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Kalpesh Yagnik >> क्या आपने मोदी-राहुल तुलना शुरू नहीं की है? 'मोर’ से कर सकते हैं
Kalpesh Yagnik
दैनिक भास्कर समूह के नेशनल एडिटर
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क्या आपने मोदी-राहुल तुलना शुरू नहीं की है? 'मोर’ से कर सकते हैं
Kalpesh Yagnik|Feb 15, 2013, 16:49PM IST
'भारत के युवा को अलग नजरिए से देखने की जरूरत है। युवा राष्ट्र के लिए विकास शक्ति का नया युग है। हमारे युवा स्नेक चार्मर्स (सपेरे) नहीं हैं, वे माउस चार्मर हैं’।
-नरेन्द्र मोदी, गुजरात के मुख्यमंत्री, 6 फरवरी 2013 को दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में छात्रों को संबोधित करते हुए।
'आज का युवा गुस्से में क्यों है? वह सड़कों पर क्यूं उतर आया? उसके गुस्से की वजह है-राजनीतिक विमुखता। वो राजनीति के किनारों पर खड़े हैं और उनके चारों ओर ताकतवर सत्ता लाल बत्तियों में घूम रही है’।
-राहुल गांधी, कांग्रेस उपाध्यक्ष, 20 जनवरी 2013 को जयपुर में आयोजित चिंतन शिविर के दौरान।
यह सबसे बड़ी किन्तु सबसे बेमेल तुलना है। किन्तु शुरू हो चुकी है। होनी ही चाहिए। तय थी। समूचे देश की रुचि है इस तुलना में।
यहां नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी की बात हो रही है। सभी कर रहे हैं।
यदि आपने अभी इस बहस में भाग लेना शुरू नहीं किया हो तो अब और देर करना ठीक नहीं।
दिल्ली के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स में जोर-शोर से भाषण देकर मोदी ने इसे एकदम प्रासंगिक बना डाला है। जिस पर यूरोपियन यूनियन ने 11 वर्ष पुराना 'अबोला’ समाप्त कर मोदी महत्ता को पुरजोर बढ़ावा दे दिया है। आगे देखने वाले युवा मोदी में दमखम वाला भावी प्रधानमंत्री देखने लगे हैं। ये तत्काल परिणाम चाहने वाले, शहरी युवा हैं। उधर, परम्परागत परिवारों के, विशेषकर ग्रामीण भारत के, युवा गांधी-नेहरू परिवार के नए उत्तराधिकारी की ओर, भरोसे से देख रहे हैं। देश की रीढ़ की हड्डी माना जाने वाला मध्यम वर्ग गज़ब के तथ्यों और तर्कों के साथ दोनों नेताओं की तुलना कर रहा है। अच्छी। बुरी। अर्थपूर्ण। उद्देश्य के अंतर्गत। यूं भी। बिना किसी उद्देश्य के। कैसे भी।
दो व्यक्ति जो पूरी तरह एक-दूजे से भिन्न हैं। एक-दूसरे के खंडन। दोनों राजनीति में हैं- इसलिए, और दोनों प्रधानमंत्री पद के शक्तिशाली दावेदार माने जा रहे हैं - इसलिए, तुलना की तराजू पर हैं। अन्यथा 100 प्रतिशत विपरीत हैं दोनों। जन्म, पालन-पोषण, पृष्ठभूमि से लेकर विचारधारा, कार्यशैली और व्यक्तित्व।
किन्तु एक रुचिकर समानता ढूंढ़ी जा सकती है दोनों में। मोर के समान हैं दोनों नेता। नरेंद्र दामोदरदास मोदी की राजनीतिक देहयष्टि, विकास का रंग-बिरंगा पहरावा और प्रशासनिक क्षमताओं की सुडौलता, मोर-सी सुंदर है। चित्ताकर्षक। किन्तु 2002 के भयावह दंगे, उनकी सरकार के संरक्षण में फैले वो दंगे मोर के पैर के समान हैं। मोर का शरीर सुंदर और पैर कुरूप होते हैं। दंगे, मोदी के सुदर्शन राजनीतिक शरीर में कुरूप पैरों के समान बने हुए हैं। सच। कर्कश।
ठीक उल्टा राहुल के साथ है। वे मोर की तरह नयनाभिराम हैं। भावुक कर देते हैं - इसलिए मन को भाते हैं। किन्तु देश की बड़ी-बड़ी बातों और छोटे-छोटे बिन्दुओं पर उनका क्या विचार है- किसी को पता नहीं। यानी जंगल में नाचे मोर की तरह। तीखे राष्ट्रीय विवादों पर और राज्यों के कड़वे सच पर उनकी सोच होगी अवश्य। कोई रूप होगा अवश्य। किन्तु किसी ने देखा नहीं है। इस तरह असाधारण असमानता में भी समानता। भारत जो ठहरा।
मोदी जितना जोर से बोलते हैं - खरी-खोटी सुनाते हैं - राहुल उतने ही शांत हैं। उत्तरप्रदेश चुनावों में एक बार शोर मचाया था किन्तु संभवत: किसी स्क्रिप्ट के अंतर्गत। स्वभाव के विरुद्ध। इसलिए अस्वाभाविक लगे। बदल लिया स्वयं को। सरल हैं। सरल हृदय हैं। पिता समान। इसलिए जब कहा कि 'मां मेरे कमरे में आईं, रो पड़ीं'- तो सारे राष्ट्र ने मन से माना। विश्वास किया।
मोदी खूब बोलते हैं। कुछ ज्यादा ही। दूसरी ओर, राहुल संसद में दो ही बार बोले हैं। भाषण के रूप में।
मोदी के केवल तेवर आक्रामक नहीं हैं। उनकी निर्णय लेने की शैली भी स्पष्ट है। तेज़ है। उनके समूचे आचरण में तेज है। राहुल निर्णय से दूर रहते हैं। उनकी शैली निर्णय लेने वाली व्यवस्था से दूर रहने की है। तेज उनमें भी है किन्तु भलेपन का।
मोदी पैकेजिंग की बात लाए हैं। ज़ीरो डिफेक्ट। यानी त्रुटि नहीं होनी चाहिए। राहुल पहले संगठन को मजबूत करना चाहते हैं; जहां डिफेक्ट बहुत है, समय बहुत कम। वह भी बिना कुछ निगेटिव किए।
मोदी सत्ता पाने और संभालने के लिए विशेष तौर पर जाने जाते हैं। राहुल सत्ता से बचते हैं। संभालने की बात आते ही उनके वो विशेष तौर-तरीके सामने आने लगते हैं जिनमें पद से परे रहने का अच्छा गुण और जिम्मेदारी न लेने की अनुचित बात दोनों झलकती है। वैसे, अब उन्होंने जिम्मा ले लिया है।
मोदी 'वन मैन शो’ हैं। राहुल सबको साथ में लेकर चलने वाले हैं। मोदी के 'शो’ सफल-दर-सफल रहे हैं। होते जा रहे हैं। राहुल के 'रोड शो’ तो जो रहे हैं वो रहे ही हैं किन्तु उनका 'शो’ सामने आना अभी बाकी है। और, यही बात इस बहस को कभी-कभी व्यर्थ बना देती है। असंभव है दोनों की तुलना। किन्तु करनी ही होगी। क्योंकि राष्ट्र, संभवत: पहली बार, दो स्पष्ट नेताओं को देखकर अपना भविष्य तय करेगा। और पूरे गांभीर्य के साथ चुनेगा। एक सीईओ है। दूसरा प्रिंस। एक कठोर है। दूसरा भावुक। एक सांप्रदायिकता के आरोप से गुजरा है/रहेगा। दूसरा साम्राज्यवाद/वंशवाद के आरोप से त्रस्त है/रहेगा। एक युवाओं को लुभाने में लीन है। दूसरा स्वयं युवा है। और तल्लीन है। एक को तानाशाह-सा बताया जाता है। दूसरे को शहजादा कहा जाता है। दोनों के ऊपर कोई 'हाई कमान’ नहीं है। न ही होगी। इसलिए हमें ही वोटर के रूप में हाई कमान बनना होगा। इनकी कमान हमारे ही हाथों में लेनी/रखनी होगी। बस! इस बहस में भाग लेते रहिएगा।
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