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Gyan Gupta


लेखक दैनिक भास्कर समूह के डिजीटल आर्म आई मीडिया कॉर्प लिमिटेड के सीईओ हैं
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आज मुझे अपने पुरुष होने पर शर्म आ रही है

Gyan Gupta|Dec 20, 2012, 16:25PM IST
दिल्‍ली में 23 साल की छात्रा से गैंगरेप ने समूचे समाज को हिलाकर रख दिया है। क्या इससे बर्बर भी कुछ हो सकता है? इस घटना के बाद पूरा शहर खौफ में है। यह आतंकी हमले से भी वीभत्स है, क्योंकि इससे न सिर्फ दिल्ली डरी-सहमी है बल्कि देश के लाखों नागरिक भी खौफ में हैं। 

समाज में गुस्सा है, हम जल्द से जल्द न्याय चाहते हैं लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। आज मुझे अपने पुरुष होने और उन सब मूल्यों पर शर्म आ रही है जिनके साथ मैं अब तक फख्र से खड़ा था। यह सिर्फ बलात्कार के कारण नहीं है, बल्कि उन सब बातों और व्यवहार के कारण है जो हम रोज लड़कियों के साथ करते हैं। हमारी बातें उन्हें शर्मिंदा करती हैं, हमारी हरकतें उन्हें परेशान करती हैं। और हम सब यह रोज करते हैं, बिना महसूस किए। कैसे हम अपनी आंखों से  बलात्कार करते हैं, मौका मिलते ही उन्हें जहां-तहां छूने की कोशिश करते हैं, घूरते रहते हैं। हमारी हरकतों ने हमें लड़कियों की नजर में घटिया बना दिया है। 

क्या पुरुष हीन भावना से ग्रसित और इतने निराश हो गए हैं कि अपने घटिया रोमांच के लिए लड़कियों का इस्तेमाल करने लगे हैं। मुझे नहीं लगता कि कभी हमें अहसास भी हो पाएगा कि हम लड़कियों को मानसिक रूप से कैसे प्रताड़ित करते हैं। क्या हमने कभी सोचा है कि वो क्या सोचती हैं? हम कैसे उन्हें खुद से नफरत के लिए मजबूर कर रहे हैं और कैसे हर गुजरते दिन के साथ हमारा पुरुषत्व समाप्त हो रहा है। हम तो पुरुष हैं, हमें उन्हें प्यार देना है, सम्मान देना है, उनका ख्याल रखना है और सबसे महत्पूर्ण उन्हें सुरक्षित रखना है। हमें शायद भौतिक रूप से इसलिए ही मजबूत बनाया गया है कि हम यह सब कर सकें। यह शर्म की बात है कि हम अपनी शक्ति का ऐसे दुरुपयोग कर रहे हैं, और अगर हम नहीं भी कर रहे हैं तो जो कर रहे हैं उन्हें रोक नहीं रहे हैं। क्या कुछ सिरफिरे दरिंदे तमाम पुरुषों को नीचा दिखाएं और हम  सिर्फ देखते रहें? हम क्यों नहीं एकजुट होकर ऐसे दरिंदों के खिलाफ हो जाते? क्यों नहीं हम ऐसे दरिंदों को समाज में उनकी औकात दिखा पाते?

हम यह सब क्यों नहीं रोक रहे हैं, क्यों हम लड़कियों को सुरक्षित नहीं रख पा रहे हैं, इस लायक नहीं बन पा रहे हैं कि वो हमें प्यार करें, सम्मान करें। हम पुरुष क्यों नहीं बन पा रहे हैं। मेरी आंखों में आंसू हैं, दिल में गुस्सा है और आज मुझे अपने पुरुष होने पर ही शर्म आ रही है। लेकिन अब यह शर्म मेरी बर्दाश्त से बाहर हो रही है। मैं अब लड़कियों की आंखों में पुरुषों के प्रति नफरत और गुस्सा नहीं देख सकता। मैं आज उस लड़की के लिए जिसे मैं प्यार करता हूं, उस मां के लिए जिसका मैं सम्मान करता हूं, उस बेटी के लिए जिसे मैं स्नेह देता हूं और उस बहन जिसके लिए मैं शुक्रगुजार हूं, और उन दोस्तों के लिए जिनके साथ मुझे अच्छा लगता है, ऐसे सिरफिरों के खिलाफ खड़े होने की शपथ लेता हूं। मैं अब किसी लड़की को नहीं घूरूंगा, मैं अब किसी लड़की को कभी बदनीयती से छूने की कोशिश नहीं करूंगा, मैं अब ऐसा कुछ नहीं करूंगा जो उन्हें असुविधाजनक लगता हो। मैं शपथ लेता हूं कि तुम्हें अहसास कराउंगा कि तुम प्रिय और इज्‍जत के लायक हो। मैं वादा करता हूं तुम्हारे चेहरे पर मुस्कान बिखेरने का ताकि मैं तुमसे नजर से नजर मिलाकर बात कर सकूं। ताकि मैं एक सच्चा पुरुष बन सकूं। आज मैं पुरुष बनने का वादा करता हूं। 
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