क्रीन पर एक साथ रा.वन।
विफल रही। लंबी कुंठा
चली। क्यों? अति
आत्मविश्वास। देश में टीवी पर समाचारों का इतिहास बदलने वाला पहला न्यूज चैनल ‘ज़ीÓ। अब
ऐसा दाग झेल रहा है कि उसके संपादक १०० करोड़ रुपए के विज्ञापन,
खबर
रोकने के बदले मांगने गए। वो भी काले कठघरे में खड़े उद्योगपति से। वह भी बंगारू
लक्ष्मण जैसी मुद्रा में बाकायदा कैमरे में दिखते हुए! अति आत्मविश्वास। किसी को
सफल ही रहने का। किसी को ‘कोई हमें कैसे देख लेगाÓ
का।
हमारे आसपास हमारा स्वयं का, अति आत्मविश्वास हमें कितना धक्का पहुंचा रहा है, हम सोच भी नहीं सकते। पैसे कमाने का।
टॉपर रहने का। बाकी को पछाडऩे का। दूसरों को अपने से कम आंकने का। कई को मंदबुद्धि
मानने का। और चूंकि कहीं न कहीं हम भी ओबामा की तरह किसी न किसी तरह जीत भी जाते
हैं - तो हमें हमारे इस दंभ का, अति आत्मविश्वास
का पता ही नहीं चलता। क्या हम विफलता का विश्लेषण नहीं करते? निश्चित करते हैं। विस्तृत विश्लेषण। व्यापक
विश्लेषण। व्यावहारिक विश्लेषण। हमेशा होता है। आखिर विफलता के कारण नहीं खोजेंगे, तो सीखेंगे कैसे? हार की तह में नहीं जाएंगे तो आगे
जीतेंगे कैसे? किंतु
इस तथ्य को भी देखना अनिवार्य है कि विफलता के तमाम विश्लेषणों से आखिर हो क्या
रहा है? हारने
वाले को मिल क्या रहा है? सारा
संसार रिपब्लिकन पार्टी को कोसने में लग गया है। वे रूढि़वादी हैं। अड़े हुए। नए
जमाने के साथ बदलने को तैयार ही नहीं। नीतियां एकदम थकी हुईं, पुरातन और आगे न ले जाने वाली हैं।
यही निष्कर्ष है शीर्ष अमेरिकी समाचार पत्रों का, यूरोप के मीडिया का और राजनीतिक शास्त्र के प्रोफेसरों का।
सही ही है। सारा विश्व मान रहा है। तो क्या रोमनी को नहीं पता था? क्या रिपब्लिकन पार्टी नहीं जानती होगी? जाहिर है, वे तो सबसे अधिक जानते थे। जॉर्ज बुश
के बाद लगातार दूसरी हार। विश्लेषण तो किया ही होगा।
फिर विफल क्यों होते चले जाते हैं? किन्तु रिपब्लिकन को छोडि़ए। गुजरात
में कांग्रेस। आखिर कितना हारेगी? कितनी
बुरी तरह से हारती रहेगी? और
भाजपा? आखिर
कितना अपमानित होती रहेगी अपने राष्ट्रीय अध्यक्षों के कारण? पार्टी विद अ डिफरेंस। प्रधानमंत्री डॉ.
मनमोहन सिंह को ही लीजिए। अब तो यह वाक्य भी लिखे-बोले जाने से मना करने लगा है कि
‘वे
स्वयं तो बेहद ईमानदार हैं, किन्तु
सारे भ्रष्टाचार उन्हीं के नेतृत्व में...।Ó
राजनीति का क्या,
सब कुछ
संभव। आर्ट ऑफ द पॉसिबल। बाकी विफलताएं भी देखिए। देश में धरोहर के रूप में
स्थापित है टाटा समूह। उसमें भी भरोसे के पर्याय रतन टाटा। उनका सपना। एक लाख की
कार। हेनरी फोर्ड से भी आगे जिन्होंने पीपुल्स कार का ख्वाब सबसे पहले देखा था।
कहा हैं वैसी नैनो? एक लाख
रुपए में तो कभी आई ही नहीं। विफल। सेंट्रल इंडिया में आने वाला देश का पहला निजी
बिजलीघर कभी बना ही नहीं। सेनाध्यक्ष को घूस की पेशकश की गई। बाल तक बांका न कर
पाए देने वाले का। अब संसद घेरने का माद्दा दिखा रहे हैं। सब विफल। सभी के
अपने-अपने विश्लेषण।
सभी विफलता के कारण भी ढूंढ़ लेते हैं। किंतु जैसा कि हमारे
साथ हर साल होता है-कभी हम अपनी परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाते हैं। फिर हम तनाव
पालने लगते हैं। हम घर के, परिवार
के प्रति कर्तव्य नहीं निभा पाते हैं। माता-पिता से दूर हो जाते हैं। बच्चों के साथ
अहम समय नहीं बिता पाते। पत्नी (यानी महिला) को उसका अधिकार न देते हैं, न दिला पाते हैं। बीमार, थके और हारे कहलाते हैं। हम सब
रिपब्लिकन। और जो किसी तरह जोड़-तोड़ बिठा बने रहते हैं- सलमान खुर्शीद हो जाते
हैं। तबाही के दौर से लगभग बचकर, सफल
होते जाते हैं तो सलमान खान कहलाते हैं। और विकल्प के अभाव में कम बुराई के रूप
में सफल होते हैं तो ओबामा बन जाते हैं।
विफलता के विश्लेषण से कोई भी बदलाव लाना असंभव है। किंतु
लाना ही होगा। क्योंकि हर विफलता ही सफलता को जन्म देती है- बशर्ते कि उसमें से कोई
एक बात समझकर हम बदल दें।
Other Bloggers
Popular Blogs
-
खामोश गांधी और मोदी 3.0
मेरी इस बात से ज्यादातर लोग सहमत होंगे कि आजाद भारत के इतिहास... और पढ़ें
Posted by Chetan Bhagat -
...तो इसलिए सफल हो रही है 'सन ऑफ सरदार'
अजय देवगन की 'सन ऑफ सरदार' में संजय दत्त की शादी जूही से हो रही... और पढ़ें
Posted by J P Chowksey -
बाल ठाकरे की कमजोरी थी सिगार, नॉन वेज और व्हाइट वाइन
भारत में शायद ही ऐसा कोई पत्रकार हो जिसने अपने कॅरियर के... और पढ़ें
Posted by Mark Manuel -
शाहरुख का विस्तार और नियति की सीमाएं
-
मैं चंडी सी बन जाऊं, अपनी तलवार मुझे दे दे
महिलाएं हमें और माफ नहीं करेंगी। वे सारे देश का उफान देख रही... और पढ़ेंऔर देखें
Posted by Kalpesh Yagnik
Featured Bloggers
-
Kalpesh Yagnik
दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर ...और पढ़ें
-
Chetan Bhagat
चेतन भगत एक भारतीय लेखक हैं। नॉवेल, स्टोरीज़ और कॉलम लिखने के साथ साथ वे एक ...और पढ़ें
-
Rajdeep Sardesai
राजदीप सरदेसाई पत्रकारिता जगत के जाने माने हस्ती हैं। वे फिलहाल आईबीएन 18 ...और पढ़ेंऔर देखें

