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Kalpesh Yagnik


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क्यों जरूरी था हम सब के लिए रिटेल पर बहस देखना

Kalpesh Yagnik|Dec 08, 2012, 16:00PM IST
‘हमने 2004 में रिटेल में एफडीआई लाने की सोची। और हम हार गए। क्या आप भी 2014 में ऐसा ही भविष्य चाहते हो?’
-वेंकैया नायडू, भाजपा, राज्यसभा में 6 दिसंबर 2012

‘आपको तो खुश होना चाहिए। आपने सोचा था और हार गए। हमने तो कर दिखाया। हमारी ही सत्ता जाएगी ना?’
-भालचंद्र मुंगेकर, कांग्रेस, राज्यसभा में इसी बहस के जवाब में


सिनेमा जीवन का सबसे खूबसूरत धोखा है और राजनीतिक बहस सबसे बदसूरत धोखा। मल्टीब्रांड रिटेल में 51% विदेशी पैसा लगाए जाने के सरकारी कदम पर ऐसी बहस बड़ी मासूमियत से की गई। मल्टीब्रांड धोखा। किंतु हममें से अनेक बच गए इससे। लाइव जो नहीं देखा। वास्तव में बचे नहीं, चूक गए। क्योंकि दो दिन चली इस भारी-भरकम बहस में ‘बोलने’ के फायदे और नुकसान साफ-साफ सामने आए। 

इनमें रिटेल पर बने तेवर कितने छद्म हैं, यह साफ हुआ। साथ ही हम सबकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ‘बोलने’ के दौरान होने वाली छोटी-छोटी ग़लतियों का महत्व भी पता चला। इन्हें इस तरह देखा जा सकता है-

धाराप्रवाह बोलते हुए कोई एक बात ग़लत कह जाना

अपने मूल से हटकर कहना

संदर्भ से भटक कर कहना

अनसुनी होने पर भी अपनी बात जारी रखना

पुरज़ोर आवाज़ में उदाहरण देना किन्तु अपनी बात से न जोड़ पाना

धाराप्रवाह बोलते हुए कोई एक बात ग़लत कह जाना :  

विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने शुरुआत प्रभावी की थी। भाजपा के पास बहुत समय बाद, देश के सामने स्वयं को मज़बूत विपक्षी दल दिखाने का अवसर आया था। उन्होंने गंभीरता से गिनाना शुरू किया कि कैसे समूचे विश्व में जहां-जहां वॉलमार्ट गया, वहां-वहां स्थानीय बदहाली बढ़ी। कैसे स्वयं अमेरिका छोटे व्यापार को बचाने के लिए सटरडे बाज़ार बना चुका है, वगैरह। किंतु धाराप्रवाह बोलते हुए वे आढ़तियों की प्रशंसा कर बैठीं। हंगामा मचा। तो एक ग़लती को दबाने के लिए कई ग़लतियां की। आढ़तियों के किसानों पर कितने अहसान हैं - कैसे वे पैसों की मदद करते हैं, बताती गईं। वॉलमार्ट तो पहचानेगा ही नहीं। आढ़तिए किसानों की बेटी की शादी, परिवार की हारी-बीमारी के पैसे देते हैं। बस, उसके बाद उनका भाषण, भाषण ही बनकर रह गया। बाद में उनके भाषण से ही स्पष्ट हुआ कि वे कहना चाह रही थीं कि बिचौलिये खत्म नहीं होंगे, आढ़तियों की जगह एजेंसियां ले लेंगी। किंतु वो एक बात उनकी धार खत्म कर गई। यह अलग बात है कि वे नहीं मानेंगी ऐसा। समस्या यही है - हम मानते कहां हैं अपनी ग़लती! 

ऐसा ही हुआ सरकार के प्रमुख वक्ता सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल के भाषण में। उन्होंने अपनी नैसर्गिक वकील-शैली में असरदार बातें रखीं। एक नई ही बात खड़ी कर दी कि 121 करोड़ लोगों में से कोई 30 करोड़ ही वॉलमार्ट से सामान खरीदने जाएंगे। इतनी ही अमेरिका की कुल जनसंख्या है। अपने चुनाव क्षेत्र चांदनी चौक के उदाहरण से उन्होंने यह बात समझाई। किंतु चूक हो गई फायदे गिनाने में। कह बैठे-उपभोक्ता को, किसानों को, युवा को, रोजगार में, सबमें फायदा होगा। पर सबसे ज्यादा इकोनॉमी को फायदा होगा। वे बोल बैठे : क्योंकि आप जानते ही हैं कि इकोनॉमी की हालत कितनी खराब है। और न्युफैक्चरिंग सेक्टर से लेकर सर्विस सेक्टर सभी की हालत दयनीय बताते चले गए। सबकुछ, जाहिर है, उन्हीं की सरकार की देन है। फंस गए। अगले दिन तक विपक्ष के ‘प्रिय पात्र’ बनकर उभरे।

रोचक तथ्य तो यह है कि इन चूक के मूल में दोनों नेताओं का सच ही सामने आया। भाजपा, बिचौलियों के पक्ष में, यानी बीच के व्यापारियों के पक्ष में थी/है। सिब्बल तो एकदम सच ही बोल रहे थे।


अपने मूल से हटकर कहना :

समाजवादी पार्टी ने फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (एफडीआई) का जमकर विरोध किया था। समाजवादी समाज की स्थापना में, स्वाभाविक है, विदेशी पूंजी बाधक बनेगी। इसलिए वे नीतिगत मूल पर अड़े रहे। विरोध किया। और अपने राजनीतिक मूल पर भी अड़े रहे - विरोध भूलकर, सरकार के पक्ष में सदन से वोटिंग के समय बाहर चले गए। किंतु इस नाट्य-रचना को तो सारा राष्ट्र जान चुका है। यहां बात ‘बोलने’ की चल रही है। मुलायम सिंह यादव, किसानों की बात जब बोलते हैं तो संसद सुनती है - क्योंकि निश्चित ही वे सुषमा स्वराज या कपिल सिब्बल से अधिक किसानों को समझते हैं। किंतु आलू-टमाटर की खरीदी का धोखा कैसे विदेशी रिटेल कंपनियां देती हैं, सुषमा की इस बात को आगे बढ़ाने के क्रम में वे मूल से भटककर; पेप्सी हमसे आलू नहीं खरीदती, इस बात को कहते चले गए। चूंकि तैयारी तो थी नहीं, उल्टा हो गया। सरकारी जवाब में ग़लत सिद्ध कर दिए गए। पेप्सी ने 2010 में 22 हजार मीट्रिक टन से बढ़ाकर 2012 में 60 हजार मीट्रिक टन स्थानीय किसानों से खरीदा है, यह आंकड़ा सामने आ गया। 

संदर्भ से भटक कर कहना :

वामपंथी विचारधारा कितनी ही अप्रासंगिक क्यों न हो चुकी हो, वाम नेता बोलते अच्छा हैं। गुरुदास दासगुप्ता ने ठीक तरह से ही विरोध भाषण शुरू किया था। फिर अचानक सोनिया गांधी को संबोधित कर बोल बैठे : मैडम को इतिहास पता नहीं है। कम्युनिस्ट पहले कांग्रेस का ही हिस्सा थे। देश के लिए। १९४७ का उदाहरण है। 
वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने टोका कि यह इतिहास पूरा सच नहीं है। 1920 में कम्युनिस्ट, कांग्रेस से अलग हो गए थे, जब आज़ादी की लड़ाई चरम पर थी। चूंकि बहस इतिहास पर होनी नहीं थी, वरन बात बढ़ती तो यहां तक जाती कि ’६२ के चीन युद्ध में नैराश्य के भारतीय दौर में यही कम्युनिस्ट, चीन के पक्ष में खड़े थे। संदर्भ से भटके दासगुप्ता फिर कुछ असर न छोड़ पाए। इसी तरह केंद्रीय मंत्री प्रफुल्ल पटेल ने अजीब संदर्भ लाने की कोशिश की। उन्होंने इस बहस को भारतीयों के विदेशों में पूंजी लगाने से जोड़ते हुए विपक्ष को ललकारा कि वे उसका विरोध करेंगे? चूंकि इकोनॉमी हमेशा दोतरफा होती है!


अनसुनी होने पर भी अपनी बात जारी रखना :

पंजाब के किसानों की बात रखने को आतुर बठिंडा की सांसद हरसिमरत कौर बादल पहली लाइन से ही इतनी आक्रामक बोलीं कि उनके एक भी शब्द को सांसदों ने ठीक तरह से सुनने नहीं दिया। किंतु भारी शोर के बीच वे बोलती चली गईं, बोलती चली गईं। स्पीकर ने उन्हें बार-बार चेतावनी दी, किंतु उन्हें संभवत: इस बात का फायदा उठाना था कि सारे देश में सारे समाचार चैनल कोई दूसरा समाचार दिखा ही नहीं रहे हैं। अनसुनी हो तो हो, देश तो यानी पंजाब तो देख ले कि वे कितना बरस रही हैं। लालूप्रसाद यादव, राम जेठमलानी और यहां तक कि आनंद शर्मा अनसुनी होने पर भी अपनी बात कहते चले गए। संसद में चल गया, विलोपित कर दिए गए। बाहर हमारे लिए जगहंसाई का कारण बन सकते हैं। लालू यादव के लिए परंपरागत मीडिया ने भले ही लिखा हो कि वे अपनी ‘चिर परिचित शैली’ में बोले। किंतु न्यू मीडिया यानी इंटरनेट पर नई पीढ़ी नए सिरे से जागरूक है। आईबीएन के प्रमुख राजदीप सरदेसाई ने लालू को लेकर जब ट्विटर पर लिखा ‘वैल्यू फॉर मनी’ यानी पैसा वसूल। इस पर नई जनरेशन ने आपत्ति ली : कैसा पैसा वसूल, क्या संसद में मनोरंजन के लिए बैठे हैं वे? संभवत: सरदेसाई इस पीढ़ी की प्रतिक्रिया जांचना चाह रहे होंगे। पता चल गई। दो टूक।

पुरजोर आवाज़ में उदाहरण देना किंतु अपनी बात से न जोड़ पाना :

सरकार का प्रमुख जवाब आनंद शर्मा को देना था। दिया। खासा दिया। सबसे तीखे तेवर विपक्ष के उस आरोप पर दिखाए जिसमें इसे ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ की वापसी करार दिया गया था। पुरजोर ढंग से अपनी बात के अंत में उन्होंने कहा - गांधीजी ने विदेशी कपड़ों की होली जलवाई थी। आज़ भी कृषि के बाद कपड़ा उद्योग में सर्वाधिक लोग कार्यरत हैं - 23 प्रतिशत। तब हमारी हजारों मिलें बंद हो गई थीं। चरखा इसीलिए राष्ट्रीय प्रतीक बना। 

वातावरण अलग था। हम कांग्रेसी, गांधी-नेहरू की नीतियों पर चलने वाले हैं। कोई ताकत हमें डिगा नहीं सकती, क्योंकि गांधी-नेहरू हमारे दिल में हैं, धरोहर हैं, आदि। अब समूचा राष्ट्र, जो भी टीवी पर इसे देख-सुन रहा था, समझ ही नहीं पाया कि इस बात को इतने प्रभावी ढंग से कह क्यों रहे हैं? चूंकि यह रिटेल में विदेशी पूंजी से तो कहीं जुड़ ही नहीं पा रहा। हम भी अकसर ऐसी भूल कर जाते हैं। यह अलग बात है कि हम इतने पुरज़ोर ढंग से ऐसा नहीं कर पाते। चूंकि हमारे पास श्रोता भी इतने ‘उदासीन’ नहीं होते जितने हमारी संसद में हैं। 

संसद में ‘बोलने’ का स्तर ऊंचा उठेगा, यह असंभव है। किंतु होना ही चाहिए। ऊंचा नहीं, सर्वोच्च हो, ऐसा प्रयास करना होगा। हमें। और इसका एकमात्र उपाय है - वोट मांगने आए उम्मीदवार को याद दिलाना कि बोलने में गांभीर्य पहली शर्त है। चूंकि उनकी सोच पर हमारा कोई अधिकार नहीं हो सकता तो कम से कम बोलने पर तो हमारी लगाम लगे। वैसे गुजराती कहावत है - जीभमां हाड़कू न होय, ते आम पण वणो अने तेम पण वणो यानी जीभ में हड्डी नहीं होती, इसलिए बोलती रहती है, बोलती रहती है। 





(लेखक दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर हैं।)

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