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Chetan Bhagat


चेतन भगत एक भारतीय लेखक हैं। नॉवेल, स्टोरीज़ और कॉलम लिखने के साथ साथ वे एक अच्छे वक्ता भी हैं। देश की 5 बेस्टसेलिंग नॉवेल के वे लेखक हैं। उनकी पहली नॉवेल 'फाइव प्वाइंट समवन' 2004 में आई थी जो बेस्टसेलर बनी। उसके बाद 2005 में 'वन नाइट एट द ... Expand 
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विदेशी निवेश पर फिजूल डर

Chetan Bhagat|Nov 16, 2012, 14:58PM IST
कोयला घोटाले की मार से पस्त यूपीए सरकार ने पिछले हफ्ते मल्टी-ब्रांड रिटेल व विमानन इत्यादि में विदेशी निवेश को बढ़ावा देने जैसी कुछ सुधार संबंधी जरूरी घोषणाएं कीं। एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) पर देश में जबरदस्त प्रतिक्रिया होती है और इस मसले पर हो रही हाय-तौबा को देखते हुए लगता है कि एफडीआई का मतलब फॉरएवर डिबेटिंग इंडियंस (हमेशा बहस करने वाले भारतीय) भी हो सकता है।

सरकार के इस फैसले पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं उभरीं और दोनों ही अतिरंजित। एक तरह की प्रतिक्रियाओं में तो इसकी जमकर तारीफ की गई। अखबारी सुर्खियों में जोर-शोर से कहा गया कि प्रधानमंत्री को बिजनेस की कितनी चिंता है और नीतिगत मोर्चे पर अब सब ठीक होने जा रहा है। कुछ का तो यहां तक कहना था कि कोयला घोटाले को लेकर की जा रही आलोचना से प्रधानमंत्री को हतोत्साहित नहीं किया जा सका। इसमें यह बात भी निहित थी कि आखिरकार उन्होंने अपना काम किया, जिसने उन्हें देश के प्राकृतिक संसाधनों के कुप्रबंधन के आरोप से भी छुटकारा दिला दिया।

बहरहाल, उनका यह फैसला शानदार या वीरोचित भले न हो, लेकिन अच्छा जरूर है। विदेशी निवेश, अर्थव्यवस्था का उदारीकरण, भारत को बिजनेस-फ्रेंडली बनाना और वैश्विक मानसिकता को अपनाना हमारे देश के हित में है। हम 1991 में हुए सुधारों के फायदों को देख चुके हैं। ये सुधार तब किए गए, जब हम दिवालिया होने की कगार पर थे। आज हम जो सेलफोन लेकर चलते हैं, जो टीवी चैनल्स देखते हैं, जो वाहन ड्राइव करते हैं, जिन एप्लायंसेस का इस्तेमाल करते हैं- ये सब दो दशक पहले हुए उदारीकरण का ही नतीजा हैं। 

इसके पहले तो सरकार को यही लगता था कि लोगों द्वारा लैंडलाइन फोन कनेक्शन के लिए सालों इंतजार करना और सरकार द्वारा संचालित व नियंत्रित एक ही टीवी चैनल देखना पूरी तरह उचित है। मध्यमवर्गीय लोगों के जीवन में आए इस कदर व्यापक बदलाव के बाद कोई भी इस बात पर हैरत करेगा कि अब भी लोगों को सुधार के फायदों के बारे में समझाने की जरूरत है।

दूसरी ओर कुछ ने इसकी आलोचना भी की। मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने संभवत अपने समर्थक विशाल व्यापारी वर्ग को खुश करने के लिए सरकार की इन नई नीतियों को खारिज कर दिया। यूपीए की प्रमुख सहयोगी तृणमूल कांग्रेस ने भी इस तरह के सुधारों को जन-विरोधी बताते हुए इनकी तीखी आलोचना की। ममता गरीबों पर निगाह लगाए हुए हैं, जिन्हें अब तक इन सुधारों के ज्यादा फायदे नहीं मिले हैं और जो बड़ी, विदेशी कंपनियों की आशंका में जीते हैं। इसके विरोध में कई गैर-राजनीतिक लोग भी इस तरह के तर्क दे रहे हैं कि इससे हमारी किराना दुकानें बर्बाद हो जाएंगी। 

इन लोगों को लगता है कि भारतीय उपक्रम में 51 फीसदी निवेश के साथ वालमार्ट वह सब करने में सक्षम होगा, जो रिलायंस फ्रेश और बिग बाजार जैसी श्रंखलाएं नहीं कर सकीं। कॉपरेरेट इंडियन रिटेल स्टोर्स हमारे यहां बरसों से हैं। इसके बावजूद देशभर में किराना दुकानें फल-फूल रही हैं। इन विरोध करने वालों से जब यह पूछा जाता है कि ये भारतीय कंपनियां जो अब तक नहीं कर पाईं, आखिर वालमार्ट वह सब कैसे कर सकता है, तो इनके पास कोई जवाब नहीं होता। चीन, मलेशिया, थाईलैंड, फिलीपींस इत्यादि कुछ ऐसे उभरते एशियाई बाजार हैं, जिनके यहां मल्टी-ब्रांड रिटेल को मंजूरी देने के बावजूद कोई बड़ी उथल-पुथल नहीं हुई या व्यापक बेरोजगारी नहीं आई। 

यह सिर्फ मल्टी-ब्रांड रिटेल की बात नहीं है, जो देश के लिए जरूरी व्यापक आर्थिक सुधारों का सिर्फ एक छोटा-सा पहलू है। क्या हम हर बार सुधार कार्यक्रमों पर इसी तरह ध्रुवीकृत बहस करते रहेंगे? क्या हम सुधारों के संदर्भ में कुछ आधारभूत नियम नहीं बना सकते? क्या सरकार, सहयोगी दल और विपक्षी पार्टियां इस बात पर एकराय कायम नहीं कर सकतीं कि यदि हम धन जुटाना और विकास करना चाहते हैं तो हमें आर्थिक सुधारों को जारी रखना होगा? क्या हम इस बात को स्वीकार नहीं कर सकते कि सुधारों से आखिरकार आम लोगों का फायदा होता है? 

यूपीए के इस कार्यकाल में विपक्ष ने विभिन्न तरह के घोटालों को सामने लाने और सरकार पर दबाव बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाई है। हालांकि कुछ चीजों का सिर्फ विरोध के नाम पर विरोध करना भी तो सही नहीं कहा जा सकता। अनेक सुधार-विरोधी पार्टियां विदेशियों का भय दिखा रही हैं। यह गुजरे जमाने का वैश्विक नजरिया है, जिसे हमें अस्सी के दशक में ही त्याग देना चाहिए था। आज भारत को कारोबार के लिए अपने दरवाजे खोलने होंगे। हमें यह भी सीखना होगा कि विश्वस्तरीय प्रतियोगिता के साथ कैसे निपटा जाए। 

भारत में आने वाली हरेक कोस्टा कॉफी के लिए हमें एक कैफे कॉफी डेव बरिस्ता जैसे आउटलेट खोलने की जरूरत है, जो अपनी पकड़ बना सकें। विदेशी कारोबारियों को यहां न आने देना हमारी कमजोरी और खुद पर भरोसा न होने की निशानी है। यह कुछ उसी तरह है कि हम ओलिंपिक का आयोजन तो करें, लेकिन इसमें बेहतरीन देशों को प्रतिस्पर्धा न करने दें। यह तर्क अब पुराना पड़ चुका है कि भारतीय उद्योगों को प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार होने की जरूरत है। हम ज्यादा नहीं तो पिछले बीस साल से तैयार हो रहे हैं। हम यह भरोसा करें कि हमारी किराना दुकानों में भी इतना सुधार होगा, जिससे वे किसी भी नई प्रतिस्पर्धा का सामना कर सकें।

आखिर में एक और बात। विदेशी निवेश समेत प्रधानमंत्री की कुछ नीतियों के समर्थन का हर्गिज यह मतलब नहीं कि सरकार विभिन्न घोटालों से बरी हो गई है। अब तक सरकार ने रिश्वत या दलाली के मामले में उचित कार्रवाई करने के बारे में कोई गंभीरता नहीं दिखाई है। वास्तव में वे तो घोटाले होने से ही इनकार करते हैं। लिहाजा सुधार कार्यक्रम भले ही प्रशंसनीय हों, लेकिन वे सरकार द्वारा राष्ट्र-विरोधी घोटालेबाजों को बरकरार रखने और सहन करने की भरपाई नहीं कर सकते। 

उदारीकरण सिर्फ बेहतर आर्थिक नीतियों से ही नहीं बल्कि बेहतर नैतिक मूल्यों से भी जुड़ा है। फिलहाल, सरकार को इस मोर्चे पर अभी काफी कुछ करना बाकी है। चहुंओर व्याप्त भ्रष्टाचार हमें वालमार्ट के कुछ स्टोर्स के मुकाबले कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचाएगा या पहुंचाता रहेगा। इस वजह से यदि हमें सतत बहस करनी ही है, तो कम से कम हम सही मसलों पर तो करें। विदेशी निवेश का हमें स्वागत करना चाहिए।
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