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Chetan Bhagat


चेतन भगत एक भारतीय लेखक हैं। नॉवेल, स्टोरीज़ और कॉलम लिखने के साथ साथ वे एक अच्छे वक्ता भी हैं। देश की 5 बेस्टसेलिंग नॉवेल के वे लेखक हैं। उनकी पहली नॉवेल 'फाइव प्वाइंट समवन' 2004 में आई थी जो बेस्टसेलर बनी। उसके बाद 2005 में 'वन नाइट एट द ... Expand 
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क्या ‘आप’ है प्रभावशाली राजनीतिक एप्प?

Chetan Bhagat|Dec 15, 2012, 12:51PM IST
‘आप’ की मुख्य ताकत इसकी साफ-सुथरी व साहसी छवि है। यही इसके प्रभावशाली ‘एप्प’ की नींव होगी।
यदि   किसी नई तकनीक को लोगों के बीच जल्द अपनी पैठ बनानी है तो उसमें बेहतरीन फीचर्स या कहें कि प्रभावशाली ‘एप्प’ होने चाहिए। एक दशक पहले माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस करोड़ों लोगों को विंडोज तक ले आया।
 
आईट्यूंस स्टोर ने आईपॉड को सफलता दिलाई। टचस्क्रीन इंटरफेस ने आईफोन को हिट बनाया। राजनीति भी इसी तरह काम कर सकती है। स्थापित खिलाड़ियों को एक बड़ा फायदा यह होता है कि जनता पर उनकी मजबूत पकड़ होती है और मतदाता उन्हें जानते-पहचानते हैं। फिर भी गाहे-बगाहे एक नई राजनीतिक शक्ति उदित होती है और मतदाताओं पर छा जाती है।
 
भारत में हमने ऐसा कई बार होते देखा है। हालिया दौर में बिहार में जद (यू), महाराष्ट्र में मनसे और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का उदय ऐसी ही कुछ मिसालें हैं। तकनीकी भाषा में बात करें तो इन हालिया मामलों में प्रभावशाली एप्प स्थानीय मसलों पर जबरदस्त फोकस रहा है। चाहे यह क्षेत्रीय अस्मिता की बात हो या मौजूदा कुप्रशासन की, कहीं न कहीं इन नई राजनीतिक ताकतों ने स्थानीय वोटरों के साथ जुड़ाव कायम किया और उन्हें इसका फायदा भी मिला। 
 
लाख टके का सवाल यह है कि क्या केजरीवाल की ‘आप’ (आम आदमी पार्टी) ऐसा कर सकती है? क्या एक प्रचंड भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन खुद को एक सफल राजनीतिक शक्ति में तब्दील कर सकता है? इसकी शक्तियां और सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं? क्या हम भारतीयों को इसका समर्थन करना चाहिए? सबसे अहम बात, क्या इसके पास ऐसा प्रभावशाली ‘एप्प’ है, जिससे लोग इसकी ओर खिंचे चले आएं? इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं। ‘आप’ अब भी खुद को तलाश रही है। हालांकि इसकी कुछ ताकतों व कमजोरियों का जिक्र यहां पेश है। 
 
‘आप’ की मुख्य ताकत इसकी साफ-सुथरी व साहसी छवि है। इस पार्टी के आलोचक भी अरविंद केजरीवाल की ईमानदारी और असाधारण साहस को स्वीकार करते हैं। भारतीय राजनेताओं में ऐसी खूबी कम ही देखने को मिलती है। आखिरकार, यही इसके प्रभावशाली ‘एप्प’ की नींव होगी। सतत भ्रष्टाचार-विरोधी मुहिम और विभिन्न खुलासों के चलते कई लोग यह मानते हैं कि ‘आप’ कम से कम फिलहाल ईमानदारी व सत्यनिष्ठा के मामले में मौजूदा पार्टियों से बीस ही बैठती है। मतदाताओं को साथ जोड़ने के लिए इस ताकत का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा संगठन के निर्माण के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं और अच्छे प्रत्याशियों को तलाशने में भी इससे मदद मिल सकती है। इसकी अन्य शक्तियों में शामिल है शीर्ष पर स्मार्ट व्यक्तियों का काबिज होना, मीडिया के साथ बेहतर ताल्लुकात और अन्ना से अलग होने के बाद भी इसकी स्वतंत्र पहचान।
 
इसकी तीन मुख्य कमजोरियां भी हैं। मौजूदा राजनेताओं पर लगातार हमले करते हुए सनसनी फैलाने की एक सनक के अलावा राजनीतिक शुद्धता की कमी ऐसी ही एक कमजोरी है। भावनाओं से भरा कोई एक्टिविस्ट सीमित तथ्यों के साथ कोई भी फैसला दे सकता है। मगर एक राजनेता के तौर पर इस बात का ख्याल रखना बेहद जरूरी है कि क्या बोला जा रहा है। ‘पॉलिटिकली करेक्ट’ जैसा जुमला यूं ही नहीं बना। दिल से अपनी बात कहना अच्छा है, लेकिन गलत बात बोलकर आप राजनीति में तुरंत अपनी साख गंवा सकते हैं। 
 
दूसरी कमजोरी यह लगती है कि उन्हें नई वैश्वीकृत विश्व अर्थव्यवस्था की ज्यादा समझ नहीं है। उनकी विचारधारा विकास विरोधी वामपंथी विचारों के ज्यादा करीब लगती है, जहां पर तमाम विदेशियों, बड़ी-बड़ी कंपनियों और अमीर लोगों को बुरा और भ्रष्ट समझा जाता है, जबकि छोटे कारोबार तथा गरीब लोग अच्छे माने जाते हैं। यह सोच भाषणों में तालियां बटोरने के लिहाज से तो खूब कारगर हो सकती है, लेकिन राष्ट्र की अर्थव्यवस्था के लिए ज्यादा नहीं। भले ही भारत आज भ्रष्टाचार मुक्त देश हो जाए, लेकिन तब भी हम एक अमीर देश नहीं होंगे। सुनियंत्रित पूंजीवाद, खुली अर्थव्यवस्थाओं और मुक्त बाजारों ने दुनियाभर में धन-संपत्ति निर्मित की है। हमें इन्हें मंजूर करना चाहिए, ताकि भारत में भी ऐसा हो। 
 
तीसरी कमजोरी, ‘आप’ के पास अपना मजबूत पार्टी संगठन तैयार करने लायक संसाधन नहीं हैं। दूसरी पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं को सत्ता में आने के बाद कोई अच्छा पद दिलाने या अनुचित लाभ पहुंचाने जैसे उपायों के जरिये उन्हें प्रोत्साहित करती रहती हैं। ‘आप’ मूलत: इस नजरिये के खिलाफ है। क्या एक ईमानदार संगठन के लिए काम करने का मौका मिलने की बात ही कार्यकर्ताओं को इसके साथ जोड़ने के लिए पर्याप्त होगी, यह तो समय ही बताएगा। ‘आप’ की अगली चुनौती नवंबर 2013 में होने वाले दिल्ली विधानसभा के चुनाव हैं। दिल्ली में उच्च-मध्य वर्ग की काफी आबादी है और जहां ब्रांड केजरीवाल की सर्वाधिक मान्यता है। यदि ‘आप’ वहां कुछ अच्छे प्रत्याशी मैदान में उतार पाई और इनमें से कुछ जीतने में सफल हो गए, तो इसका काफी प्रभाव पड़ेगा। इस तरह ‘आप : जहां पर अच्छे आदमी राजनीति से जुड़ सकते हैं व जीत भी सकते हैं’, एक प्रभावशाली एप्प बन जाएगा। 
 
केजरीवाल की ‘आप’ को फिलहाल अच्छे प्रत्याशी तलाशने और उन्हें चुनाव लड़ने के लिए राजी करने के लिए बड़े राजनीतिक कौशल की दरकार है। इसके अलावा दूसरी राजनीतिक पार्टियां भी तमाम हथकंडे अपनाते हुए ‘आप’ के अच्छा प्रदर्शन करने वाले सदस्यों को फुसला सकती हैं। ‘आप’ को उन्हें अपने साथ जोड़े रखने का तरीका भी खोजना होगा। 
 
हम भारतीयों के लिए ‘आप’ साफ-सफाई की राजनीति का प्रतिनिधित्व करती है, जिसके हम हकदार हैं। लिहाजा इसे एक और पार्टी मानकर खारिज करना या लगातार इसकी आलोचना करना हमारे हित में नहीं है। 

तकनीक में, या राजनीति में भी हमेशा से कुछ दिग्गज खिलाड़ी मौजूद रहे हैं और रहेंगे। लेकिन तकनीक की तरह राजनीति में भी नयों के लिए हमेशा गुंजाइश और सम्मान बरकरार रहना चाहिए।
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