घुप्प अंधेरा, सिर पर बोझ और बाढ़ के पानी में सफर

 
Source: बसंत शाहजीत     Designation: पत्रकार
 
 
 
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http://unified.bhaskar.com/city_blogger_author_images/thumb_image/100120_thumb.jpg पदुम कका का दो मंजिला घर काफी ऊंचाई पर है। उनके घर में अब दो परिवार साथ थे। सब सोच रहे थे कि उनके घर में पानी नहीं पहुंचेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। करीब आधे घंटे में ही पानी उनके घर की दहलीज को छूने लगा था। कका बहुत परेशान दिख रहे थे क्योंकि उन्होंने अपने एक कमरे में नीचे ही धान-कोठी बना रखी थी। उन्होंने अपनी चिंता हमारे सामने जाहिर की। फिर क्या था, सबके सब भिड़ गए धान डोहारने में। थोड़ी ही देर में सारा धान छत पर पहुंच गया। इतना करते तक पानी उनके भी आंगन में पहुंच चुका था। सबने इस बारे में चर्चा की और इस नतीजे पर पहुंचे कि अब यहां भी रुकना ठीक नहीं है। हमने कका के दूसरे घर में शरण लेने का निर्णय लिया। यह घर यहां से एक किलोमीटर दूर था। सो हम कुछ जरूरी सामान लेकर उनके घर के पिछवाड़े से सुरक्षित जगह की ओर निकल पड़े।

रात करीब १२ बजे थे। घुप्प अंधेरा था। तेज बारिश हो रही थी। पीछे जिस ओर हम निकले थे वह पत्थर की खदान थी। हम काफी संभल कर चल रहे थे। जांघ भर पानी में सिर पर सामान का बोझ लेकर ऐसा करना आसान नहीं था। पदुम कका के घर से उनकी दाई, उनकी छोटी सी बेटी मीनाक्षी, काकी और हम पांच लोग अंधेरे में धीरे-धीरे पानी को पार कर बढ़े जा रहे थे। डर बना हुआ था कि किसी के पैरों में नुकीला पत्थर न चुभ जाए या किसी का पैर किसी खोह में न फंस जाए। लेकिन ईश्वर की कृपा से ऐसा कुछ नहीं हुआ। हम खेतों से होते हुए सड़क किनारे कका के मकान में पहुंच गए। मोहल्ले के ज्यादातर लोगों ने कहीं न कहीं शरण ले रखी थी। दो-तीन घरों में कुछ लोगों को छोड़कर बाकी सभी सुरक्षित जगहों पर आश्रय पाने चले गए थे। रातभर तेज बारिश होती रही। थके-हारे हम सभी सो गए।

सुबह उठे। करीब सात बजे स्टोव पर चाय बनाई गई। खेतों के बीच बने दो कमरों के छोटे से घर में सबने बारिश का कहर देखते हुए चाय पी। बारिश में चाय तो पहले भी पी थी लेकिन आज की बात और थी। आठ बजे तक बारिश थोड़ी कम हो गई। बाढ़ का पानी सड़क किनारे तक पहुंचा था। गांववालों के लिए यह दूसरी भयंकर बाढ़ थी। इसके बीस साल पहले पहली भयंकर बाढ़ आई थी। बड़े बुजुर्ग हमें इसके बारे में बताते थे। सुबह का नाश्ता और दोपहर का भोजन हमने वहीं किया। दस बजे के बाद बारिश थम गई और धूप खिल गई। पानी धीरे-धीरे नीचे जाने लगा। दोपहर करीब ढाई बजे पानी हमारे घर व मोहल्ले से उतरकर नीचे नदी की ओर चला गया। सब अपने-अपने घरों को लौटने लगे।

पानी तो उतर गया लेकिन दुनियाभर का कचरा और दलदली मिट्टी घरों में जमा हो गई थी। हमारे घर में पानी पटाव से करीब फीटभर ही दूर था। शुक्रिया भगवान का जो बाढ़ उस दिन वहीं से लौट गई। अब पूरा मोहल्ला कचरा साफ करने में जुटा था। अपने घर में हम लोग भी जुटे थे। यह निंदाई का समय था और बाबूजी आठ-दस बनिहार लेकर खेत चले गए। घर साफ करने में शाम हो गई। हमने रसोई और परछी को सबसे पहले साफ किया ताकि चूल्हा जल सके।

कमरों को पानी से धोने के बाद हम आंगन में तखत पर बैठे थे। बाढ़ के दौरान प्रशासन ने शिवरीनारायण, खरौद, भटगांव, तुरकीनडीह और गिधौरी में हेलिकॉप्टर से खाने के पैकेट गिराए जहां बाढ़ से ज्यादा तबाही मचाई थी। शिवरीनारायण में जोंकनदी, शिवनाथ और महानदी का संगम है। बारिश में तीनों नदियों का पानी मिल कर नीचे के गांवों में कहर बरपाता है।
 
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