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Rajdeep Sardesai


राजदीप सरदेसाई पत्रकारिता जगत के जाने माने हस्ती हैं। वे फिलहाल आईबीएन 18 नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ हैं। पत्रकार होने के साथ वे एक पॉलिटिकल कमेंटेटर और न्यूज़ प्रेज़ेंटर भी हैं। पत्रकारिता के लिए उन्हें कई अवार्ड्स भी मिल चुके ... Expand 
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एक दिलचस्प राजनीतिक द्वंद्व की तैयारी

Rajdeep Sardesai|Jan 25, 2013, 12:50PM IST
पत्रकारों  व दर्शकों को ‘महामुकाबले’ देखना बेहद पसंद है। संभवत: इसी वजह से राजनीतिक पंडित अभी से 2014 में राहुल गांधी बनाम नरेंद्र मोदी की जंग की भविष्यवाणी करने लगे हैं, जबकि आम चुनाव का बिगुल बजने में देर है। वैसे कांग्रेस के मृदुल ‘युवराज’ और भाजपा के माचो ‘प्रचारक’ के बीच इतना अद्भुत विरोधाभास है, जिसे नजरअंदाज करना मुश्किल है।

एक जन्म से ही वीआईपी है, जिसे भारतीय राजनीति के सबसे टिकाऊ ब्रांड का नाम मिला, जबकि दूसरे का बचपन मुश्किलों भरा रहा, जिसके पिता कभी सरपंच तक नहीं बने। एक नेहरूवादी भारत के विचारों की विरासत को आगे बढ़ाने का दावा करता है;  वहीं दूसरा हिंदुत्व राष्ट्रवाद के वैकल्पिक विचार का प्रतिनिधित्व करता है। भाजपा इस विषमता को ‘वंशवाद बनाम काबिलियत’ के रूप में पेश करना चाहती है; वहीं कांग्रेस इसे धर्मनिरपेक्षता बनाम सांप्रदायिक विभेद के रूप में प्रोजेक्ट करना चाहेगी।
 
मोदी बेहतरीन कम्युनिकेटर हैं, वहीं राहुल बड़ी जनसभाओं में असहज नजर आते हैं। एक जनभावनाओं को उद्वेलित कर सकता है, तो दूसरा विनम्र है। मोदी के बारे में माना जाता है कि वह सीईओ स्टाइल में शासन चलाते हैं, तो राहुल ‘सिस्टम’ में सुधार की बात करते हैं। एक को ‘नव-मध्यम वर्ग’ का आइकॉन माना जा रहा है, तो दूसरा युवा भारत की आकांक्षाओं का प्रतिनिधि होने का दावा करता है। जाहिर है, राष्ट्रपति चुनाव शैली की इस रेस में राहुल बनाम मोदी एक आकर्षक संभावना है, जिसका लोगों को इंतजार रहेगा।
 
वैसे राहुल और मोदी के समक्ष एक जैसी चुनौतियां हैं। दोनों से अतीत की गलतियां सुधारने के लिए कहा जा रहा है। पिछले नौ वर्षो से राहुल ऐसी राजनीतिक तितली की तरह बने हुए हैं, जो राजनीति की धूल और गर्मी में अंदर-बाहर होती रहती है। अब उनसे यह साबित करने के लिए कहा जा रहा है कि वह लंबी लड़ाई लड़ सकते हैं। मोदी को भी वर्ष 2002 की गुजरात हिंसा काबू न कर पाने की नाकामी को स्वीकारने के लिए ललकारा जा रहा है। उन्होंने एक विकासोन्मुखी मुख्यमंत्री के रूप में अपनी छवि को फिर से गढ़ने की कोशिश जरूर की, लेकिन दंगों के दौरान एक विशेष समुदाय के लोगों का कत्लेआम रोकने के लिए पर्याप्त प्रयास न करने का कलंक अब भी उनके माथे पर है, जिसे सिर्फ अच्छे ढंग से रची गई ‘सद्भावना यात्रा’ के जरिए नहीं मिटाया जा सकता।
 
राहुल और मोदी दोनों ही अपनी-अपनी पार्टी में यथास्थितिवाद को चुनौती दे रहे हैं। जो कांग्रेस बदलाव की प्रतिरोधी के रूप में कुख्यात है, उसी कांग्रेस को राहुल नए और अपेक्षाकृत ज्यादा युवा नेतृत्व के लिए खोलते हुए ‘लोकतांत्रिक’ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। दुर्भाग्य से ‘सत्ता का जहर’ (जैसा वे सत्ता के बारे में कहते हैं) देश की इस सबसे पुरानी पार्टी की नसों में इतना गहरा समा गया है कि राहुल के लिए पार्टी संरचना में आमूलचूल सुधार की अपनी नेक मंशाओं को अमल में लाना मुश्किल है।
 
मोदी भी अंदर से सुधार करना चाहते हैं। जो पार्टी ‘सामूहिक नेतृत्व’ की अवधारणा से जुड़ी हो और जिस पर अभी भी आरएसएस जैसे बाहरी संगठन का नियंत्रण हो, वहां मोदी की व्यक्तिपरक और तकरीबन तानाशाह कार्यशैली को संघ परिवार के भीतर उनके विरोधियों के बीच संदेह और डर की नजर से देखा जाता है। गुजरात में मोदी संघ के पारंपरिक नेतृत्व को हाशिये पर धकेलने में सफल रहे, लेकिन संघ मुख्यालय और भाजपा की संसदीय इकाई के बीच शक्ति-संतुलन में इसी तरह का बदलाव लाना उनके लिए काफी मुश्किल होगा।
 
दोनों के बीच कुछ और समानताएं भी हैं। मोदी और राहुल दोनों ही गठबंधन राजनीति के दौर के नेता हैं और अब तथाकथित ‘राष्ट्रीय दलों’के तेजी से सिकुड़ते सामाजिक व भौगोलिक आधार की आशंकाओं से जूझ रहे हैं। जैसा कि राहुल को पिछले साल पता लगा कि उत्तर प्रदेश नेहरू-गांधी परिवार से भावनात्मक लगाव के दौर से बहुत आगे निकल चुका है। नए मुखर जाति समूह अब सत्ता में बड़ी हिस्सेदारी चाहते हैं। मोदी को भी इस हकीकत के साथ चलना होगा कि बिहार जैसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले राज्यों के नीतीश कुमार जैसे क्षेत्रीय क्षत्रप उनके साथ सार्वजनिक मंच पर नहीं आना चाहते।
 
संभवत: इस वजह से भी जो राजनीतिक पंडित अगले चुनाव को राहुल बनाम मोदी की जंग बता रहे हैं, उन्हें अपनी गणित व केमिस्ट्री दोनों दुरुस्त कर लेनी चाहिए। उच्च प्रतिस्पद्र्धी और विविधतापूर्ण राजनीतिक मैदान का गणित आपको बताता है कि अगले चुनाव में बाजी उसी के हाथ लगेगी जो मायावती, मुलायम, ममता बनर्जी, जयललिता, पवार, नवीन पटनायक, नीतीश और यहां तक कि जगन जैसे ज्यादा से ज्यादा संभावित किंगमेकरों को अपने साथ जोड़ने में कामयाब होगा। वहीं केमिस्ट्री बताती है कि इनमें से ज्यादातर क्षेत्रीय खिलाड़ियों की कोई स्थायी निष्ठा नहीं है और उनमें से कई ऐसे किसी भी गठबंधन के साथ जुड़ने को तैयार हो जाएंगे, जो उन्हें सत्ता में साझेदारी का अवसर दे।
 
हालांकि राहुल का आरोहण और मोदी का संभावित उद्भव इनकी पार्टी के लोगों को उत्साहित कर सकता है। कांग्रेस संगठन के पास एक ही फेविकोल है, जो इसे साथ जोड़े रख सकता है- ‘प्रथम परिवार’। बाहरी लोगों को जो ‘चमचागिरी’ लगती है, वह कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए पार्टी में अपना अस्तित्व बनाए रखने का आधार है। भाजपा को भी ऐसे करिश्माई चेहरे की सख्त दरकार है, जो कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा सके। पार्टी अध्यक्ष के तौर पर राजनाथ सिंह महज एक समझौतावादी फॉमरूले का नतीजा हो सकते हैं, पर मोदी जैसा शख्स ही भाजपा में आत्मविश्वास का भाव जगा सकता है।
 
लिहाजा कांग्रेस और भाजपा के वफादारों के लिए राहुल बनाम मोदी एक रोमांचक मुकाबला होगा। देश के बाकी लोग किसी आश्चर्यजनक राजनीतिक ग्रैंडस्लैम दावेदार के लिए तैयार रहें। 
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