मैं चंडी सी बन जाऊं, अपनी तलवार मुझे दे दे
महिलाएं हमें और माफ नहीं करेंगी। वे सारे देश का उफान देख रही हैं। संसद की बहस उनके कानों में सीसा भर रही है। महिला आयोगों का सच उनके सामने आ रहा है।
देशवासियों की उनके प्रति चिंता से वे चिंतित भी हो रही हैं। किन्तु भीतर ही भीतर वे कुछ अलग ही तय कर रही हैं। धधक रही हैं। हो चुका क्रंदन। अब कठोर कार्रवाई चाहिए। भास्कर लड़ेगा इसके लिए लड़ाई। आपके माध्यम से।
सारे देश का क्रोध पुलिस पर है। कुंठा अदालतों की प्रक्रिया से है। दोषी के रूप में सरकार है। कुछ नहीं हो रहा के मूल में सारे जनप्रतिनिधि हैं। चारों उस तंत्र यानी सिस्टम का आधार स्तंभ हैं जो महिलाओं की गरिमा की रक्षा कर सकता है।
यह तंत्र ऐसा करता भी है- किन्तु आधा-अधूरा। कमजोर। क्योंकि यह तंत्र है ही भावनाहीन। संवेदनाहीन। श्रीहीन। महिलाओं की परवाह ही होती तो बाहरी सुरक्षा के लिए कोई सवा लाख करोड़ खर्च करने की जगह यही पैसा उनकी सुरक्षा पर खर्च कर देते।
किन्तु इस राष्ट्रीय उफान को ईंधन बनाया जा सकता है। इससे बहुत बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है। दिल्ली की घटना निर्णायक बनाई जा सकती है। बशर्ते महिलाओं की गरिमा को आहत करने वाले कारणों को तत्काल समाप्त किया जाए।
कारण अनेक हैं किन्तु कुछ हैं :
पुलिस : सारा संसार बदल चुका है। नहीं बदली तो पुलिस। उसकी विकृत कार्यशैली। उसकी छवि। वो तो कभी नहीं बदलेगी किन्तु तत्काल यह तो किया ही जा सकता है कि...
महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों के लिए हर नगर में अलग जांबाज दस्ते बनें।
ये गश्त दस्ते नेताओं, रैलियों की ड्यूटी से बिल्कुल दूर रहें।
हर जगह पहले से ही महिला थाने हैं। ये दस्ते इन्हीं से संबद्ध हों।
हर राज्य सरकार गिरफ्तारी की 24 या 48 घंटे जैसी समय सीमा घोषित करे।
ऐसे कुत्सित अपराधों की चार्जशीट दायर करने का समय भी तय हो।
अभियोजन के तरीके बाबा आदम के दौर के बने हुए हैं। जबकि बचाव पक्ष वाले कानून के दांव-पेंच, हजारों गुना तेज, अलग और आधुनिक हो चुके हैं।
अदालत : एक आम व्यक्ति के लिए तो अदालत का अर्थ ही 'तारीख' है। इसे लेकर स्वयं अदालतें व सुप्रीम कोर्ट के शीर्ष जज कई बार चिंता जाहिर कर चुके हैं। फास्ट ट्रैक अदालतों के बाद यह सिलसिला वैसे बदला है।
सरकार : सरकार क्या कर सकती है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण देखिए : पांच वर्ष की अबोध बच्ची के साथ दरिंदगी करने और फिर हत्या करने वाले बंटू को फांसी की सजा हुई। मोलाईराम और संतोष यादव ने तो एक जेलर की 10 साल की बिटिया को पाशविकता का शिकार बना दिया था।
फांसी हुई। इसी तरह छह साल की बच्ची को शिकार बनाकर सतीश ने मार डाला। वहीं बंडू बाबूराव तिड़के ने स्कूल से लौट रही 16 साल की मासूम को अगवा किया, हैवानियत पूरी की और हत्या कर दी।
सबको फांसी सुनाई गई। किन्तु क्या महिलाएं यह जानकर माफ करेंगी कि इन सभी को राष्ट्रपति- वह भी महिला राष्ट्रपति, प्रतिभा पाटिल ने दया याचिका सुनते हुए माफ कर दिया!
बहुत कुछ है जो हर पार्टी की सरकार, केंद्र की; हर राज्य की सरकार, हर स्तर पर हमें दैत्याकार धक्का पहुंचाने वाले काम/फैसले करती रहती हैं। जो क्रोध आज महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वालों को मौत की सजा या उन्हें अयोग्य पुरुष बनाने वाले कैमिकल देने की सजा को लेकर चल रहा है- वो होता ही नहीं, यदि सरकार कुछ करती।
वास्तव में सजा क्या हो, कैसे मिले, यह कम महत्व का है। क्योंकि इसका अर्थ तो यही है कि हम पाप होने के बाद की बात कर रहे हैं। सबसे अधिक और एकमात्र हल तो यही ढूंढा जाना चाहिए कि ऐसा कृत्य होने ही न दिया जाए। कुछ उपाय टैक्नोलॉजी से मिलेंगे- देश भर में सीसीटीवी कैमरों का जाल।
और इतना ही क्यों, कठोरतम कदम तो यह हो सकता है कि महिलाओं के अपराधियों को सजा मिलते ही उनमें चिप इम्प्लांट। ताकि वे दोबारा ऐसा कभी न कर सकें। उनकी सड़क पर मौजूदगी ही पुलिस को अलर्ट दे देगी। क्योंकि फांसी का प्रावधान भी हो जाए, तो मिलेगी तो नहीं ही। राष्ट्रपति को दया आ जाएगी। गृहमंत्री पिघल जाएंगे।
जनप्रतिनिधि : संसद, विधानसभाओं के हर छोटे-बड़े मामले पर विशेष सत्र बुलाए जाते हैं- महिलाओं की सुरक्षा के लिए तो कभी कोई सत्र नहीं बुलाया गया। उन्हें ऊपर हुई हर बात का जवाब देना होगा। और ये सब न कर सकें तो श्यामनारायण पांडेय की पंक्तियां पढ़ लें-
थक गया तू समर से तो अब, रक्षा का भार मुझे दे दे।
मैं चण्डी सी बन जाऊं, अपनी तलवार मुझे दे दे।।
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