Zahida Hina
ज़ाहिदा हिना पाकिस्तान की जानी-मानी उर्दू की लेखिका हैं। उनके कॉलम, कहानियां, निबंध, उपन्यास और नाटक दुनिया भर में प्रकाशित होते रहते हैं। उन्होनें अपनी पहली कहानी तब लिखी थी जब वे 9 साल की थीं। उन्होनें पत्रकार के रूप में कई
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तारीख़ में आगे का सफर
Zahida Hina|Nov 17, 2012, 15:18PM IST
हिंदुस्तान का बंटवारा इसलिए नहीं हुआ था कि ख़त्ते में दो दुश्मन ईजाद किए जाएंगे और उन्हें एक-दूजे की गर्दन चबाने के लिए छोड़ दिया जाएगा। आज जब दोनों मुल्कों के मंत्री कहते हैं कि हम अपनी कड़वाहटों और दर्दनाक अतीत को पीछे छोड़कर आगे की तरफ सफर करेंगे और अपनी नस्लों को इस जंग के भूत से निजात दिलाएंगे तो इंतहापसंद और जंग के जहन्नुम को भड़काने वाले गु़स्से से बेक़ाबू हो जाते हैं। हिंदुओं को अपना दुश्मन लिखने वालों को यह क्यों याद नहीं रहता कि वह जिस ज़बान में लिखते हैं, उस जबान की परवरिश फ़ारसी और उर्दू के बहुत से बेमिसाल हिंदू अदीबों ने की है और कर रहे हैं। उर्दू के हिंदी अदीबों की बनाई हुई डिक्शनरियां और उनकी दास्तानें, कैसे-कैसे हीरे-जवाहरात हैं जिनसे उर्दू शेरोअदब का दामन मालामाल है।
पंडित रतन नाथ सरशार का अफसाना आज़ाद बश्शूलालजी की सिंहासन बत्तीसी, नेमचन्द खत्री का क़िस्सा गुलो सनोबर, जिसका आग़ाज हम्दोनात से हुआ है। पंडित दयानाथ वफा की मसनवी दाग़ दिल,पंडित दयाशंकर नसीम की गुलज़ार नसीम, लाला अंबे प्रसाद मदहोश का क़िस्सा गोपीचंद, मुंशी तोता राम शायान की मसनवी परकाला का आतिश, पंडित चकबस्त, पंडित दतात्रेय कैफी, पंडित तिलोकचंद महरूम, जगन्नाथ आज़ाद, फिराक़ गोरखपुरी। जदीद अफसाने और नॉविल निगारी पर नजर डालिए तो मुंशी प्रेमचंद, सुदर्शन, किशन चंदर, सरला देवी, राजेन्द्र सिंह बेदी, महिंदर नाथ, रतन सिंह दानिश्वरों और मालिक राम, डॉक्टर प्रकाश मोनिस, किशन चंद ज़ोबा, गोपी चंद नारंग, दीवान सिंह मफतून, डॉक्टर ज्ञान चंद जैन, रंगलाल चमन, शैशवनाथ मुनव्वर लखनवी और हां उनमें काली दास गुप्ता रज और सत्यपाल आनंद गुलज़ार जुत्शी, कुंवर महेन्द्र सिंह बेदी सहर और गुलजर। ये ऐसे लोग हैं, जिनमें से कई आज भी पाकिस्तान के स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाए जा रहे हैं और सिर्फ उर्दू ही क्या बल्कि पंजाबी, सिंधी, गुजराती, बंगाली जैसी तमाम ज़ुबानें हमारे इजतिमाई शऊर का हिस्सा हैं। इन तमाम जबानों में लिखने वाले हमारा साझा वरसा है। हीर गाई जाए तो वारिस शाह का जादू मुसलमान, हिंदू और सिख सब के सिर चढ़कर बोलता है। अमीर ख़ुसरो, कबीर और मीरा बाई हमें हर क़दम पर याद आते हैं। ये हमारे उपमहाद्वीप की रवादारी और दिलदारी का वह लशकारा है, जो दिलों खब जाता है। हम जिस रीति-रिवाज के मानने वाले हैं, इसमें सिरों के मीनार नहीं उठाए जाते। हमने बहुत दिनों तक 65 बरस की अपनी तारीख़ को नफरत का क़ैदी रखा। अब लाजिमी है कि हम अपनी तारीख़ को इस क़ैद से रिहा करें।
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