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Kalpesh Yagnik


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आखिर क्यों कट जाते हैं हमारे सिर?

Kalpesh Yagnik|Jan 17, 2013, 13:28PM IST
जब तक मेरे शहीद पति का सिर सरकार मेरे गांव नहीं लाती, तब तक मुझे चैन नहीं मिलेगा।
- शहीद हेमराज की पत्नी धर्मवती (८ जनवरी २०१३ को मेंढर में लांसनायक हेमराज का सिर पाक फौज ने काट दिया।)

कब तक सरकार शांत बैठी रहेगी, पाक से मैच खेलती रहेगी, सांस्कृतिक कार्यक्रम करती रहेगी।
-शहीद सौरभ कालिया के पिता, एन.के. कालिया (‘99 के करगिल युद्ध में कैप्टजन कालिया की देह पाक ने क्षत-विक्षत कर लौटाई थी)

शेरनगर की मीना सिंह सचमुच शेरनी हैं। बेटा था उनका हेमराज। लांसनायक था। अब नायक है। हीरो। मथुरा का, उत्तर प्रदेश का, सारे देश का। सिर झुकाया नहीं। मां ने यही तो कहा कि 'वो काट सकते हैं, झुका नहीं सकते’। 

दढिय़ा गांव सीधी जिले में है। सीधा सरल ही तो था सुधाकर सिंह। पत्नी दुर्गा देवी, मानों दुर्गा ही बन गई। लोगों की सलामी के बीच तेजस्वी चेहरा लिए। बोली मुझे भी फौजी बना दो। मध्यप्रदेश ही नहीं, देश का मान रखा पति ने। 

इलाहाबाद के सीआरपीएफ जवान बाबूलाल पटेल का सामना पाकिस्तानियों से नहीं, नक्सलियों से हुआ। झारखंड में मुठभेड़ के दौरान शहीद इस जांबाज को काट कर नृशंसता का सबसे निकृष्ट उदाहरण देते हुए नक्सलियों ने उनके भीतर बम लगा दिया। देश सकते में आ गया। हालांकि अब आ रहा है कि शक्तिशाली विस्फोटक का पाक की कुख्यात खुफिया आईएसआई से संबंध है। 

ऐसे बर्बर हमले आखिर हम पर क्यों हो रहे हैं? क्यों होते ही रहते हैं? प्रश्न बहुत पुराना और अनुत्तरित है। कुछ अनुमान यहां लगाए जा रहे हैं :

- पाक फौज जानती है उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा
- हमारी सेना मानती है उसे 'शांत’ रहने को कहा जाएगा
- पाक फौज, पाक सरकार पर हावी है
- हमारी सेना, गरिमा के साथ, सरकार और देश के मूल्यों के अनुरूप चलती है
- पाक सरकार खुद फौज और आंतकियों का घालमेल करा चुकी है
- हमारी सरकार न पाक फौज में खौफ पैदा कर पाई है, न ही आतंकियों में

पाक फौज जानती है उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा :
इतिहास है। और पाक फौज को इतिहास खूब पढ़ाया जाता है। ताकि वे वैसा ही करते रहें। पाक फौज में क्रूरता, विशेष गुण माना जाता है। ‘71 के युद्ध की ही बात लें। शहीदों के क्षत-विक्षत शवों के रोंगटे खड़े कर देने वाले उदाहरण हमेशा याद रहेंगे। हमने, उनसे ठीक उलट, गिरफ्त में आए हजारों पाक फौजियों को माफ किया। शवों को ससम्मान, भारतीय मूल्यों के अनुरूप लौटाया। कारगिल युद्ध में जिस पाशविक रवैये के साथ हमारे जांबाज कैप्टफन सौरभ कालिया को तबाह किया गया, कभी न कभी इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में ये सामने आएगा। एक अदालत ऊपर वाले की भी तो है, उसका निर्णय बल्कि उसका न्याय, तो पता नहीं। 

कई बार तो लगता है पाकिस्तानी फौजियों ने विश्वयुद्ध की नृशंसता को आत्मसात कर रखा है। 1942 और 1945 के खौफनाक अमानुष 'डेथ मार्च’ किस सैनिक को याद नहीं हैं? जापानी बदले की भावना में इतने गिर सकते हैं- कि हजारों अलाइड सैनिकों को महीने भर तक भूखे-प्याकसे-तड़पाते चिलचिलाती धूप और जलने वाले रास्तों पर चलाते-दौड़ाते रहे। कभी कुछ बूंदें दे दीं कि ज़िंदा तड़पता देख सकें। ऐसा ही हजारों फिलिपीनियों के और कुछ अमेरिकी सैनिकों के साथ किया गया।। मार्च। मौत की परेड। भारतीय सैनिक तो 'प्रेम पुजारीट की तरह हर मुठभेड़, हर फौज पर मानवीय दृष्टि से सोचता है। युद्ध में वह मातृभूमि के लिए न्योछावर होता है- भारत माता की रक्षा में वह दुश्मनों को मार गिराता है। 

इसीलिए, हम किसी का सिर, यूं ही भड़काने के लिए, व्यर्थ नहीं काटते। क्या इसीलिए संभवत: हमारे सिर काटे जाते है? प्रश्न ही है। निष्कर्ष नहीं। 

हमारी सेना मानती है उसे 'शांत’ रहने के लिए कहा जाएगा :
यह केवल मान्यता नहीं है। सच है। इसीलिए तो एक ही साल में तीन-तीन बार युद्ध की अमानवीय कोशिश कर पाया था पाकिस्तान। सन ‘65 की ही बात हो रही है। साल की शुरुआत गुजरात में कच्छ के रण से। भारी घुसपैठ। लगातार हमले। धोखे से अंदर भेजे भेदिए। कुछ देर तक तो चला, फिर हमारी सेना की भुजाएं फडफ़ड़ाईं। फोड़ कर रख दिया। वीर जो ठहरीं। वे हैं कायर। छुप कर वार करते हैं। कुछ ही माह बाद वही ठंड, बर्फबारी, कोहरा, धुंध। धुंधलका, धोखा, घुसपैठ, हमला। हमले। भारत माता की जयजयकार करते हमारे जांबाजों ने फिर खदेड़ दिया। गुरिल्लों को आगे रखा था पाक ने। और साल के अंत तक सब तरफ राजस्थान, पंजाब, कश्मीर। बुरी तरह हराया हमने। किन्तु हर बार हमारी सरकार से 'शांत’ रहने की ही सीख मिलती रही। वरना हर- हर महादेव का जयघोष कर टूट पडऩे वाले रणबांकुरों को तीन-तीन बार एक ही तरह के छल, कपट और चोरी आधारित दुश्मनों को धराशायी करना पड़े- यह संभव नहीं। नहीं तो हमारे सैनिक कैसे हैं- खेमकरण सेक्टर के हीरो हवलदार अब्दुल हामिद को सारे राष्ट्र का ताजा सैल्यूट! तीन-तीन पैटन टैंकों को उड़ा दिया, चौथे टैंक को तोड़ दिया। खुद टुकड़े-टुकड़े हो गए वतन पर- किन्तु एक धूल का कण दुश्मन पाक को ले जाने न दिया। तोपों की सलामी! 
परमवीर हामिद!

पाक फौज, पाकिस्तान सरकार पर हावी है :
यह तो सारा विश्व जानता है। किन्तु इसकी दोषी पाकिस्तानी सरकार ही तो है। वह स्वयं लोकतंत्र नहीं, आर्मी-अदालत-अल्लाह के नाम पर चलती है। अल्लाह को व्यर्थ इसमें शामिल कर रखा है। क्योंकि मजहबी कट्टरपंथी किसी तरह मुल्क को कब्जे में रख सकें- इसलिए ऐसे खौफ पैदा कर दिए गए हैं। खुद पाकिस्तानी दानिशवर पूछते हैं कि अल्लाह ऐसे सिर काटने वालों को, दोज़ख में भी जगह क्यों देंगे? फौज की वहां के सरकार पर हुकूमत का सबसे बड़ा उदाहरण जनरल परवेज़ मुशर्रफ हैं। आर्मी चीफ थे। बर्खास्त कर दिए गए। बगावत कर दी। तख्ता पलट दिया। खुद सरकार बन बैठे। राष्ट्रपति। प्रधानमंत्री। राष्ट्रपति। सदर-ए-ताउम्र। भले न रह पाए। चाहते तो यही थे। चले भी खूब। फिर चलते किए गए। भागते नज़र आए। पाकिस्तान जो ठहरा। वहां कोई सुरक्षित नहीं। बिन लादेन भी नहीं। हाफिज़ सईद भी नहीं रहेगा। लाव-लश्कर सहित खत्म होगा। सलाहुद्दीन और उसके हिजबुल की सलामती की कोई गारंटी नहीं। हमारी सेना का कोई भी योद्धा, उसे, इन सभी आतंकियों को, कभी भी थरथरा देने वाली सज़ा दे देगा। 

हमारी सेना, गरिमा के साथ, सरकार और देश के मूल्यों को अनुसार चलती है:
सन् 1947 से हमारी सेना ने विश्व में अपनी परम्परा, प्रतिष्ठा और अनुशासन के साथ सर्वोच्च राष्ट्रीय भावना और भारतीय मूल्यों के लिए मर मिटने का संकल्प ले रखा है। कभी विचलित नहीं हुई। पाकिस्तानी ही नहीं अमेरिका ने भी सीआईए के माध्यम से कई भड़काने वाले कदम उठाए। भारतीय सैनिक चट्टान की तरह खड़े ही रहे। कश्मीर में जब राजा हरिसिंह ने तय किया कि वे भारत में ही रहेंगे- जी-जान से पाकिस्तानी फौज और कबाइली पठानों के भेष में भेजे घुसपैठियों को ‘47 में भी वैसे ही हराया था, जैसे ‘99 के कारगिल युद्ध में। उनका अपना कोई सपना नहीं- केवल मातृभूमि के लिए सपना। 

पाक सरकार, खुद फौज-आतंकियों का तालमेल कर बैठी है :
इसी ताज़ा घटना को लें। सिर काटने की नृशंसता आतंकियों जैसी ही तो हरकत है। फिर यह समाचार कि हाफिज़ की लश्कर-ए-तैयबा ने ऐसा करवाया। या कि आईएसआई ने नक्सलियों को विस्फोटक भेजे। या कि कारगिल युद्ध जो पहली बार शांति के सर्वोच्च कदम के ठीक बाद हुआ। नवाज़ शरीफ ने अटल बिहारी वाजपेयी का स्वागत किया। दिल खोलकर रख दिया था। सद्भावना यात्रा की बस, बस आर्मी को रास न आई। न आतंकियों को। ठीक इसके बाद करगिल युद्ध - इन्हीं दोनों ने शरीफ से ही करवाया। यूं नवाज़ इतने भी शरीफ न थे।

हमारी सरकार, न पाक फौज में खौफ पैदा कर पाई, न आतंकियों में :
यह निष्कर्ष है। हम संसद पर हमला सह गए। हजरतबल हो या अक्षरधाम। हम कुछ न कर सके। एक 'सॉफ्ट स्टेट’ बनकर रह गए। पहाड़ों को हिला देने में सक्षम परमवीरों - योद्धाओं का राष्ट्र। किन्तु कमजोर सरकार। हमारी सरकार, चाहे किसी पार्टी- नेता की हो, पाक में खौफ पैदा कर सके यह असंभव ही है। किन्तु करना ही होगा। अटल बिहारी वाजपेयी से मनमोहन सिंह तक ने ऐसा कुछ नहीं किया। इसीलिए तो मुंबई 26/11 हुआ। इसीलिए मेंढर में सिर काट दिया। इसीलिए तो माओवादी हमारे जिस्म में बम रखने लगे। नो मैन्स लैंड! वास्तव में। नियंत्रण रेखा पर भी 'नो मैन्स लैंड’ होता है। जवान के जिस्म में बम रखने का दृश्य भी जिस मशहूर हॉलीवुड फिल्म से हैं- उसका नाम भी 'नो मैन्स लैंड’। और नेतृत्व के अभाव का अहसास भी तो हमें 'नो मैन्स लैंड’ बना देता है।

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