मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझसे
Source: निकष परमार Designation: पत्रकार
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शहर की सड़कों से गुजरते हुए मेरी नजरें पोस्टरों पर घूमती रहती हैं जो छतों, दीवारों, खम्बों और जहां जगह मिली वहां लगा दिए जाते हैं। ज्यादातर पोस्टर कानून तोड़ते हुए लगाए जाते हैं, लेकिन वह अलग मुद्दा है। मुझे तो जो बात खराब लगती है वह यह कि यह मैं किन लोगों के बीच रह रहा हूं। अपने चेहरे दिखाने के लिए ये लोग क्यों मरे जा रहे हैं? ऐसा कौन सा काम इन लोगों ने कर डाला है। और काम कर भी डाला है तो पोस्टर लगाने की क्या जरूरत है? काम तो सभी करते हैं।
मुझे ये पोस्टर लोकतंत्र के खिलाफ लगते हैं। जिसके पास पैसा है वह अपने पोस्टर लगवा लेता है। सावन सोमवार पर पंद्रह किलोमीटर दूर से नंगे पांव महादेव घाट आते हैं मंगलू, झंगलू, सुकवारो, भुलवा और बुधारू। पोस्टर लगते हैं दांते निपोरे नेताओं के जिनकी तस्वीरें भगवान महादेव की तस्वीरों से भी बड़ी होती हैं। जरूरी नहीं कि भगवान महादेव की तस्वीर भी पोस्टर में हो। उन्हें तो बस अपनी तस्वीर से मतलब होता है।
ये पोस्टर मुझे झूठे और अनैतिक भी लगते हैं। इनमें कोई युवा हृदय सम्राट होता है तो कोई माटी पुत्र। इन्हें करीब से जानने वाले बताते हैं कि ये कोई युवा हृदय सम्राट या माटी पुत्र नहीं हैं, बस चंदा चकोरी करना जानते हैं और उसमें से कुछ पैसों का इस्तेमाल कर बिना काम किए प्रचार करने का हुनर इन्हें आता हैं। बिना काम किए पैसे ले लेने का हमारे यहां खूब चलन है। अखबारों की सुर्खियों में इन्हें लगभग रोज पढ़ा जा सकता है। यह चिंताजनक है कि इसके बावजूद यह सिलसिला बंद नहीं हो रहा।
शहर के कुछ संगठन अपराधी गिरोहों की तरह काम करते हैं। इन्हें त्योहारों की आड़ में तलवारें लेकर नाचते सारा शहर देखता है, शहर के नेता देखते हैं, शहर की पुलिस देखती है। ये किस तरह चंदा लेते हैं शहर के व्यापारी और अफसर जानते हैं। इनके पोस्टरों में पचीस-पचास लोगों की तस्वीरें होती हैं। इन्हें देखकर डर लगता है। यह देखकर भी डर लगता है कि ये लोग शहर के सिर पर टंगे हुए हैं।
मेलों ठेलों के वक्त कुछ लोगों के पोस्टर ऐसे लगा दिए जाते हैं मानों इन्हीें लोगों के कारण मेला लग रहा है। सच तो ये है कि लोगों को भगवान की भक्ति खींच लाती है। उनके संस्कार खींच लाते हैं। चाट पकौड़ी और टिकली फुंदरी वालों को पेट-रोजी खींच लाती है। नौजवानों को मस्ती खींच लाती है। बच्चों को उनकी उत्सुकता लेकर आती है। गृहस्थों की उनकी जिम्मेदारियां ले आती हैं। इनके बीच उन लोगों की कोई जगह नहीं होती जिन्होंने अपने पोस्टर लगा दिए हैं। इन्हें देखकर लगता है कि हमारे घर में बैठा कोई मेहमान हमें ही कह रहा है-आइए स्वागत है।
इन पोस्टरों को देखकर मुझे साहिर लुधियानवी याद आते हैं जिन्होंने ताजमहल के खिलाफ अपनी नज्म में लिखा था-
ताज तेरे लिए इक मजहरे उल्फत ही सही
तुझको इस वादिए रंगीं से अकीदत ही सही
मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझसे।