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Chetan Bhagat


चेतन भगत एक भारतीय लेखक हैं। नॉवेल, स्टोरीज़ और कॉलम लिखने के साथ साथ वे एक अच्छे वक्ता भी हैं। देश की 5 बेस्टसेलिंग नॉवेल के वे लेखक हैं। उनकी पहली नॉवेल 'फाइव प्वाइंट समवन' 2004 में आई थी जो बेस्टसेलर बनी। उसके बाद 2005 में 'वन नाइट एट द ... Expand 
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राजनीति में नैतिकता का सवाल

Chetan Bhagat|Oct 31, 2012, 16:46PM IST

दोस्तों  का होना गैरकानूनी नहीं है। लोग तो इसे अच्छा ही मानते हैं। इसी तरह किसी दोस्त की मदद करना भी गैरकानूनी नहीं है। हमारे देश की संस्कृति भी इसे प्रोत्साहित करती है। दोस्तों के बीच यह मदद लेन-देन के रूप में हो सकती है, जहां पर दोनों पक्ष एक-दूसरे के लिए कुछ करें। वहीं यह एकपक्षीय भी हो सकती है, जहां सिर्फ एक ही पार्टी दूसरे की मदद करे। यह भी गैरकानूनी नहीं है। अलबत्ता दोस्तों में तो ऐसा चलता रहता है।

तो फिर रॉबर्ट वाड्रा को लेकर देश में इतनी हायतौबा क्यों मची है? आखिर पिछले कुछ सालों में उनकी संपत्ति में जबर्दस्त इजाफे की बात सुनकर लोगों की आंतों में मरोड़ क्यों उठ रही है? आखिर लोग वाड्रा द्वारा लक्जरी अपार्टमेंट्स व जमीनें खरीदने पर इतने खफा क्यों हैं, जिसमें उन्हें डीएलएफ नामक एक दोस्त से मदद मिली?

खैर, जो भी हो, लेकिन इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आईएसी) ने इन चीजों को सामने लाकर सराहनीय काम किया है। हालांकि आईएसी ने इस मामले में स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच की जो मांग की, उसमें उसे निराशा हाथ लग सकती है। पहली बात तो यह कि देश के सबसे शक्तिशाली परिवार के खिलाफ स्वतंत्र व निष्पक्ष जांच तकरीबन नामुमकिन है, खासकर तब जबकि वे सत्ता में हों।

दूसरी अहम बात यह कि भले निष्पक्ष जांच हो जाए, लेकिन उसमें वाड्रा की करनी के बारे में ज्यादा कुछ गैरकानूनी निकलकर नहीं आएगा। आखिरकार वाड्रा ने डीएलएफ के रूप में एक दोस्त बनाया और उस दोस्त ने वाड्रा की मदद की। गहन जांच के बावजूद तमाम कागजात से यही तथ्य सामने आ सकता है। वास्तव में जब शक्तिशाली लोग एक-दूसरे की मदद करते हैं, तो वे पूरी समझदारी के साथ कागजातों को इतना पुख्ता बना लेते हैं, जिनमें जरा-सी भी चूक नजर न आए। महंगे-महंगे वकील व सीए इत्यादि जी-तोड़ मेहनत करते हुए यह सुनिश्चित करते हैं कि ऐसे सौदों में वैधता की झलक हो, भले ही इन्हें करने के पीछे कोई भी मंतव्य रहा हो।

इसके अलावा मदद के बदले मदद को साबित करना और भी मुश्किल होगा। डीएलएफ कंपनी की देश में व्यापक मौजूदगी है। इसे सैकड़ों जगहों पर सरकार का सहयोग चाहिए। डीएलएफ को किसी तरह के प्रत्युपकार या मदद के बदले मदद की जरूरत नहीं है। वह इसके बजाय उपकृत करते हुए सरकार में दोस्त बनाएगी, जिनका बाद में अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा सके। दरअसल किसी शक्तिशाली राजनीतिक परिवार से नजदीकियों या उन तक पहुंच रखने का भी बड़ा मोल है। यदि डीएलएफ के सीनियर्स का गांधी परिवार के किसी रिश्तेदार के साथ अक्सर मिलना-जुलना हो, तो क्या हरियाणा में कांग्रेस के मुख्यमंत्री डीएलएफ के आवेदनों पर कुछ अलग ढंग से गौर नहीं करेंगे? न डीएलएफ, न गांधी परिवार और न ही हरियाणा सरकार कभी साथ बैठकर यह तय करेंगे कि उन्हें एक-दूसरे की किस तरह मदद करनी चाहिए। उन्हें ऐसा करने की जरूरत भी नहीं है। आखिर वे दोस्त हैं और दोस्त जब चाहें, एक-दूसरे की मदद कर सकते हैं। इसमें कुछ भी गैरकानूनी या अवैध नहीं है। क्यों, ठीक है न!

मगर फिर भी जो हुआ, वह गलत है। भले ही यह कानूनी तौर पर गलत हो या न हो, लेकिन नैतिक रूप से जरूर गलत है। दोस्ती करना ठीक है, लेकिन राजनेता आम आदमी की भलाई के लिए काम करते हैं, अपने दोस्तों, कारोबारी साझेदारों और सगे-संबंधियों के लिए नहीं। कम से कम गांधी परिवार के बारे में तो लोग यही मानते रहे हैं। इस परिवार के सदस्यों के बारे में लोगों का यही सोचना है कि वे सादगी में भरोसा करते हैं और व्यक्तिगत लालच से परे हैं। लेकिन ऐसा लगता नहीं है। आखिर सादगी दर्शाने के लिए एक आम सूती साड़ी या कुर्ता पहनने का क्या मतलब है, जब आपके परिजन राजनीतिक ताकत का दुरुपयोग करते हुए करोड़ों की संपत्ति इकट्ठा कर रहे हों। नैतिकता की बातें भले ही अदालतों में मायने न रखती हों, लेकिन लोगों के दिलों में उनके लिए आज भी जगह है।

हालांकि, यह सिर्फ गांधी परिवार की बात नहीं है। न ही यह महज कांग्रेस का मामला है। ज्यादातर राजनेता भूल चुके हैं कि दुनिया में हर पेशे के कुछ नैतिक नियम होते हैं, जिनका उल्लंघन करना गैरकानूनी भले न हो, लेकिन गलत जरूर है। एक डॉक्टर को अपने मरीज का इलाज जल्द से जल्द शुरू करना चाहिए। हालांकि डॉक्टर उपचार में लेटलतीफी करता है, तो इसे गैरकानूनी साबित करना मुश्किल ही होगा। किसी भी शिक्षक से अपने विद्यार्थियों को अच्छे से पढ़ाने की उम्मीद की जाती है, लेकिन यदि वह ऐसा नहीं करता तो यह तकनीकी तौर पर अवैध नहीं होगा। हमारा समाज ठीक ढंग से काम करता रहे, इसके लिए कुछ नियम-कानूनों के साथ-साथ नैतिक सिद्धांत भी उतने ही जरूरी हैं।

किसी भी राजनेता को लोगों से दोस्ती करते वक्त हजार बार सोचना चाहिए, जहां भविष्य में हितों का टकराव हो सकता है। वे किसी से कोई मदद या अनुग्रह लेते वक्त लाख बार सोचें। ऐसा इसलिए क्योंकि अनुग्रह लेते वक्त भले ही आपको अच्छा लगे, लेकिन इसके बदले में कुछ देना तकरीबन हमेशा आपकी मजबूरी हो जाती है। और जब इन प्रतिदानों का मतलब उन लोगों के हितों पर कुठाराघात करना हो, जिन्होंने आपको यहां तक पहुंचाया है, तो इसका प्रभाव विनाशकारी हो सकता है। वाड्रा के डीएलएफ के प्रति लगाव की गांधी परिवार को भारी कीमत चुकानी होगी। यह कीमत प्रतिष्ठा और सम्मान गंवाने के रूप में हो सकती है। समझदार लोग जानते हैं कि ये चीजें अनमोल हैं और उन तमाम चीजों से कहीं ज्यादा कीमती हैं, जिनका मोल प्रति स्क्वेयर फीट में आंका जाता है।

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