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Anuj Khare


देश की बड़ी पत्र - पत्रिकाओं में व्यंग्य लेखों का नियमित का प्रकाशन। दो व्यंग्य संग्रह- चिल्लर चिंतन, परम श्रद्धेय, मैं खुद। फिलहाल दैनिक भास्कर समूह की साइटों में कार्यकारी संपादक।
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विचारों का मुर्दा, स्पेस का ताबूत..

Anuj Khare|Jan 02, 2013, 12:37PM IST
भाई साब! जरा एक अच्छा सा पीस तो भिजवा दीजिए। बस जरा शब्द सीमा का ध्यान रखिएगा। स्पेस का तो आपको पता ही है ज्यादा नहीं है।

स्पेस का झंझट है! हर कहीं।

अखबारों में, मैगजीन में, रिश्तों और जिंदगी में तो खैर है ही, शाश्वत समस्या की तरह।
हालांकि यहां बात लेखन-विचारों के लिए अखबारों में उचित स्पेस न मिलने की हो रही है।
अखबारों में बड़ी फिक्स सी जगह होती है, अपनी बात कहने के लिए। यानी स्पेस का ताबूत पहले से बना होता है अब विचारों का मुर्दा इसी साइज में चाहिए।

न लंबा!
न छोटा!
बिलकुल फिट साइज का।

ऐसा न हो तो विचारों की उन्मुक्त उड़ान को स्पेस की कैंची मारकर धड़ाम से जमीन पर गिरा दिया जाता है। फिर बेचारा घायल विचार फड़फड़ाता रहता है। कोई ध्यान नहीं देता। घायल विचार किसी का ध्यान खींच पाते हैं भला! पूरी सोसाइटी ही इन घायल विचारों के कारण दिशाशून्य सी हो रही है। किसी का घायल विचार-दूसरे किसी के जख्मी विचार सोच को कोई साबुत दिशा नहीं दे पाते हैं।

कई बार इधर आपने विचार लिया। उसे धीरे-धीरे दिमाग की देग में पकाना शुरू ही किया था कि पता चला शब्द सीमा समाप्त।
 विचार असमय ही दिवंगत।
क्या अच्छे भले थे एकाएक हॉर्टअटैक आया।
 नहीं रहे।
‘स्पेस’ की कमी से जाम हो गईं धमनियां।
 नीला पड़ गया मुंह।
 ठंडा पड़ गया शरीर।
 कालजयी दिशा में जाता एक विचार स्मृति शेष हो गया।

  स्पेस का दबाव ही ऐसा है। मितव्ययिता चाहिए सोचने में। विस्तार का तंबू मत तानिए। सीधे अपनी बात कह दीजिए। वरना फिर टांगे छांटनी पड़ेंगी। तब फिट हो पाएगा ताबूत में, हो सकता है बाल भी उड़ाना पड़ें। भले ही कटी-फटी शक्ल निकले, विषय भी पहचानने में न आए!

और अलंकार! अनुप्रास! शब्द सामथ्र्य! भाषा सौष्ठव! भाड़ में जाने दीजिए।

टुंडा विचार भी चलेगा!
मिसाल भैंगी हो रही है जनाब।
कोई बात नहीं भैंगी ही चलेगी!
अरे भाई अभी तो माहौल ही नहीं खेंच पाए थे।
मट्टी डालिए माहौल पर आप तो सीधे-सीधे द एंड पर पहुंच जाइए!
पाठक समझदार हैं, बीच का माहौल खुद ही बना लेंगे। उसके पास भी पढ़ने का स्पेस कम है।

अभी तो पार्क में छोरा-छोरी मिले ही थे। प्यार की पींगे बढ़ा ही रहे थे कि स्पेस के विलेन ने झाड़ियों से लात मार दी। औंधे मुंह गिर पड़े कालजयी रचना के विचार!

सो अब हर तरह का लेखक माहौल नहीं खेंच पा रहा है। जल्दी में सब निपटा देता है।
लेखन में दम नहीं बचा है? सुनने में आ रहा है। इन दिनों। इसलिएं? क्योंकि!
विचारों का अधकच्च फल लद्द से गिरता है। जमीन पर। नौसिखुआ सा कोई आलोचक इसी के आधार पर लेखक की सात पुश्तों को कोस डालता है।

उधर, लेखक पर भी स्पेस का दबाव था। विचार कृत्रिम तरीके से पकाना पड़ा। अधकच्च ही मार्केट में चला दिया। रंग-रूप-स्वाद-पुरानी बात नहीं रही जैसी शिकायतें आने लगती हैं।
स्वाद कहां से आएगा!
स्पेस का दबाव रहा विचारों का नवजात अठमासा ही बाहर आ गया।
कई बीमारियां लेकर।
रचना के बाप और साख दोनों पर भी अलग ही संकट खड़ा कर गया।
हैं! बहन जै का भया है?
ऐसी आवाजें प्रसूति की कमजोरी झेल रहे लेखक का मनोबल और तोड़ देती हैं। फिर लेखक हिम्मत नहीं जुटा पाता है अपना जाया देखने की। दूसरे लेखक का जाया यूं भी कोई लेखक देखता नहीं है।
तो फिर ?
वही टुंडा विचार!
सोसाइटी में दिशाशून्यता! बौरायापन!

हालांकि लेखन ही क्यों हर जगह स्पेस में कमी आ रही है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। दायरे सिकुड़ रहे हैं। रिश्ते सिमट से गए हैं। हम-तुम के स्पेस में मां-बाप तक नहीं समा पा रहे हैं। यहीं देख लीजिए अपनी बात कहने का ढंग से माहौल भी नहीं बना पाया कि लीजिए खर्च हो गई जगह। स्पेस की कमी की बात भी मुंह की मुंह में रह गई।
हां उम्मीद के साथ अपनी बात समाप्त करता हूं...
वो दिन कभी तो आएगा,  जब हम खाल में रहना। स्पेस में कहना सीख पाएंगे।
शायद आएगा...!
आमीन।
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