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Chetan Bhagat


चेतन भगत एक भारतीय लेखक हैं। नॉवेल, स्टोरीज़ और कॉलम लिखने के साथ साथ वे एक अच्छे वक्ता भी हैं। देश की 5 बेस्टसेलिंग नॉवेल के वे लेखक हैं। उनकी पहली नॉवेल 'फाइव प्वाइंट समवन' 2004 में आई थी जो बेस्टसेलर बनी। उसके बाद 2005 में 'वन नाइट एट द ... Expand 
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‘कोल’गेट की काली राजनीति

Chetan Bhagat|Nov 17, 2012, 14:56PM IST
मान लें कि आप एक विशाल संयुक्त परिवार में रहते हैं। परिवार के सदस्यों में मतभेद हैं, फिर भी वे एक इकाई की तरह साथ रहते हैं। परिवार एक विशाल ज्वैलरी शॉप का मालिक है, जो बहुमूल्य रत्न-आभूषणों और पारिवारिक खजाने से भरपूर है। इस शॉप को चलाने के लिए परिवार एक मैनेजर को नियुक्त करते हुए उसे इसका पूरा नियंत्रण सौंप देता है। 

यहां तक कि मैनेजर को इन गहनों को बेचना भी नहीं पड़ता। वह तो चयन संबंधी कुछ मानदंडों (जो मैनेजर द्वारा खुद ही तैयार किए गए हैं) की कसौटी पर जिसे चाहे हीरे-मोती जैसे ये बेशकीमती नगीने दे सकता है। इस तरह मैनेजर अपने पसंदीदा लोगों को रेवड़ियां बांट सकता है और चाहे जिसे ठुकरा सकता है। 

जरा सोचिए कि ऐसी स्थिति में कोई भी मैनेजर क्या करेगा? जाहिर तौर पर वह पहले अपने मित्रों व सगे-संबंधियों को बुलाकर यह सुनिश्चित करेगा कि उन्हें पर्याप्त मात्रा में रत्न-आभूषण मिल जाएं। मैनेजर उन लोगों को भी गहने वगैरह बांटेगा, जो उसे बदले में नकद लाभ या उपहार वगैरह दे सकें। इस तरह जल्द ही दुकान लुट जाएगी और परिवार को भारी घाटा झेलना होगा। इसके बाद, मान लें कि परिवार पहले मैनेजर को बाहर का रास्ता दिखाते हुए दूसरे मैनेजर को नियुक्त करता है। 

नियम पहले जैसे ही रहते हैं, यानी ‘गहनों का वितरण मैनेजर के विवेक पर निर्भर है’। जाहिर तौर पर एक समय के बाद दूसरा मैनेजर भी अपने मित्रों व सगे-संबंधियों की तिजोरियां भरने लगता है। एक दिन परिवार को अपने ऑडिटर के जरिए पता लगता है कि उसका काफी खजाना लुट चुका है। जब वे मौजूदा मैनेजर के समक्ष यह बात रखते हैं तो वह कहता है कि इसकी शुरुआत तो पिछले मैनेजर ने की थी। पहला मैनेजर दूसरे मैनेजर पर ज्यादा लालची होने का आरोप लगाता है। भ्रमित परिवार उनकी टेनिस मैच स्टाइल की बहस को सुनता रहता है, जहां पर दोनों मैनेजर गलती को एक-दूसरे की ओर ठेलने में लगे हैं। जल्द ही परिवार के सदस्य दोनों मैनेजरों के खेमों में बंटते हुए आपस में उलझने लगते हैं। मैनेजरों की लूट चलती रहती है। 

आपको यह स्टोरी हास्यास्पद लग सकती है? खैर, यह है भी। लेकिन कोयला घोटाले के मामले में यही तो हो रहा है। हम भारतीय एक विभाजित मगर फिर भी संयुक्त परिवार जैसे हैं। हमारे कोयले के विशाल भंडार ज्वैलरी शॉप की तरह हैं। भाजपा और कांग्रेस मैनेजर हैं, जिन्हें आप किसी भी क्रम में रख सकते हैं। नियंत्रक व महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने तो सिर्फ कोयले में नुकसान की मात्रा बताई है। घोटाला तो दशकों से हो रहा है। इसी तरह के घोटाले अन्य प्राकृतिक संसाधनों में भी हो रहे हैं। वैश्विक बाजार में इनकी उच्च कीमतों को देखते हुए कहा जा सकता है कि ये संसाधन हमारे लिए बेशकीमती हैं, जिनसे हमारे देश का कायाकल्प हो सकता है। इनके त्रुटिपूर्ण आवंटन से देश को भारी नुकसान होता है। यही कारण है कि खनिज संपदा के लिहाज से दुनिया के सर्वाधिक समृद्ध राष्ट्रों में से एक होने के बावजूद हमारी गिनती गरीब देशों में होती है। 

हालांकि यह हमारे राजनेता ही हैं, जो इन संसाधनों से सबसे ज्यादा फायदा ले रहे हैं। इनमें अनाप-शनाप पैसा है। फिर भी हमने अपने राजनेताओं को विवेक के आधार पर इन संसाधनों के आवंटन की छूट दे दी। हम उनकी टेनिस मैच स्टाइल में एक-दूसरे पर आरोप ठेलने की राजनीति देखते रहते हैं। कांग्रेस हो या भाजपा, हम सोचते हैं कि हमारी पसंदीदा पार्टी इस समस्या को खत्म कर सकती है। हालांकि यह पार्टी-विशेष की समस्या नहीं है। यह तो संसाधनों के आवंटन के नियमों से जुड़ी है। 

लिहाजा हमें यह देखना होगा कि देश के प्राकृतिक संसाधनों का आवंटन बिलकुल निष्पक्ष और सर्वाधिक उत्पादक तरीके से होना कैसे सुनिश्चित किया जाए? नीलामी एक स्वाभाविक तरीका है। हालांकि खनिज भंडारों, इनके अंतिम इस्तेमाल और उत्खनन दरों की अनिश्चितता को देखते हुए कई बार खदान का मूल्यांकन आसान नहीं होता। ऐसी स्थिति में रॉयल्टी साझा करने का मॉडल कारगर हो सकता है। खनिज संपदा से भरपूर ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने जान लिया है कि कैसे जनहित से समझौता किए बगैर खनन क्षेत्र को विकसित किया जाए। हम भी यह कर सकते हैं। राजनीतिक दल देश की संपदा के मैनेजर हैं, मालिक नहीं। हम देशवासियों और मीडिया को दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के ‘यह उसने किया, मैंने नहीं’ के ड्रामे पर ध्यान देने के बजाय भविष्य के लिए सही समाधान तलाशने पर फोकस करना चाहिए। 

इन दलों को भी अपनी नीतियां बदलनी होंगी। कोयला घोटाले के मुद्दे पर भाजपा ने स्मार्ट पॉलिटिक्स खेली। कोयले पर यूपीए सरकार की धांधलियों के बारे में लगातार बोलते हुए उसने यूपीए के मुंह पर कालिख पोत दी। हालांकि उसे पता होना चाहिए कि कहां पर रुकना है। भाजपा ने भी खराब नियमों का फायदा उठाया है। क्या भाजपा खुद को बदलना चाहती है? क्या यह सत्ता में रहने के एक बड़े फायदे यानी बेशकीमती संपदाओं पर पूर्ण नियंत्रण को छोड़ने के लिए तैयार है? अब राजनीतिक अवसर कांग्रेस को चोर साबित करने में नहीं है, बल्कि यह दिखाने में है कि भाजपा राष्ट्रीय हितों के लिए त्याग करने को तैयार है। 

कांग्रेस भी कुछ सकारात्मक कदम उठाते हुए अपने चेहरे की कालिख को थोड़ा साफ कर सकती है। पहला, हालिया कोल आवंटनों को रद्द या कम से कम उनका पुनमरूल्यांकन किया जाए। हां, यह उन निजी उद्यमियों और निवेशकों के साथ नाइंसाफी होगी, जिन्होंने कोल आवंटनों के आधार पर परियोजनाओं की फंडिंग की है। लेकिन यदि कांग्रेस अपना चेहरा बचाना चाहती है तो उसे अपने हाथ खींचने होंगे, अभी। दूसरा, वह प्राकृतिक संसाधनों के आवंटन की नई नीति पेश करे। तीसरा और साधारण उपाय, उसे अपनी अक्खड़ता में कमी लानी होगी। सत्ता में होना और सही होना दो अलग-अलग बातें हैं। सत्ता के शीर्ष में बैठे कुछ कांग्रेसी नेता स्पष्ट तौर पर गलत होते भी बेहद अक्खड़ तरीके से सामने आते हैं। गलती करने के बाद अक्खड़ता दिखाना और बड़ी गलती है। इससे मतदाताओं में चिढ़ पैदा होती है। सत्ता में होने का मतलब यह नहीं कि आप लोकसेवक नहीं हैं। विनम्रता, तार्किकता और संभव हो तो थोड़ी नैतिकता का प्रदर्शन करना होगा। 

कुल मिलाकर यही कह सकते हैं कि कोयला घोटाला नाटकीय घटनाओं से ओत-प्रोत कोई सोप ओपेरा नहीं है। इस ड्रामे को छोड़ें और समाधान के लिए साथ बैठकर चर्चा करें। जो ऐसा नहीं करता, वह २क्१४ के लिए संभवत: खुद ही अपने लिए गहरी खाई खोद लेगा।
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