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<title>bhaskar</title>
<description>Find all News, Hindi News, India News, News in Hindi, News Headlines, Breaking News, Daily News, Hindi News Paper, Local News in Bhaskar.com. Find India news in hindi in Dainik Bhaskar, No.1 hindi news paper &amp; largest hindi daily.</description>
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<title><![CDATA[जुनून हमेशा संक्रामक होता है।]]></title>
<description><![CDATA[उस अस्पताल की गहन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) में वह सबसे छोटी मरीज थी। आम तौर पर दुनिया के हर अस्पताल के आईसीयू में मरीजों को सफेद यूनीफॉर्म पहनने को कहा जाता है। लेकिन उस रोज उसको काली यूनीफॉर्म मिली थी। दीक्षांत समारोह में पहना जाने वाला वह एक गाउन था। महज दो मिनट के अंतराल से अस्पताल के डीन उसके पास आ पहुंचे। उसे बधाई दी। पासिंग सर्टिफिकेट दिया। उसकी मां और भाई के साथ तस्वीरें लीं। स्वास्थ्य में तेजी से सुधार के लिए शुभकामना दी और आईसीयू से बाहर निकल&nbsp;
गए। उसके घर में आज भी उस समय की तस्वीरें मौजूद हैं।&nbsp;
&nbsp;
आईसीयू के बिस्तर पर लेटे हुए सर्टिफिकेट लेना। वहां मौजूद नर्सो सहित कई लोगों की आंखों में आंसू। सब कुछ तस्वीरों में कैद है। ये हैं समिधा खंडारे। उम्र २४ साल। महाराष्ट्र के अकोला जिले के छोटे से कस्बे मुर्तिजापुर से ताल्लुक रखती हैं। अपने कस्बे और उसके आसपास के कई लोगों को उन्होंने बचपन से ही कई बीमारियों से जूझते देखा। तभी से उनके मन में क्लीनिक खोलने की इच्छा जोर मार रही थी। लेकिन वे यह भी जानती थीं कि उनकी माली हालत ऐसी नहीं है कि वे डॉक्टर...]]></description>
<link><![CDATA[http://www.bhaskar.com/article/MAG-CM-management-funda-career-mantra-4273002-NOR.html]]></link>
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<pubDate>2013-05-24 12:44:00 IST</pubDate>
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<title><![CDATA[कुछ नया करना चाहते हैं तो अपने गुस्से को सही दिशा दीजिए]]></title>
<description><![CDATA[पहली कहानी: बीएन फणीधर की उम्र 21 साल थी जब उसे एक व्यक्ति ने धमकी भरा पत्र भेजा। इसमें कहा गया था कि वह अमुक लड़की से दूर रहे नहीं तो नतीजे भुगतने होंगे। जिस लड़की का पत्र में जिक्र किया गया था उसे फणीधर जानता तक नहीं था। फिर भी वह पत्र को देखकर काफी परेशान हो गया। वह इसको लेकर हैंडराइटिंग के एक्सपर्ट के पास गया ताकि उसे भेजने वाले की पहचान की जा सके। लेकिन बेंगलुरू में उसकी कोई मदद नहीं कर पाया। पत्र भेजने वाले की पहचान न कर पाने की वजह से फणीधर की परेशानी बढ़ती जा रही थी। गुस्सा भी आ रहा था।&nbsp;
&nbsp;
ऐसे में उसने खुद ही फॉरेंसिक की पढ़ाई करने का निश्चय किया। एक स्थानीय विशेषज्ञ से प्रशिक्षण लिया। फिर दिल्ली जाकर प्रतिष्ठित फॉरेंसिक विशेषज्ञ वीसी मिश्रा से विषय के बारे में जाना और समझा। दो साल तक उनके साथ काम भी किया। आज फणीधर दस्तावेजों के परीक्षण के मामले में विशेषज्ञ हो चुका है। उसकी उम्र अब 26 साल है। मिसाल के तौर पर अगर कभी आत्महत्या के किसी केस की जांच के लिए उसे मौका-ए-वारदात पर जाना पड़ता है तो सुसाइड नोट देखकर ही काफी-कुछ पड़ताल कर लेता है। घटना के...]]></description>
<link><![CDATA[http://www.bhaskar.com/article/MAG-CM-management-funda-4270040-NOR.html]]></link>
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<pubDate>2013-05-21 15:18:00 IST</pubDate>
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<title><![CDATA[ईमानदारी, जुनून, धीरज से काफी कुछ मिलता है]]></title>
<description><![CDATA[कई लोग हमेशा इसका ही रोना रोते रहते हैं कि वे इस कलयुग में बहुत पैसा नहीं कमा सकते। बहुत सफल नहीं हो सकते क्योंकि वे धोखाधड़ी या हेरफेर नहीं कर पाते। ऐसे लोगों के लिए नीचे बताई जा रही तीन घटनाएं उनकी सोच बदलने वाली हो सकती हैं।&nbsp;
&nbsp;
पहली घटना: रैनबैक्सी लैबोरेट्री के कर्मचारी हैं दिनेश ठाकुर। डायरेक्टर ऑफ प्रोजेक्ट एंड इन्फॉरमेशन के पद पर काम करते हैं। उन्होंने 2005 में कुछ मसलों की वजह से कंपनी छोड़ दी। उन्होंने इसके बाद अमेरिकी अधिकारियों को कुछ सबूत दिए। यह बताते थे कि दवाइयों को बनाने व प्रबंधन के स्तर पर किस तरह की गड़बड़ियां हो रही हैं। इसके बाद भारत में कंपनी के दो मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट में जांच शुरू हुई। इसमें हल्की गुणवत्ता की दवाइयां बनाने और उन्हें वितरित करने के आरोप सही पाए गए।
&nbsp;
इसके बाद कंपनी को करीब 50 करोड़ डॉलर (लगभग 2739 करोड़ रुपए) का मुआवजा देना पड़ा। दिनेश ठाकुर को भी इसमें से 4.8 करोड़ डॉलर (लगभग 263 करोड़ रुपए) मिलेंगे क्योंकि उन्होंने जांच में मदद की थी। ठाकुर को ये पैसे अमेरिकी सरकार से मिलेंगे। अमेरिकी कानून में भ्रष्टाचार...]]></description>
<link><![CDATA[http://www.bhaskar.com/article/MAG-CM-honesty-enthusiasm-is-everything-4265587-NOR.html]]></link>
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<pubDate>2013-05-16 15:09:00 IST</pubDate>
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<title><![CDATA[मुश्किल वक्त में जानकारियों के बजाय बुद्धि ज्यादा काम आती हैं]]></title>
<description><![CDATA[पहला आदमी: दाहिने हाथ में एक मोटा सा सोने का कड़ा पहने हुए है। बाएं हाथ में ब्रांडेड घड़ी। शर्ट पर तीर का निशान और बैल्ट पर क्रोकोडाइल। इसे देखकर ही यह समझ आ जाता है वह सिर्फ सर्वश्रेष्ठ चीजों का ही इस्तेमाल करता है। वह कहीं इंटरव्यू के लिए जा रहा था। लोगों की नजर उस पर पड़ी जब वह कुछ जोर से बोला, &lsquo;अभी तो विमान उड़ने में समय है।&rsquo; दरअसल, उससे एयरहोस्टेस ने&nbsp;
मोबाइल बंद करने को कहा था। तीन अनाउंसमेंट हो चुके थे कि फ्लाइट उड़ने वाली है। लेकिन वह मोबाइल पर बात किए जा रहा था। इसके बाद एयरहोस्टेस को उससे मोबाइल बंद करने को कहना पड़ा। यह उसे अच्छा नहीं लगा था। बिजनेस क्लास में उस यात्री का बेटा भी उसके साथ था। उसे भी फ्लाइट में मिलने वाला-इडली, वड़ा, सांभर, चटनी, ब्रेड, जैम, फल आदि का नाश्ता पसंद नहीं आ रहा था। वह पिज्जा मांग रहा था, &lsquo;ब्रांडेड फूड।&rsquo;
&nbsp;
&nbsp;दूसरा आदमी: बहुत साधारण सी जिंदगी जीने वाला। शुरुआत में गांव में पला-बढ़ा। फिर कॉलेज पढ़ने के लिए कस्बे में आया। अपनी कई शामें उसने ताल-तलैयों में तैरकर गुजारीं। इंटरव्यू देने के लिए वह दो बसें बदलते हुए आया...]]></description>
<link><![CDATA[http://www.bhaskar.com/article/MAG-CM-management-funda-knowledge-is-important-4264503-NOR.html]]></link>
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<pubDate>2013-05-15 14:04:00 IST</pubDate>
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<title><![CDATA[कितनी भी ऊंचाई पर पहुंच जाएं अपनी जड़ों को न भूल]]></title>
<description><![CDATA[सुबह के 5.10 बजे थे। प्रदीप कलानी गहरी नींद में था। तभी उसका मोबाइल घनघनाया। दूसरी तरफ से रौबीली आवाज गूंजी, &lsquo;कहां हो तुम।&rsquo; प्रदीप ने शांति से जवाब दिया, &lsquo;सर अभी सो रहा हूं।&rsquo; फिर उतनी ही शांति से आगे जोड़ा, &lsquo;सर, २क् मिनट में मैं आपके होटल पहुंच जाऊंगा।&rsquo; प्रदीप की टैक्सियां चलती हैं। जिसने उसे फोन किया था वह कोई यात्री था। उसने टैक्सी किराए पर ली थी। उसे सुबह उदयपुर से दिल्ली की फ्लाइट पकड़नी थी। इसके लिए 6.14 पर एयरपोर्ट पहुंचना था। जिस होटल में वह रुका था, वहां से एयरपोर्ट करीब 30 किलोमीटर की दूरी पर था। इस हिसाब से प्रदीप को किसी भी सूरत में 5.30 तक होटल पहुंच जाना चाहिए था। रविवार का दिन था इसलिए ड्राइवर नहीं आया था। इसलिए प्रदीप को खुद ही टैक्सी ले जानी थी। चूंकि प्रदीप उस वक्त तक नींद में ही बोल रहा था इसलिए उसका ग्राहक झल्ला गया। उसने फोन पर कहा, &lsquo;तुम लोगों को समय की कोई कीमत ही नहीं है। छोटे शहर के लोगों के साथ हमेशा यही दिक्कत रहती है। तुम मेरी फ्लाइट छुड़वा दोगे।&rsquo; लेकिन यह सुनकर भी प्रदीप शांत रहा। बहुत नरमी से उसने अंग्रेजी में बोलते हुए अपने...]]></description>
<link><![CDATA[http://www.bhaskar.com/article/MAG-CM-management-funda-4263481-NOR.html]]></link>
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<pubDate>2013-05-14 14:28:00 IST</pubDate>
</item>
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<title><![CDATA[प्रतिभा कभी दबाई नहीं जा सकती]]></title>
<description><![CDATA[वह कॉलेज में कभी रेगुलर नहीं रहता। उम्र भी ज्यादा नहीं सिर्फ 20 साल ही है। उसके पिता न सिर्फ एक सफल और सख्त कारोबारी हैं बल्कि आज की शिक्षा व्यवस्था को लेकर उनके अपने आइडिया भी हैं। उनको इस बात का पक्का यकीन है कि आज की शिक्षा व्यवस्था सिर्फ नंबर ही दे सकती है। नई पीढ़ी के भीतर कारोबारी दक्षता विकसित करने में यह बिल्कुल सहयोगी नहीं है। जयपुर से दर्शन ने जैसे ही १२वीं की परीक्षा पास की उसके पिता ज्योति कोठारी ने उससे कहा कि अगर वह सफल बिजनेसमैन बनना चाहता है तो उसे लोगों के बीच आना होगा।
&nbsp;
संघर्ष करना, सीखना होगा और यह भी कि नया कारोबार कैसे करते हैं। उन्होंने कहा, &lsquo;मैं तुख्हारे लिए इस काम में सिर्फ इतनी मदद कर सकता हूं कि तुख्हें घर का कंप्यूटर इस्तेमाल करने दूं। ताकि तुम अपने बिजनेस आइडियाज पर काम कर सको। इसके अलावा कोई मदद नहीं कर सकता।&rsquo; दर्शन को अपने पिता की सख्त मिजाजी के बारे में अच्छी तरह पता था। सो, कॉलेज की पढ़ाई के साथ-साथ उसने वेबसाइट विकसित करने का काम शुरू कर दिया। कुछ पैसे भी कमाने लगा।
&nbsp;
नियमित से जो आमदनी हो रही थी, वह इसी से थी। कभी...]]></description>
<link><![CDATA[http://www.bhaskar.com/article/MAG-RAS-career-mantra-success-story-4262461-NOR.html]]></link>
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<pubDate>2013-05-13 12:40:00 IST</pubDate>
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<title><![CDATA[जिंदगी के अनुभवों में नंबरों के कोई मायने नहीं होते]]></title>
<description><![CDATA[इस सप्ताह मैं फ्लाइट से राजस्थान में भास्कर उत्सव में भाग लेने के लिए मुंबई से जोधपुर जा रहा था। मुझे किनारे के तरफ वाली सीट मिली थी। बीच की सीट पर एक महिला अपने छह माह के बेटे को हाथ में लिए बैठी थी। जबकि खिड़की वाली सीट पर उसके छह साल के बेटे ने कब्जा जमा रखा था। मेरे ठीक सामने वाली पर भी यही स्थिति थी। किनारे वाली सीट पर मेरी तरह ही एक यात्री बैठे थे। उनके बीच की सीट पर एक मां अपने दस महीने के बच्चे को लिए बैठी थी। खिड़की वाली सीट पर उसका सात साल का बेटा बैठा था। विमान उड़ चला था। मैं और मेरे जैसे ही सामने वाली सीट पर बैठे सज्जन अखबार पढ़ने में व्यस्त हो गए। जबकि माताएं अपने नवजात बच्चों की जरूरतों को पूरा करने में लग गईं। वहीं खिड़की वाली सीट पर बैठे हुए बच्चे कुछ देर बाहर देखते रहे।
&nbsp;
फिर एक-दूसरे से बातों में मशगूल हो गए। बड़े बच्चे ने (जो सात साल का था) अपने पीछे वाले से पूछा, &lsquo;तुम्हारा नाम क्या है?&rsquo; थोड़ी ही देर में दोनों के बीच परिचय हो चुका था। इसके बाद बड़े बच्चे ने छोटे वाले से उसके स्कूल के बारे में पूछा। उसके जन्म की तारीख, राशि, राजस्थान में उसके...]]></description>
<link><![CDATA[http://www.bhaskar.com/article/MAG-CM-career-mantra-4260991-NOR.html]]></link>
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<pubDate>2013-05-11 12:04:00 IST</pubDate>
</item>
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<title><![CDATA[विज्ञापन की दुनिया की नई करंसी]]></title>
<description><![CDATA[&nbsp;
आप अपने मोबाइल पर &lsquo;एंग्री बर्ड&rsquo; नाम का गेम खेल रहे हैं। लगातार लेवल-दर-लेवल पार करते जा रहे हैं। तभी एक पॉप अप खुलती है। इसमें आपको बताया जाता है कि आपने एक और उपहार जीता है। वह ये कि आप पास के आइसक्रीम पार्लर से जाकर&nbsp;
मुफ्त आइसक्रीम खा सकते हैं। अब आपके पास दो विकल्प हैं। पॉप अप के जरिए आया ऑफर डिलीट कर दें या उसे स्वीकार&nbsp;
कर लें। स्वीकार करना है तो जहां जगह दी गई है वहां अपना ईमेल एड्रेस लिखें और फिर गेम खेलने में जुट जाएं। कुछ देर बाद आपके मेल पर एक कोड नंबर आएगा या फिर कूपन। इन्हें लेकर आप पास के आइसक्रीम वेंडर के पास जाएं। उसे दिखाकर अपने पसंद की मुफ्त की आइसक्रीम खाएं। दरअसल, यह एक तरीका है इसके जरिए आपके बारे में जानकारी जुटाई जाती है। आपका खर्च, आपका पता, पसंद-नापसंद, परिवार में कितने सदस्य हैं, दोस्त सब कुछ इस गिफ्ट के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से उनके पास चला जाता है जो यह ऑफर भेजते हैं। चूंकि आजकल सोशल मीडिया, शिक्षा, शॉपिंग आदि हर जगह गेम का बोलबाला है इसलिए लोगों ने इसमें भी विज्ञापन का स्पेस ढूंढ़ लिया है।&lsquo;कीप&rsquo; अमेरिका के सैनफ्रांसिस्को...]]></description>
<link><![CDATA[http://www.bhaskar.com/article/MAG-CM-advertisement-funda-4260191-NOR.html]]></link>
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<pubDate>2013-05-10 15:37:00 IST</pubDate>
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<title><![CDATA[बिना बिजली के काम करने वाला वाटर कूलर]]></title>
<description><![CDATA[&nbsp;
&nbsp;
सत्रह साल पहले की बात है। गुजरात के अरविंद भाई पटेल बुखार से तप रहे थे। बुखार कम नहीं हुआ तो माथे पर गीली पट्टी रखी और सो गए। उठे तो बुखार कम था। इससे उन्हें ऐसा वाटर कूलर बनाने का आइडिया मिला, जो बिना बिजली केपानी ठंडा कर सके। लगभग 15 साल की मेहनत के बाद उन्होंने अपने इस सपने को सच कर दिखाया। राष्ट्रपति ने उन्हें इस कोशिश के लिए नेशनल अवॉर्ड से नवाजा।अरविंद कहते हैं, &lsquo;150 लीटर क्षमता का यह नेचुरल वाटर कूलर पानी को प्रचंड गर्मी में भी 26 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा कर सकता है। एक घंटे में इसमें लगभग 55 लीटर पानी ठंडा हो जाता है, इसलिए यह स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल और ऑफिस के लिए बहुत उपयोगी है। खासकर उन इलाकों में, जहां बिजली नहीं आती।&rsquo; 58 वर्षीय अरविंद भाई 600 नेचुरल वाटर कूलर सिर्फ गुजरात में बेच चुके हैं। इसकी कीमत उन्होंने 51 हजार रुपए रखी है। उनका दावा है कि इसमें ठंडा होने के बाद पानी का स्वाद नहीं बदलता और प्यूरीफायर लगा होने की वजह से पानी बिल्कुल साफ निकलता है। वाटर कूलर से पानी निकालने के लिए 6 नल लगाए गए हैं। यानी एक साथ 6 लोग पानी निकाल सकते हैं। इसमें एक...]]></description>
<link><![CDATA[http://www.bhaskar.com/article/MAG-RAS-watercooler-without-electricity-4258260-NOR.html]]></link>
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<pubDate>2013-05-08 16:36:00 IST</pubDate>
</item>
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<title><![CDATA[नए बिजनेस की देखभाल नवजात शिशु के समान करें]]></title>
<description><![CDATA[उसे याद है कि वह 1970 में महाराष्ट्र के अकोला जिले के छोटे-से गांव श्रीखेड़ में रहता था। उस समय उसकी उम्र साढ़े पांच साल थी। बचपन में उसने कभी नाश्ता नहीं किया था। सुबह उठने के बाद केवल एक कप चाय ही पीता था। दोपहर के भोजन में केवल कुछ रोटी और रात के खाने में दही और चटनी के साथ रोटी खाता था। वह नंगे पांव स्कूल जाता था। बरसात में अपने सिर को टाट के बोरे से ढकता था, क्योंकि उसके परिवार के पास छाता खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। उसके पास स्वेटर भी नहीं था। केवल स्कूल की एक यूनिफॉर्म थी, जिसे हर रात धो देता और सूखने पर सुबह पहनकर स्कूल जाता था। उन दिनों पेन से लिखने का चलन था। लेकिन उसका परिवार स्याही और पेन का भी खर्च वहन करने की स्थिति में नहीं था। इसलिए उसने लकड़ी के एक टुकड़े को पेन बना लिया था। स्याही अपने दोस्त से उधार में लेकर लिखता था। वह स्कूल में कभी प्रतिभाशाली छात्र नहीं रहा। गणित में बहुत ही कमजोर था। वह प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दो बार चेक करने के बाद ही देता था। यही आदत उसे आगे जीवन में बहुत काम आई ।&nbsp;
1973 में उसका परिवार कलीना के दो बेडरूम के फ्लैट में चला...]]></description>
<link><![CDATA[http://www.bhaskar.com/article/MAG-CM-article-of-career-mantra-4247884-NOR.html]]></link>
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<pubDate>2013-04-27 10:28:00 IST</pubDate>
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