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Anuj Khare


देश की बड़ी पत्र - पत्रिकाओं में व्यंग्य लेखों का नियमित का प्रकाशन। दो व्यंग्य संग्रह- चिल्लर चिंतन, परम श्रद्धेय, मैं खुद। फिलहाल दैनिक भास्कर समूह की साइटों में कार्यकारी संपादक।
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वे चिंतित हैं : देश कहीं गर्त में न गिर जाए!

Anuj Khare|Jan 25, 2013, 13:40PM IST
हैं तो वे मूलत: हमारे पुराने मित्र। ऊपर से संवेदनशील हैं। स्वाभाविक है इंसान हैं तो होंगे ही.. जब-तब भावनाओं में बह जाते हैं। हर राष्ट्रीय मुद्दे पर उद्वेलित हो जाते हैं। कांपने लगते हैं। ज्यादा गुस्सा हो जाते हैं तो खांसने भी लगते हैं। ‘हैं जी! क्यों होगा जी! देश गर्त में न गिर जाए जी!’ टाइप की पितातुल्य बातें करते हैं। 

फिर मुद्दों और समस्याओं को काफी गहराई में झांककर भी देखने लगते हैं। कई बार तो इतना नीचे तक झांक लेते हैं कि उसी में गिर जाते हैं। फिर मुद्दे में ही डूबने-उतराने लगते हैं। हां, बीच में सांस लेने के लिए मुंडी मुद्दे से ऊपर निकालते रहते हैं। रिटायरमेंट के बाद से ही देश चिंतन का फुलटाइम जॉब कर रहे हैं। गर्त और देश के बीच दीवार बनने को प्रयासरत हैं।

‘अजी, ये डेमोक्रेसी देश को कहीं का नहीं छोड़ेगी। 50 पार्टियां हैं। 500 नेता हैं। पांच हजार को लालबत्ती चाहिए। देश की किसी को भी परवाह नहीं है। गर्त..’‘देश तो चल रहा है और माशाल्लाह क्या खूब तरक्की कर रहा है!’ किसी ने याद दिलाया।

‘हें!’ उन्होंेने ऐसे आंखें फैलाईं, जैसे किसी दूसरे देश का जिक्र किया जा रहा हो। सामने क्या चल रहा है, इसे भर देखते हैं। उसी पर विचार भी रखते हैं। अगला मुद्दा हाथ आते ही पिछले को पराए लड़के की तरह अनाथ छोड़ देते हैं। ठाठ से जीते हैं, ठप्पे से मुद्दों पर राय प्रकट करते हैं। अभी पिछले दिनों ही क्रिकेट टीम के सीनियरों पर भड़क रहे थे।

‘संन्यास दिलाओ भई इन्हें! कब तक बोझ बने रहेंगे। जोंक हो गए ये तो.. चिपके ही रहना चाहते हैं देश की टीम से।’फिर किसी ने उन्हें याद कराया। अभी पिछले टूर में ही तो सीनियरों ने इज्जत बचाई थी। नए लड़के तो कुछ नहीं कर पाए थे।

‘कब!’ झट्टदेनी से आंखें फैला दीं। 2-जी, 3-जी कोई-सा भी जी हो, लगातार भड़कते हैं। भारी ऊर्जा के साथ ‘क्यों जी!’ ‘हें जी!’ ‘लो जी!’ से ‘क्या होगा जी!’ के दो पाटों के बीच हर भ्रष्टाचार को कुचल डालते हैं। मुद्दा कराहता-सा पड़ा रहता है। वे संतुष्टि के साथ दूसरे मुद्दे को ‘क्यों जी!’ के दो पाटों तले रौंदने के लिए निकल चुके होते हैं। एकदम फिक्स रूटीन है उनका। सुबह नाश्ता, दोपहर को भरपूर नींद.. शाम को मुद्दों पर घनघोर प्रवचन.. रात को देशहित के सपनों भरी परिपक्व नींद। एक क्षण के लिए भी देश को अकेला नहीं छोड़ना चाहते हैं।

कहते हैं देश की फिकर हम नहीं करेंगे तो वह तो गर्त में गिर ही जाएगा। कोई और तो सोच नहीं रहा है। मैं तो हॉर्ट पेशेंट हूं, फिर भी देश के लिए दिन-रात चिंता किए बैठा रहता हूं।

किसी मुद्दे पर बहस करने को आ जाएं तो न जगह देखते हैं, न समय की परवाह करते हैं। जब धाराप्रवाह बोलते हैं तो उनकी लगन देखने लायक होती है।

अभ्यास! रियाज! तेज नजरें! विश्लेषण की अद्भुत क्षमता! उपयुक्त शब्दावली! वॉइस मॉड्यूलेशन! पूरी बारीकी और सारे तर्को सहित वे खांसते-खांसते अपनी बात पूरी करके ही मानते हैं।

पिछले कई सालों से वे अपने दिल की बीमारी सहित देश और गर्त के बीच दीवार बने हुए हैं। विडंबना देखिए, देश में किसी को उनकी परवाह ही नहीं है। यूं तो उन्हें भी किसी की परवाह नहीं है। रिटायर हैं। टाइम पर पेंशन मिल जाती है। दोपहर को भरपूर नींद लेते हैं। शाम को अफरा मिटाने के लिए कुछ तो चाहिए न..
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