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जो कोई न कर सका, नई पीढ़ी को यह जिम्मा: पुलिस को झकझोरने का

Kalpesh Yagnik|Jan 07, 2013, 15:09PM IST
'यदि उन्होंने खाकी वर्दी नहीं पहनी होती तो वे हमारी तरह सामान्य होते। तो वर्दी के हिसाब से कुछ सही नहीं कर पा रहे तो..., 'नेक्स्ट’... यानी किसी और को वर्दी दे दी जानी चाहिए’।
- वह युवा जो भारतीय इतिहास में नारी गरिमा पर जन-जागृति का कारण बनी नृशंसता का गवाह बना और लड़ा। (4 जनवरी 2013 को पहली बार खुली बातचीत में)

आखिर ऐसा क्या है इस खाकी वर्दी में कि पहनते ही सारी संवेदनाएं समाप्त हो जाती हैं? रोज एक से बढक़र एक घटनाएं। मीडिया के कोड़े। लोगों का आक्रोश। कोर्ट की कड़ी फटकार। किन्तु नहीं ही बदलती पुलिस। बनी रहती है निर्मम। आज एक अत्याचार कर उठी भी नहीं होती कि कल किसी और को प्रताडि़त करने का उत्साह। अपराधियों को नहीं, निर्दोष को। शिकायत करने पहुंचे आम इन्सान को। वारदात करने वालों से तो थर-थर कांपती है पुलिस। छवि यही है। 

दहला देने वाली नृशंसता के बाद दिल्ली से जागे देश की चिंताएं और भी बढ़ गई हैं। कारण स्पष्ट है- कानून चाहे जितना कठोर बना दें- कानून के रखवालों के अनुसार ही तो लागू होगा। और कानून तो बाद की बात है। पहले तो साधारण सुरक्षा देनी होगी। नारी गरिमा को गिराने वालों को फांसी तो दें ही। किन्तु नारी की रक्षा वास्तव में पहले करनी होगी। घटना घट ही न सके, ऐसा कुछ करना होगा। क्योंकि कठोर कानून बनाने की हमारी राष्ट्रव्यापी मांग सही तो है किन्तु उसमें एक दर्दनाक बात छुपी है। उसका अर्थ यही हुआ कि पहले नारी उस जघन्य वारदात का शिकार हो जाए फिर हमारी व्यवस्था उसे न्याय दिलाएगी। यानी हम पाशविक घटनाओं को होने से रोकने की बात बहुत कम कर रहे हैं। कौन रोकेगा? निश्चित ही कानून के रखवाले। पुलिस। और वो कैसी है, यह वह स्वयं प्रतिदिन सिद्ध करती जाती है, करती जाती है। रहेगी। 

तो कैसे 'कुछ’ काबू में आएगी पुलिस? युवा क्रांति से ऐसा हो सकता है। दिल्ली जैसा। हम अहमदाबाद से ऐसी ही क्रांति ला सकते थे। जब दिल्ली में बच्चियां-नवयुवतियां राष्ट्रपति भवन की भव्य और कठोर प्राचीरों को ललकार रही थीं- उसी समय अहमदाबाद की हैवानी घटना सामने आई। प्रकाश देवीपूजक नामक आरोपी ने 14 वर्षीय बच्ची को उठा लिया। यंत्रणाएं दीं। बंद कर रखा। और शोषण करता रहा, करता रहा। बच्ची उसकी पत्नी की ही छोटी बहन थी। पत्नी गर्भवती थी। पहले एक बेटी को जन्म दे चुकी थी जिसके कारण यातनाएं खाते-खाते वह मृतप्राय महसूस करती थी। इसीलिए माता-पिता ने उसे देवीपूजक के साथ भेजने से इनकार कर दिया था। बदला लिया देवीपूजक ने। वो भी अपने साथी के साथ। सामूहिक पाप। और पुलिस ने क्या किया? जब गायब हुई बच्ची के लिए माता-पिता पुलिस तक पहुंचे तो पुलिस ने कहा- आ जाएगी, चिंता क्यों करते हैं? पूरे 8 दिन बाद रिपोर्ट लिखने को राजी हुए। बच्ची को हर तरह से तबाह कर, देवीपूजक व साथी उसे फेंक गए। और बाद में, गिरफ्तार होने पर, बच्ची के राज़ी-मर्जी से अपने साथ जाने की कहानी गढ़ दी। 

चरम पर था तब दिल्ली का युवा आक्रोश। बस, वैसा ही युवा आक्रोश यदि अहमदाबाद में भडक़ उठता तो पुलिस घबरा जाती। घबराती नहीं भी- संभवत: नहीं ही घबराती- तो भी दबाव, कुछ दबाव में तो आती ही। आगे कोई देवीपूजक कई बार सोचता। कम से कम सुनियोजित ढंग से जो महिलाओं की गरिमा गिराने के लिए वारदात करते हैं - वे तो घबरा ही जाते। 

ऐसा ही फिर पटियाला में होना चाहिए था। जब दिल्ली में युवा देश को जगा रहे थे- तब पटियाला पुलिस ने इंसाफ का तराज़ू अपने हाथ में ले लिया। नारी गरिमा को कुचलने के लिए अपनी निर्लज्जता का भार एक पलड़े पर रख दिया। वहां पाशविकता का शिकार बनी बेटी की मां से पुलिस ने पूछा- पहले उन दरिंदों ने लडक़ी की जीन्स उतारी या शर्ट? सबसे पहले कौन सा लडक़ा ऐसा करने आया? और न जाने कैसे-कैसे सवाल। पहले वकील ऐसा पूछा करते थे। अब पुलिस करने लगी। संसार में ऐसा अपराध दूसरा नहीं हो सकता जिसमें नारी की हत्या कर दी जाती है किन्तु वह रहती जिंदा है। रखा जाता है। पटियाला की उस बेटी ने तो आत्महत्या कर ली, अहमदाबाद की बच्ची ने भी ज़हर पी लिया था। बचा ली गई। 

यदि युवा पंजाबी आक्रोश भडक़ उठता, तो वो जो 'देश के जागने’ की बात हो रही है, वह होने लगता। वास्तव में। फिर तो ये युवा किसी बात से पीछे न हटते। डटे रहते। फिर चेन्नई के इंजीनियरिंग छात्र सडक़ों पर उतर आते। कोटा में कुछ होने पर कोचिंग ले रहे हजारों-हजार विद्यार्थी अपराधियों को पाठ पढ़ाते। पुणे की मैनेजमेंट छात्राएं मशाल जुलूस निकालतीं। मुंबई में यूं पढ़ाई में लगे रहने वाले किन्तु फडक़ती रगों वाले मानुस, अपनी व्यस्तता छोड़, ऐसे अमानुषों को मानवीय दंड देते। वे कुंठित कर देने वाली ऐसी ही एक घटना कुछ ही वर्ष पहली जनवरी के स्वागत में हो रही पार्टी में भुगत चुके हैं। सडक़ पर। सब शर्मिंदा। जो बाकी रह गया वह असम ने कर दिखाया। असम की महिलाओं ने। उन्होंने दोषी कांग्रेस नेता बिक्रम सिंह ब्रह्मा को सरेआम पकड़ कर घुमाया। पीटा। कपड़े फाड़ दिए।

दिल्ली की नृशंस घटना के चश्मदीद और उसका मुकाबला करने वाले नौजवान ने पुलिस की बेदर्दी, आपराधिक लापरवाही और अराजकता का दर्दनाक दृश्य उजागर कर दिया है। यही तो वह पुलिस है जो राष्ट्रीय दबाव के बाद उन छह हैवानों को गिरफ्तार कर, अपने 'पौरुष’ पर बधाइयां बटोर चुकी है। उनके कमिश्नर नीरज कुमार ने कहा था 'ग्रेट जॉब’!

यही तो वह पुलिस है जिसकी पुंसत्वहीन उलझन यह थी कि दिल्ली की वह घटना 'किस थाने में मानी जाए’! और यही क्यूं, जोधपुर के ब्यावर-बिलाड़ा के बीच बस में निकृष्ट व अश्लील हरकतें कर रहे युवक को बुलंदी से जब हिला ने थाने पर सौंपा तो वहां की पुलिस भी यही बोली- 'इस थाने में नहीं मानी जाएगी यह घटना, उस थाने में जाओ’।! थानों की सीमाएं, आम भारतीयों के धैर्य की सीमाएं तोड़ चुकी हैं। कभी भी बाढ़ आ सकती है। रोष की। किन्तु पुलिस का क्या- वह उसे भी तोड़ देगी। दमन से। आसूं गैस गोले। वॉटर कैनन। लाठियां। गोलियां भी। अपराधियों पर तो हाथ तक नहीं उठते, आक्रोशित युवा पीढ़ी पर तो गोलियां भी चलाई जा सकती हैं। निरंकुश जो ठहरी। थियेनआनमन चौक बना भी नहीं है हिन्दुस्तान में। फिर किसी मुख्यमंत्री के मातहत तो है नहीं पुलिस। कहीं लेफ्टिनेंट गवर्नर के अंडर में है। कहीं मुख्यमंत्री को गवर्न करती है पुलिस। कोई भी पुलिस अफसर, एक चौथाई भी, हमारी फिल्मों में दिखाए जाने वाला एंग्री यंग मैन क्यों नहीं होता? वो क्यों नहीं संजीव कुमार की तरह कहता कि खाकी वर्दी ही अब उसका कपड़े-गहना भी है और कफन भी। वर्दी नहीं एक इमेज है। ड्यूटी पर हों या निजी जीवन में, यह इमेज ही अपराधियों को डराती है। वर्दी नहीं उसूल पहन लिए हैं। कवच कुण्डल। 

अहमदाबाद से प्रसंगवश एक बात और। दिल्ली की घटना के बाद सबसे अधिक रोष प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर भी निकला था। कमजोर कहा गया था उन्हें। ईश्वर न करे कोई ऐसी वारदात हो- किन्तु यदि ऐसा कुछ अहमदाबाद में अब हो जाता है तो युवाओं को वहां दिल्ली से भी बड़ी क्रांति करनी चाहिए- पता चल जाएगा कि देश के भावी नेतृत्व का सपना संजोए 'छोटे सरदार’ वास्तव में किस तरह के लौहपुरुष हैं।

पुलिस में संवेदना जगे, यह असंभव है। किन्तु जगानी ही होगी। झंझोड़ देना होगा उसे। क्योंकि चाहे जितनी बदनाम हो, व्यवस्था उसी के पास है/रहेगी। पुलिस का सुनियोजित जनाक्रोश से तो पाला पड़ा है किन्तु युवा क्रांति से नहीं। पुलिस वास्तव में युवाओं और उनकी ताकत को जानती ही नहीं। जो काम पुरानी पीढ़ी नहीं कर पाई, उसमें पुलिस को मनुष्य बनाना एक बड़ा काम है। आशा ही नहीं, पूर्ण विश्वास है- नई पीढ़ी ऐसा पढक़र कुछ न कुछ संकल्प अवश्य ले रही होगी।

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