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Kalpesh Yagnik


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21/11 वन्दे मातरम्

Kalpesh Yagnik|Nov 27, 2012, 19:06PM IST

यह 21/11 है। वह 26/11 थी। यह सारे राष्ट्र, सभी भारतीयों की आंखों में चमक का दिन है। वह मुंबई से आरंभ हो, सारे देश की आंखों में रोष या आंसू का दिन था। यह आतंक के विरुद्ध युद्ध की विजय का पल है। वह मानवता के विरुद्ध कलुषित कृत्य था। यह 'स्टेट पावरयानी सरकार, हम लोगों द्वारा चुनी हुई सरकार की ताकत और इच्छाशक्ति के खुलकर सामने आने का प्रतीक है। वह सरकारी तंत्र की नाकामी और आपराधिक लापरवाही का लहूलुहान करने वाला परिणाम था।

यह न्याय का उजला दिन है। वह अन्याय की काली रात थी। अर्थात् सबकुछ एकदम पूरी तरह अलग। उल्टा। दिनरात, धरती-आसमान जैसा अंतर। जबकि : यह भी कांग्रेस-आधारित यूपीए की सरकार है। वह भी यही थी। प्रधानमंत्री भी यही, डॉ. मनमोहन सिंह थे। 21/11 को दृढ़ता दिखाई। 26/11 को कमजोरी सामने आई। तो क्या अब इस तरह के रुदन का समय है?

नहीं। समय यह ढूंढऩे का भी नहीं है कि कांग्रेस ने यह चुनावी फायदे के लिए किया। गुजरात चुनाव को ध्यान में रखकर तत्काल किया। या मध्यावधि चुनाव हो जाएं, इसलिए भ्रष्टाचार का मुद्दा दबाने के लिए किया। यह तो नया समय है। नई सोच का समय। नए लक्ष्य का समय। यह गर्व का समय चार साल बाद आया। बहुत अधिक है। बहुत ही। इसलिए नहीं कि हमारी न्याय व्यवस्था लंबी है। जटिल है। किन्तु इसलिए कि हमारा लक्ष्य स्पष्ट नहीं है।

सरकार का लक्ष्य कुछ और। कानून के रखवालों का कुछ और। खुफिया तंत्र तो मानो बना ही विफल रहने के लिए है। बच जाती हैं आतंकी हमलों और उसके बाद उपजी शंका के आतंक से उठने वाली निर्दोष आहें। उन परिवारों की जिन्होंने न जाने किस पाकिस्तानी कोने में ली गई किसी कायराना कसम के बदले अनजाने में अपनी जिंदगी के महकते हिस्से खो दिए। इसलिए कर कानूनी कार्रवाई में बहुत तेजी आनी चाहिए।

न्याय प्रक्रिया नहीं, हमारा नेतृत्व लचर है। हमें लाचार बना देता है। किन्तु आज अवसर है। विध्वंस के विरुद्ध, आगे बढक़र युद्ध छेडऩे का। क्योंकि कुछ अवसर ही ऐसे होते हैं जो न केवल एक इतिहास बना जाते हैं, वरन एक नया इतिहास बनाने की झलक भी दिखला जाते हैं। बशर्ते हम उस अवसर को पहचान लें। थाम लें। हृदय में उतार लें।

21/11 आगे आने वाली पीढिय़ों के लिए ऐसा ही एक ऐतिहासिक अध्याय है। 26/11 को हुए भयावह रक्तपात के बाद जब हर कानूनी कार्रवाई, हर अदालत को पार कर सुप्रीम कोर्ट तक की मुहर लग गई, तब भी समूचा देश यह मानने को राजी नहीं था कि आतंक के इस जीवित आकार को कभी फांसी वास्तव में दी जा सकेगी। यह दयनीय स्थिति है। यानी हमारा, हमारी पुलिस, अदालत और हर तरह की व्यवस्था में अविश्वास इस कदर बढ़ चुका है कि हम सामान्य बात भी नहीं मानते। जब सुप्रीम कोर्ट ने फांसी दी है तो होगी ही। इसमें इतने गर्व, इतना आश्चर्य और इतनी प्रशंसा की बात ही क्या है? निश्चित है। इसलिए है कि एक अफजल गुरु सामने है। जिंदा। खूब जिंदा। अफजल को ही क्यों लें, राजीव गांधी के हत्यारे देखें। तीनों बने हुए हैं।

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