नक्सलियों के बीच वो वक्त
Source: दिलीप जायसवाल Designation: पत्रकार
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सात साल पहले की बात। नक्सलियों के दहशत की बात। जब गांव में रहता था। स्कूल में पढ़ता था। गांव में शाम ढलने से पहले चरवाहे मवेशी लेकर घर आ जाते थे। खेतों से लोग जल्दी लौट आते थे। दुबककर सो जाते थे। कोई घर आने में देरी करता था तो परिवार के लोगों की सांस थम सी जाती थी।
उस समय तो मोबाइल फोन भी नहीं होता था। बीएसएनएल का डब्ल्यूएलएल नक्सली ही उठा ले जाते थे। बिजली महीने में एकाध बार आती थी। तब लगता था दिवाली है। पंद्रह अगस्त हो या छब्बीस जनवरी, तिरंगा लहराना मौत को दावत देने के समान होता था।
रात में कोई परिचित भी आवाज लगाता था तो दरवाजा खोलने से पहले हजार बार सोचना पड़ता था। सुबह पता चलता था कि पड़ोसी गांव में नक्सलियों ने किसी की गला रेत कर हत्या कर दी तो किसी की गोलीमार कर।
ये बात है तत्कालीन सरगुजा जिले की। इसका एक भाग अब बलरामपुर जिले में शमिल हो गया है। ऐसा दहशत नक्सलियों ने सरकारी तंत्र में व्याप्त भर्राशाही की वजह से जमाने में सफलता पाई थी।
पटवारी इसका जमीन उसके नाम कर देते थे तो वन रक्षक पेड़ काटने के नाम पर बेवजह परेशान करते थे। जनता त्रस्त थी। नक्सलियों ने जमीन और जंगल को लेकर उपजे विवाद निपटारे की बात की। कुछ हद तक आतंक के बल पर
काम भी किया। शुरूवाती दौर में लोगों को यह अच्छा भी लगा। जनअदालतों में कई सरकारी कर्मियों, जनता का शोषण करने वालों और तथाकथित नेताओं को मारा गया।
धीरे-धीरे नक्सलियों में लोग भी शामिल होने लगे जिन्हें स्वार्थ पूरा करना था। वे माइंस और व्यपारियों से वसूली करने लगे। उनका गिरोह बन गया। बंटवारे को लेकर उनके बीच फूट पड़ी और पुलिस मजबूत हुई। कई नक्सली नेता मारे गए। आज तथाकथित नक्सली पुलिस के दहशत में यहां वहां छुपकर जी रहे हैं।
इन सबके बाद भी सरकारी तंत्र में भर्राशाही में कोई कमी नहीं आई है, बस लाल आतंक का खौफ कम हुआ है। लोग चैन भरी नींद सोते हैं और गांवों में रात में भी चहलकदमी होती है और चौपाल लगती है।