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Kalpesh Yagnik


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कहां गए वो जुनूनी कांग्रेसी; वो नौजवानों की अनंत भीड़?

Kalpesh Yagnik|Jan 22, 2013, 12:26PM IST
'आज का नया भारत अपनी आवाज़ बुलंद करने में ज्यादा सक्षम है। नेताओं से नौजवान अपना हक मांग रहे हैं और वे अब ज्यादा सहन करने को तैयार नहीं हैं।'
                                                 -जयपुर कांग्रेस चिंतन शिविर में सोनिया गांधी, 18 जनवरी 2013

एक-सवा लाख लोगों का जुटना सामान्य बात होती थी जब इंदिरा गांधी भाषण देने कहीं पहुंचती थीं। वे करिश्माई थीं। उन्हें छोड़ें। राजीव गांधी की रैलियों को लें। डेढ़ लाख तक पहुंचते। चमत्कारिक वे नहीं थे। चमत्कार उनकी पार्टी के जुनूनी नेता करते। अधिकतर नौजवान नेता। युवाओं की भीड़ इकठ्ठी कर लेते। अनंत भीड़। सबकुछ जोशीला होता। ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद। एक गुट, दूजे से भिड़ता। तीखे तेवर। हां-ना। स्वागत। हार-फूल। सैकड़ों जीप-मोटरसाइकल। मंच। उमड़ते-घुमड़ते कार्यकर्ता। झंडे ही झंडे। लोग क्रोधित होते। 'कांग्रेस 
कैरेक्टर' को कोसते। भीड़तंत्र कहते। फिजूलखर्च मानते। ट्रक-ट्रैक्टर-ट्रॉली भरे कार्यकर्ता, किन्तु, जूझते ही रहते। सबकुछ होता। बुरा। अच्छा। अधिकतर बुरा। किन्तु होता सबकुछ जुनून से ही। 

फिर चुनाव आते। कांग्रेस को कोसने वाले लोग ही, सप्रेम, कांग्रेस पर मुहर लगा आते। जिता देते। ज़िंदाबाद-मुर्दाबाद। 

जयपुर कांग्रेस शिविर में सोनिया गांधी ने इसी 'कांग्रेस कैरेक्टर' की याद ताज़ा कर दी। राजीव गांधी को जब हवाई अड्डों और रेसीडेन्सी कोठियों या सभा स्थलों पर उनके पोट्रेट भेंट किए जाते, वे भलेपन से कहते: जहाज में ठीक से रखवा दीजिए। अक्सर सोनिया साथ होती 
थीं। देखतीं कि वही हुजूम, कैसे अजीब अंदाज में आता और अलग ही तरह से वोट दिलवा जाता। बात वोट की नहीं हो रही। किन्तु कठोर सत्य यही है कि समूची राजनीति का आधार वोट ही तो है। सारा चिंतन - चाहे पचमढ़ी और शिमला में हुआ हो या कि अभी जयपुर में हो रहा हो- अंतत: लोगों का भरोसा 'वोट' के रूप में जीतने के लिए ही तो है। और एकदम सही भी है।कोई भी राजनीतिक दल यदि वोट नहीं पाता तो स्पष्टत: अप्रासंगिक हो जाता है। पतन हो जाता है उसके नेताओं का। 

तो बात हो रही थी सोनिया गांधी के उस वाक्य की जिसमें उन्होंने कहा कि गठबंधन अहम है- किन्तु हमें 'कांग्रेस कैरेक्टर' नहीं छोडऩा चाहिए। यदि हम सिलसिलेवार कांग्रेस की चिंताएं पढ़ें तो पाएंगे कि सभी के मूल में उसका वो मूल चरित्र खो देना ही है। मूल चरित्र में कई कमियां थीं। बड़ी गड़बडिय़ां भी थीं। कुछ विचित्र था। कुछ विचलित कर देने वाला भी था। किन्तु इसी को चरित्र कहते हैं। अपने मूल के साथ आगे बढ़ते लोग, संगठन, संस्थान यदि समय के अनुसार अपनी सोच और तैयारी के तरीकों में परिवर्तन करते रहें तो परिणाम भी उनके पक्ष में होने से उन्हें कोई रोक नहीं सकता। 

कांग्रेस का मूल हमेशा से भीड़ रही है। नौजवानों की भीड़। कहां है? कांग्रेस की ताक़त हमेशा ही उसके जुनूनी नेता रहे हैं। शीर्ष पर बैठे नेताओं का शीर्ष स्तर का जुनून। मोहल्ले के कांग्रेसियों का अपना जुनून। कहां है अब? और सोनिया गांधी की चिंता है : 
'जो राज्य हमारे गढ़ थे, वहीं हम सत्ता से बाहर हैं। बाहर ही रहेंगे यदि वो जुनून नहीं लौटा। फ्रॉम टाउन टू गाउन - ठेठ मैदानी कार्यकर्ताओं की जमघट से लेकर सत्ता की प्राचीरों में बैठे उच्च अभिजात्य नेताओं तक। वो नशा राजनीति का। अब देखने में नहीं आता। तो हार तो होगी ही। शिविर का चिंतन यही है न कि हमारे परम्परागत गढ़ों में सेंध लग गई। कर्नाटक जैसे राज्य कांग्रेस को खारिज कर गए। उत्तरप्रदेश का प्रश्न कभी कोई गैर-कांग्रेसी पार्टी हल ही नहीं कर पाती थी। आज अपमानजनक हार उसकी आदत बन चुकी है। ऐसा ही गुजरात में। मध्यप्रदेश में दस साल रहने के बाद दसवां ही साल बाहर, बेबस इसी कारण से तो चल रहा है। और न जाने आगे कितना समय चलेगा। 

नई पीढ़ी की इच्छाएं, महत्वाकांक्षाएं और बढ़ती अपेक्षाएं कांग्रेस की बड़ी चिंता बनकर उभरना अत्याधिक आश्चर्यजनक है। किन्तु सच भी। सही समय पर। आश्चर्यजनक इसलिए कि नई पीढ़ी ने कांग्रेस को नहीं छोड़ा। कांग्रेस ने ही उसे छोड़ रखा है। सोशल मीडिया और टेक्नोलॉजी से अपनी ज़िंदगी आसान कर रही तीक्ष्ण बुद्धि वाली यह पीढ़ी अब हर मुद्दे पर सतर्क है। आगे जो बढऩा चाहती है। कांग्रेस में जिन्हें 'युवा नेता' कहा जा रहा है वे वास्तव में इस पीढ़ी के हैं ही नहीं। लगभग पिछली पीढ़ी के हैं। थोड़ा-सा ही उस पीढ़ी बाद के। इसीलिए नौजवानों की आवश्यकताओं से परे है। कॉलेज और युनिवर्सिटी में छात्रसंघों के चुनाव अब होते नहीं। कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने ही बंद करवाए। ठीक ही किया। कैम्पस पढ़ाई के लिए है, चुनावी राजनीति के लिए नहीं। सोच अच्छी थी। किन्तु नौजवान नेताओं की नर्सरी ख़त्म कर दी गई। और चूंकि छात्र-छात्राओं के बीच चुनाव लड़े-जीते-हारे युवा स्थानीय निकाय, विधानसभा और संसदीय चुनावों में अब उन्हें नहीं दिखते- इसलिए आज के युवा उन उम्मीदवारों को नहीं जानते। न ही मानते। टेक्नोलॉजी तो राजीव गांधी ने देश में फैलाई। विरोधी मखौल उड़ाते थे उनकी कम्प्यूटर क्रांति का। 21वीं  सदी के भारत का। आज सारे विरोधी, अधिक चतुराई से, इसी टेक्नोलॉजी का उपयोग कर आगे बढ़ रहे हैं। कांग्रेस पिछड़ रही है। उसके नेता-मंत्री तो सोशल मीडिया पीढ़ी का मुंह बंद, सोच बंद करने की योजनाएं ला रहे हैं। कहां से जुड़ेंगे? और क्यों जुड़ेगा कोई युवा?
 
महिलाएं कांग्रेस से दूर हो गईं। क्यों हुईं? जैसे युवा हुए, वैसे ही। सुदूर गावों में, महिलाएं तरह-तरह के परम्परागत श्रृंगार कर कांग्रेस को कभी गाय-बछड़े पर वोट देती थीं। वे ही हाथ के पंजे पर देने लगीं। फिर हट गईं। वो जो इंदिरा गांधी का जादू था, वह बना रहा कुछ समय तक। फिर राजीव गांधी के भोलेपन और सुदर्शन व्यक्तित्व पर कांग्रेस को आशीर्वाद मिलता था महिलाओं का। फिर न जाने क्या हुआ, महिलाएं कांग्रेस से चिढऩे लगीं। संभवत: महंगाई के कारण। एक धारणा तो यह भी बनी हुई है महिलाओं में कि कांग्रेस आते ही महंगाई आएगी। दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि इतने बड़े चिंतन शिविर में भ्रष्टाचार की बात तो बुलंदी से उठाई गई, किन्तु महंगाई पर 
एक शब्द न कहा। क्योंकर जुड़ेंगी महिलाएं? विशेषकर जबकि दिल्ली की नृशंसतम् वारदात के बाद जिस तरह कांग्रेस की सरकार बचती रही महिलाओं से। उनकी सुरक्षा को लेकर कोई कठोर कार्रवाई आज भी सामने नहीं आई है।

भ्रष्टाचार पर कांग्रेस चाहे जो कहे, जितनी चिंता व्यक्त करे- उसका रेकॉर्ड भयावह है। इसीलिए लोग इसे सुनेंगे नहीं। 'कांग्रेस केरेक्टर' में पहले भी था कि भ्रष्ट मंत्री हटते-लौटते-फिर हटते फिर लौट जाते। बने रहते। 

सशक्त कांग्रेस, कांग्रेस पार्टी के लिए ही नहीं, देश के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जाती थी। अब क्यों नहीं? कांग्रेसियों में वो 'जुनून' लौटे, असंभव है। किन्तु लौटाना ही होगा। क्योंकि जुनूनी नेता चाहे वोटों के लिए ही सही, जनहित में कुछ जुनूनी करते जाएंगे, करते जाएंगे। इससे अन्य नेताओं में भी स्पर्धा बढ़ेगी। जुनून में वे 'डेवलपमेंट' का नारा लाए। करते चले गए। कांग्रेस को हराकर जीतते चले गए। जुनूनी स्पर्धा खड़ी करनी होगी।
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