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Kalpesh Yagnik


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राष्ट्रपति स्वयं क्यों नहीं त्याग देते ऐसा निकृष्टतम अधिकार?

Kalpesh Yagnik|Jan 28, 2013, 13:03PM IST
'फांसी की सज़ा को माफ करना राष्ट्रपति की इच्छा पर निर्भर नहीं है। यह उनका दायित्व है कि माफी देने से अभियुक्त को लाभ तो हो, लेकिन यह भी ध्यान रखें कि उनके फैसले का पीडि़त परिवार पर क्या असर होगा।'
               -जस्टिस अरिजित पसायत और जस्टिस एसएच कपाडिय़ा (2006 में माफी के एक फैसले को रद्द करते हुए)

'हमने अपराधियों को सज़ा दिलाने के लिए अपना खेत बेच दिया। 16 साल के बाद फांसी हुई। अब हमारी देख-रेख करने वाला कोई नहीं बचा, लेकिन राष्ट्रपति ने दया हत्यारों पर दिखाई।'
               -मनोरमा मिश्रा, (24 जनवरी 2013 को भास्कर से कहा। इनके पति सहित पांच परिजनों की हत्या की गई थी)

यह बहस आपको विचलित कर सकती है। इतनी विचारोत्तेजक है। राष्ट्रपति सर्वोच्च हैं। उनके अधिकार भी सर्वोच्च होने ही चाहिए। देश के किसी भी आरोपी, अभियुक्त या सज़ायाफ्ता को कभी भी माफी देने का उनका अधिकार उनके सर्वोच्च होने का ही प्रतीक माना जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय फांसी दे तो भी वे क्षमा कर सकते हैं। यानी सर्वोच्च से भी उच्च।

सच्चाई यह नहीं है। निकृष्टतम है ऐसा अधिकार। राष्ट्रपति पद की शोभा के अनुकूल ही नहीं है। गणतंत्र में सभी व्यवस्थाओं के कर्तव्य व अधिकार स्पष्ट हैं। चुने हुए प्रतिनिधियों से विधायिका है। वे कानून बनाते हैं। तंत्र व सरकार चलाने के लिए कार्यपालिका है। न्याय 
के लिए न्यायपालिका। लेजिस्लेचर। एक्ज़ीक्यूटिव। ज्यूडिशरी। चौथा स्तंभ मीडिया। इनके सबसे अपने-अपने दायरे तय।

इनमें राष्ट्रपति को न्यायपालिका और उससे भी ऊपर अधिकार किसी भी स्थिति में स्वाभाविक नहीं लगता। नैसर्गिक नहीं लगता। उचित नहीं लगता। और... न्यायसंगत तो कतई नहीं लगता। 

ब्रिटिश आतताइयों ने ऐसा अधिकार अपनी सुविधा से 'क्राउन' यानी राजा-रानी के पास रख रखा था। उन्हें लोगों को, देशों को ग़ुलाम बनाकर रखने का अमानवीय शौक था। सो वे हर काम के पीछे स्वार्थ सिद्ध करते थे। वे भगा दिए गए। स्वतंत्रता संग्राम में हर व्यक्ति ने, हर भारतीय ने अपनी तरह से योगदान दिया। विवश किया अंग्रेजों को कि वे देश छोड़ें। अंग्रेजों के साथ, किंतु, कुछ बातें नहीं गई। कुछ उच्च स्तरीय लोगों ने कई तरह से ब्रिटिश तौर-तरीकों को जीवित रखा। प्रश्न उठाया जा सकता है कि हमारी संविधान सभा और स्वतंत्र भारत के निर्माताओं ने क्यों कई ब्रितानी बातें जारी रखीं? विशेषकर तब जबकि वे शीर्ष स्तर के व्यक्तित्व, उद्भट विद्वान और सर्वाधिक समर्पित भारतीय थे? उत्तर इतिहास में स्पष्ट है। सरल शब्दों में यह है कि वे नए राष्ट्र का निर्माण कर रहे थे। इसलिए सावधानियां बरत रहे थे। फूंक-फूंक कर कदम उठा रहे थे। चूंकि समूचे विश्व में कुप्रचार हो रहा था कि भारत, सैकड़ों टुकड़ों में बिखर जाएगा। इसीलिए हमारे निर्माताओं ने गज़ब की राजनीतिक सूझ-बूझ दर्शाते हुए काम किया। हर व्यवस्था में नियंत्रण किसी और 
का। हर 'किसी और' पर नियंत्रण उसी का, जिसे 'किसी अन्य तरीके' से वह स्वयं नियंत्रित कर रहा हो! जैसे :
राष्ट्रपति, राष्ट्राध्यक्ष होंगे। सर्वोच्च। प्रथम नागरिक। तीनों सेनाओं के भी प्रमुख। 
किन्तु, 
प्रधानमंत्री, शासनाध्यक्ष होंगे। देश का वास्तविक नियंत्रण उन्हीं के पास होगा। यानी सर्वोच्च शक्ति उन्हें प्राप्त होगी।
किन्तु,
राष्ट्रपति उनकी नियुक्ति करेंगे। वे यदि संतुष्ट होंगे कि बहुमत है, तो ही वे बनने देंगे। 
इसी तरह,
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति की नियुक्ति राष्ट्रपति करेंगे।
किन्तु,
राष्ट्रपति को शपथ, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति दिलाएंगे। 
राष्ट्रपति को किसी संवैधानिक मसले पर सलाह लेनी हो तो वे सर्वोच्च न्यायालय से लेंगे। 
सर्वोच्च न्यायालय, वास्तव में सर्वोच्च है। सुप्रीम कोर्ट के पास राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री सभी के मामले सुनवाई के लिए आते हैं। किन्तु, विधायिका के अधिकारों में सुप्रीम कोर्ट दखल नहीं दे सकती। स्पष्ट है कि 'चेक एंड बेलैंस' के सिद्धांत अपनाए हमारे निर्माताओं 
ने। इसीलिए भारतीय गणराज्य आन, बान और शान से एक महान संप्रभु राष्ट्र के रूप में स्थापित हो सका। हमेशा रहेगा। 

किन्तु वो समय था वैसा। जैसे-जैसे देशकाल और वातावरण बदला, हमारे नेतृत्व ने बदलाव किए। संविधान संशोधन। यही तो वो खुलापन है जो भारत को भारत बनाता है। किसी भी पुरातन बात से चिपके न रहना। हर अच्छी, बेहतर बात को अपनाना। नए-नए 
परिवर्तन करना। कहीं कोई अहं नहीं। कहीं कोई अप्रासंगिकता नहीं। 

ऐसे में, आज, जबकि नारी की गरिमा गिराने वाले जघन्यतम अपराधों के विरुद्ध राष्ट्रीय रोष उफान पर है, यह ज्वलंत प्रश्न उठा है कि ऐसे नृशंस अपराधियों को फांसी हो भी गई तो राष्ट्रपति उन्हें माफ कर देंगे। जिन परिवारों का सबकुछ लुट गया, उन्हें लूटने वालों 
के पक्ष में दिखेंगे राष्ट्रपति। हमारे राष्ट्रपति! लोकतंत्र के सर्वोच्च रखवाले। उत्कृष्टतम पद पर आसीन गरिमामयी व्यक्तित्व। और ऐसी धारणा इसलिए मजबूती से बनी हुई है कि पांच अमानुषों को - जिन्होंने छोटी-छोटी बच्चियों को तबाह कर, पाप किया, उन्हें हमारी 
राष्ट्रपति ने फांसी नहीं होने दी। माफ कर दिया। वह भी महिला राष्ट्रपति ने! जो उजड़ गए, उन पर क्या बीती, भास्कर ने उन्हीं से पूछा। दु:खों का पहाड़ टूटा था। अब क्रोध और कुंठा। राष्ट्रपति के प्रति। इसलिए राष्ट्रपति के इस अधिकार पर सीधा प्रश्नचिन्ह।

यह छद्म विलाप है कि राष्ट्रपति केंद्रीय गृह मंत्रालय से बंधे होते हैं। ऐसा होता तो डॉ. शंकरदयाल शर्मा कभी भी हर माफी अर्जी को खारिज न कर पाते। उन्होंने एक न सुनी। सुप्रीम कोर्ट ने फांसी दी है तो रहेगी। नारायणन ने अर्जियों को अर्जी ही बनाए रखा। एपीजे 
अब्दुल कलाम ने स्तब्ध कर दिया। अपनी छवि के विरुद्ध उन्होंने कड़ा रुख नहीं दिखाया। वह माफी अर्जियों पर बैठे रहे। जबकि, पहले गैर-राजनीतिक राष्ट्रपति के रूप में वे कोई क्रांतिकारी कदम उठा सकते थे। किन्तु वे भी अवसर चूक गए। कहां बंधे हुए हैं राष्ट्रपति 
किसी से? प्रतिभा पाटील ने तो पाशविक हत्यारों को 'मानवीय' आधार पर क्षमा किया ही।

अब अवसर प्रणब मुखर्जी के पास है। उन्होंने परंपरा तोड़ी भी है। बनते ही कहा- 'महामहिम' न कहें। कोई महामहिम नहीं है। सच कहा। किन्तु शब्दों से नहीं, कर्मों से परिवर्तन आता है।

कोई भी व्यक्ति अपने अधिकार नहीं छोडऩा चाहता। चाहे वह अपने राजनीतिक-सार्वजनिक जीवन के उत्तरार्ध में क्यों न हो। राष्ट्रपति भी। अधिकार त्यागना असंभव है। किन्तु त्यागने ही होंगे। ऐसे अधिकार जो आपको शक्तिशाली तो बनाते हैं - किन्तु हमेशा वे दुरुपयोग के रूप में ही दिखेंगे। तो ऐसी शक्ति को तत्काल त्याग देना ही आपको 'बड़ा' बनाएगा। जो क्षेत्र आपका नहीं है, उसकी शक्ति या तो व्यर्थ जाएगी या अनर्थ कराएगी। राष्ट्रपति रहते, प्रणब मुखर्जी, यदि घोषणा करते हैं कि वे इस शक्ति को त्याग रहे हैं- तो उनकी जयजयकार ही होगी। शक्ति-सत्ता-गद्दी छोडऩे वाला ही हमारे संदर्भों में राम हुआ है। 
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