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भास्कर विश्लेषण: हर पहलू में राजनीति इसलिए ढेर सारे अर्थ

Kalpesh Yagnik|Feb 15, 2013, 17:10PM IST
प्र. अफजल की फांसी को इतना गोपनीय क्यों रखा गया?
उ. मामला नाजुक था। कई पहलुओं से गुप्त रखना न सिर्फ अनिवार्य था वरन् सबसे प्रभावी तरीका भी। एक शब्द की भनक लगते ही हंगामा हो सकता था। शोर वैसे बाद में भी मच सकता है/ मचता ही है। किन्तु 'बाद' में कुछ बचता ही नहीं है। खुदकुशी जैसा ही नाजुक है फांसी वाला पल। बस, एक पल टाल दीजिए- फिर खुदकुशी करना नामुमकिन सा है। वैसे ही एक बार टलते ही फांसी देना फिर मुमकिन नहीं। सूझबूझ भरी थी यह गोपनीयता। हां, इस बार 'सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री को भी हमने खबर नहीं दी, इतना गुप्त रखा' जैसा अजीब बयान नहीं दिया गृहमंत्री ने। परिपक्वता।

प्र. सब-कुछ यानी कसाब जैसा ही है? 
उ. जी नहीं। दोनों में सिर्फ 4 बातें एक सी हैं । 1. दोनों आतंकी थे 2. दोनों को कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने फांसी पर लटकाया 3. दोनों को सुबह-सुबह अति गुप्त तरीके से सजा दी गई 4. दोनों की सूचना हर आम आदमी को परिचितों के मैसेज से सुबह-सुबह मिली। बाकी दोनों में जमीन आसमान का फर्क है। 

प्र. कसाब-अफज़ल में जमीन-आसमान का फ़र्क? कौन से फ़र्क हैं ये? 
उ. कसाब सरहद पार से आया था। अफजल हमारी सरज़मीं का था। कसाब में ज़हर भरा गया था। अफजल ज़हर भरता था। कसाब ग़ैरकानूनी तरीके से घुस कर आया था। अफजल ग़ैरकानूनी 
तरीके बता रहा था। कसाब हत्यारा था। हमलावर था। जिस्मानी मौजूदगी थी उसकी। अफज़ल हत्यारों - हमलावरों की साजिश बुन रहा था। मददगार था उसका। दिमाग़ी मौजूदगी थी उसकी। लेकिन सबसे बड़ा और ख़तरनाक फर्क कुछ और था...

प्र. सबसे बड़ा और 'खतरनाक' फर्क?
उ. वह था माहौल और माहौल बनाने वाले। कसाब को लेकर एकतरफा माहौल बना- वह आतंकी है। कई घरों को तबाह किया। उसे फांसी दो। अफजल का माहौल अलग रहा। एक बड़ा वर्ग उसके साथ खड़ा हो गया। उसे मासूम बताते हुए। कानून को अंधा करार देते हुए। इनमें बड़े बुद्धिजीवी खास सेकुलर दानिशवर थे। खूब सुबूत जुटाते। तकरीर करते। कुछ शख्सियतों ने तो किताब लिख दी अफजल के पक्ष में। और ठीक उल्टे, देश का बहुत बड़ा वर्ग अफज़ल को सुप्रीम कोर्ट के इंसाफ के हिसाब से फांसी पर न चढ़ाने के लिए सरकार पर चढ़ गया। फांसी में देर क्यों? कांग्रेस की सरकार आठ साल तक अफज़ल के पक्ष में खड़ी रही। या कि दिखती तो वैसी ही रही। 

प्र. कांग्रेस और उसकी सरकार से इसे इतने लंबे समय तक टाला क्यों? 
उ. कांग्रेस ने इसे पूरी तरह वोटों से जोड़ कर देखा। चूंकि एक प्रभावशाली तबका अफजल के पक्ष में खड़ा हो चुका था - इसलिए कांग्रेस के पास बहाना भी था। जिस तरह से उसका वोट बैंक टूटा, 
उसकी चिंता बढ़ती गई। चूंकि मामला संसद पर हमले के षड्यंत्रकारी का था, इसलिए वह 'माफ' करने की ग़लती तो कर नहीं सकती थी। सो उसने गृह मंत्रालय, दिल्ली उपराज्यपाल और दिल्ली व कश्मीर सरकार के दफ्तरों में मामले और फाइलों को उलझा दिया। राष्ट्रपति के पास रुकवा लिया। फाइल ग़ायब तक रही!  दैनिक भास्कर ने 31 मई 2010 के अंक में इस पर खोजपरक- शोधपरक पत्रकारिता कर सिद्ध किया था कि कितनी राजनीति और कितने षड्यंत्र रचे गए एक मामले में। 

प्र. तो उसी कांग्रेस सरकार ने अब फांसी क्यों दे दी? 
उ. दोहराना आवश्यक होगा कि राजनीति में काम करने वाले हर काम राजनीतिक दृष्टि, राजनीतिक दूरदृष्टि, राजनीतिक तुष्टि, राजनीतिक संतुष्टि के लिए ही करते हैं। इसकी चाहे जितनी 
निंदा, आलोचना, भर्त्सना, प्रहार किया जाए, राजनीति जारी ही रहेगी। हर पार्टी हर नेता यही कह रहा है। कि इस पर राजनीति न करें - और करता ही जा रहा है। करने दी जानी चाहिए।

प्र. क्या इसे नए राष्ट्रपति और नए गृहमंत्री की हिम्मत कहा जाए? 
उ. प्रणब मुखर्जी ने निश्चित ही तेजी और कानून के राज के प्रति सम्मान दिखाया है। लेकिन एक सच्चाई देखनी जरूरी है- वह है बदला हुआ माहौल। दिल्ली के नृशंस कांड के बाद जनाक्रोश फांसी माफ कर देने के विरुद्ध भी भडक़ा हुआ है। इसलिए राष्ट्रपति किसी फांसी को टाल दें या माफ कर दें - संभव नहीं है। गृह मंत्रालय या गृहमंत्री का तो ख़ैर प्रश्न ही नहीं कि वह ऐसा दु:स्साहस करेंगे। इसलिए, इन दोनों को दाद देने वालों को भी इस महत्वपूर्ण माहौल आधारित सच्चाई के संदर्भ में ही उनके फैसले को देखना चाहिए। और इनके मूल में कांग्रेस नेतृत्व है। बग़ैर 10, जनपथ की मर्जी के पत्ता भी नहीं हिलता। 

प्र. तो क्या नरेंद्र मोदी फैक्टर भी इसके पीछे काम कर रहा है? 
उ. निश्चित। शहरी और बातचीत करने वाला वर्ग मोदी को 'फैसले लेने वाले एक ताकतवर प्रधानमंत्री' के रूप में अभी से देख रहा है। धारणा बनाता है यह वर्ग। इसीलिए फांसी के बाद दिनभर केंद्रीय मंत्री कहते रहे- हम फैसले लेते हैं। लागू करते हैं। गुजरात सरकार जैसा नहीं करते कि 2002 के दंगाइयों पर कोई ठोस कार्रवाई ही नहीं की, सज़ा नहीं दी!

प्र. 'भगवा आतंक' पर भाजपा का बहिष्कार झेल रहे गृहमंत्री राहत पाएंगे अब? 
उ. एक अलग और अजीब विश्लेषण है। 'भगवा आतंक' का मामला अब लगता है एक गहरी सोच के अतंर्गत लाया गया था। कहा जा सकता है कि मोहम्मद अजमल कसाब के बाद मोहम्मद अफ़जल गुरु को फांसी देने से पहले एक तरह की 'अग्रिम जमानत' थी। आतंक को रंग देने की कोशिश। भाजपा बहिष्कार करे या गृहमंत्री राहत पाएं - इसमें किसी की कतई रुचि नहीं है।
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