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Rajdeep Sardesai


राजदीप सरदेसाई पत्रकारिता जगत के जाने माने हस्ती हैं। वे फिलहाल आईबीएन 18 नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ हैं। पत्रकार होने के साथ वे एक पॉलिटिकल कमेंटेटर और न्यूज़ प्रेज़ेंटर भी हैं। पत्रकारिता के लिए उन्हें कई अवार्ड्स भी मिल चुके ... Expand 
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ब्रांड मोदी के आगे सब बौने

Rajdeep Sardesai|Dec 26, 2012, 12:32PM IST
नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी सफलता गुजरात की विकासगाथा को अपने साथ जोड़ने की उनकी काबिलियत है।
 
चुनावी समर के दौरान गुजरात में घूमना किसी शहंशाह के साम्राज्य में विचरण करने जैसा है। इससे पहले कभी किसी राज्य के चुनाव पर किसी एक शख्सियत का इतना प्रभाव नहीं रहा, जितना गुजरात 2012 में नजर आ रहा है। भाजपा की ओर से सिर्फ यह कहने की कसर है कि ‘भाजपा मोदी है और मोदी भाजपा’। (देवकांत बरुआ द्वारा आपातकाल के दौरान दिए गए नारे ‘इंडिया इंदिरा है और इंदिरा इंडिया’ को याद करें।) अहमदाबाद स्थित भाजपा ऑफिस में मोदी का प्रभाव साफ नजर आता है। इसके पोस्टरों, प्रचार पुस्तिकाओं और यहां तक डिजाइनर ग्लव्ज पर भी एक ही शख्स की तस्वीर है।  
 
कांग्रेस अपने चुनाव अभियान में कुपोषण के आंकड़ों का हवाला देती है, गुजरात परिवर्तन पार्टी पटेल समुदाय द्वारा ‘बदला’ लिए जाने की बात करती है, स्थानीय पत्रकार ग्रामीण सौराष्ट्र में पनपते असंतोष को लेकर चेताते हैं, लेकिन स्पष्ट तौर पर कहूं तो गुजरात में सिर्फ एक ही मुद्दा है- नरेंद्र मोदी की छवि। बाकी चीजें गौण लगती हैं।
 
2002 के चुनाव में विहिप संगठन और इसके प्रवीण तोगड़िया जैसे नेता स्टार प्रचारक थे। आज विहिप हाशिये पर है और तोगड़िया तकरीबन अप्रासंगिक हो चुके हैं। 2007 के चुनाव में भाजपा के साथ संघ का मजबूत जुड़ाव था। आज संघ वहां के राजनीतिक परिदृश्य से छिटक गया है। मोदी ने दर्जनों जगहों पर एक साथ अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए जिस 3डी तकनीक को चुना, वह आज के दौर की निशानी है। वह अब पारंपरिक पार्टी उपकरणों से बाहर निकलते हुए मतदाताओं से सीधे संवाद कर रहे हैं। 
 
संभवत: मोदी की सबसे बड़ी सफलता गुजरात की विकासगाथा को अपने साथ जोड़ने की उनकी काबिलियत है। ज्यादातर गुजरातियों की नजर में वायब्रेंट गुजरात=नरेंद्र मोदी है। विशेषकर ‘नियो-मिडिल क्लास’ (इस जुमले का इस्तेमाल मोदी ने घोषणापत्र जारी करते हुए किया) मुख्यमंत्री को अपने निर्विवाद चैंपियन की तरह देखता है। यह नियो-मिडिल क्लास कौन है? यह एक उच्च आकांक्षी, फर्स्ट जनरेशन मिडिल क्लास है, जो आर्थिक उदारीकरण का बड़ा लाभार्थी रहा है। यह टेक्नो-सेवी है और न्यूजर्सी से फ्लोरिडा तक फैले व्यापक गुजराती समुदाय के साथ जुड़ा है। 
 
भाजपा के वर्ष 1995 से गुजरात की सत्ता में काबिज रहने के साथ वहां की एक पूरी पीढ़ी राज्य में सिर्फ भगवा शासन को देखते हुए जवान हुई है। खासकर युवा गुजरात के लिए कांग्रेस पार्टी जातियों के गठजोड़, ‘अल्पसंख्यक तुष्टीकरण’, मुख्यमंत्रियों के भ्रष्टाचार और गांधीवादी मूल्यों का दिखावा करने वाली प्राचीन शासन पद्धति का प्रतिनिधित्व करती है। दूसरी ओर भाजपा को एक ‘नए’ गुजरात के प्रतिनिधि के तौर पर देखा जाता है, जो बेहद उपभोक्तावादी और खुलेआम धार्मिक है, जहां पर अल्पसंख्यकों को उनकी जगह दिखा दी गई है और जहां कोई लोकप्रिय सामाजिक विरोध आंदोलन नहीं होते। गुजराती खासकर तेजी से विस्तारित होते शहरों में लगातार आगे बढ़ रहे हैं, जिनमें नए-नए मॉल्स खुल रहे हैं, रेस्तरां खचाखच भरे रहते हैं, ऑटो शोरूम्स लगातार बढ़ रहे हैं, हाईवे पर जगह-जगह म्युचुअल फंड होर्डिग्स नजर आते हैं। 
 
गुजरात में 43 फीसदी शहरी आबादी और कम से कम आधी सीटों का मजबूत शहरी चरित्र होने के साथ मोदी अपराजेय लगते हैं। कांग्रेस की गुजरात इकाई ने पेयजल, शिक्षा और सस्ते घर दिलवाने जैसे स्थानीय मुद्दों पर फोकस करते हुए मोदी के सुशासन के एजेंडे का मुकाबला करने की कोशिश की है। उसका केंद्रीय नेतृत्व 2002 के दंगा पीड़ितों के साथ टीवी स्टूडियो में सहानुभूति जताता है, लेकिन गुजरात की जमीन पर कदम रखते ही बेहद चौकस हो जाता है। संभवत: इस भय से कि कहीं ‘मौत का सौदागर’ जैसे किसी जुमले के दोहराव से गुजराती मतदाताओं का और भी ज्यादा ध्रुवीकरण न हो जाए। इसी वजह से उसका अभियान बहुत शांतिपूर्वक चल रहा है। 
 
लेकिन कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या अब भी यही है कि उसके पास गुजरात में ब्रांड मोदी का मुकाबला करने लायक कोई विश्वसनीय व करिश्माई चेहरा नहीं है। राज्य चुनाव लगातार राष्ट्रपति चुनाव जैसे होते जा रहे हैं- मतदाता सिर्फ पार्टियों के बीच चुनाव नहीं करते, व्यक्तियों के बीच भी चुनाव करते हैं। भाजपा इस साल की शुरुआत में यूपी चुनाव के दौरान ‘सामूहिक’ नेतृत्व की अवधारणा की सीमाओं का अहसास कर चुकी है। कांग्रेस, जो राज्य में नेताओं की नई पौध खड़ी करने और सशक्त बनाने में नाकाम रही है, गुजरात में इसका अहसास करने की ओर अग्रसर है। भाजपा का एक चुनावी विज्ञापन जिसमें मोदी जैसा एक कबड्डी खिलाड़ी कई अनजान चेहरों से मुकाबला कर रहा है, संभवत: गुजरात महासंग्राम की स्थिति को बेहतर ढंग से दर्शाता है। मोदी बनाम बाकी तमाम प्रतिद्वंद्वियों ने गुजरातियों के लिए चयन करना ज्यादा आसान बना दिया है। 
 
क्या इसका मतलब यह है कि गुजरात चुनाव का निष्कर्ष पहले से तय है? अहमदाबाद के सट्टा बाजार (जो चुनाव विश्लेषकों की अपेक्षा जनता के मिजाज को भांपने का कहीं ज्यादा सटीक औजार है) के मुताबिक ज्यादातर दांव इस बात पर लग रहे हैं कि मोदी कितने अंतर से जीतेंगे। विडंबना यह है कि मोदी की जीत के पैमाने को उनकी गुजरात से परे जाने वाली राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के अहम निर्धारक के तौर पर देखा जा रहा है। यह लगभग वैसा ही है जैसे कि हम जानते हैं कि दक्षिण अफ्रीका की टीम बांग्लादेश को टेस्ट में हरा देगी, लेकिन उसे अपनी नंबर एक की पोजीशन बरकरार रखने के लिए पारी के अंतर से मैच जीतना होगा। 
 
पुनश्च : राहुल गांधी पहले चरण के चुनाव प्रचार के आखिरी दिन गुजरात पहुंचे। जब मैंने एक स्थानीय कांग्रेसी से इसके बारे में पूछा तो उसका जवाब था- ‘राहुलजी राष्ट्रीय नेता हैं और यह राज्य के चुनाव हैं।’ इसके उलट मोदी एक क्षेत्रीय क्षत्रप हैं, जो लगता है कि राष्ट्रीय चुनाव लड़ रहे हैं!
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