इमरजेंसी की नौबत अब कभी नहीं आएगी क्योंकि लोकतंत्र हमारी रगों में बहने लगा है। लेकिन इसके साथ ही श्याम बेनेगल मानते हैं कि अब इलेक्टोरल डेमोक्रेसी से एक कदम आगे बढ़कर हमें पार्टिसिपेटिव लोकतंत्र स्थापित करने की चुनौती को स्वीकार करना होगा।
हर तरफ खुशहाली हो तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। साथ ही उन्हें इस बात का दुख भी है कि आजकल की फिल्में कोई मौलिक सोच नहीं दे पा रही हैं और इस वजह से फिल्म इंडस्ट्री को हॉलीवुड 2 कहा जाना चाहिए।
हमने आजादी के लिए खून नहीं बहाया और हम आजाद हिंदोस्तान की पैदाइश हैं इसलिए हमें पता नहीं है कि आजादी का मतलब क्या है। और हमें आजादी की कीमत समझाने के लिए 'डंडा' बहुत जरूरी है।
इन 60 सालों की सबसे बुरी बात यह रही कि आम आदमी के लिए कोई श्योरिटी नहीं दे सके हैं हम। उसका चाहे जितना छोटा काम भी क्यों न हो, वह इस बात को लेकर तय नहीं है कि उसे रिश्वत नहीं देनी पड़ेगी। हर काम के लिए उसे बैसाखी ढूंढनी पड़ती है। बेईमानी हमारी वे ऑफ लाइफ (जिंदगी का ढर्रा) हो गई है।
आजाद हिंदोस्तान और आजाद पाकिस्तान दोनों ने ही जम्मू कश्मीर की जनता के प्रति अपने तकाजों को आज तक पूरा नहीं किया है। यही वजह है कि यह घाव आज तक रिस रहा है। कश्मीर अभी तक आजाद नहीं है। अब तक 6 लाख जानें जा चुकी हैं।
आजादी के 60 सालों बाद सरकार यह समझ पाने में ही नाकाम रही है कि वास्तव में गरीब कौन है, तो फिर उस तक पहुंचने की बात तो कोसों दूर की है। अलबत्ता उसी सरकार ने 352 सेजों को स्वीकृति देने में 6 माह भी नहीं लगाए। यह कदम देश में प्रिंसली राज की वापसी है। क्योंकि इन क्षेत्रों से न तो सरकर को कोई कर मिलेगा, न उसके कानून वहां चलेंगे।
सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर जोगिंदर सिंह का कहना है कि हमारी लीडरशिप का स्टैंडर्ड गिर रहा है और वह फेल हो चुकी है। कुछ ही ऐसे हैं जिन पर राजनीति के चेहरे को दागदार होने से बचाने का दारोमदार है। बाकी ज्यादातर ऐसे हैं, जिनसे आम आदमी दुखी है। जोगिंदर सिंह का कहना है कि हम आजाद तो हैं मगर करप्शन के लिए और मौजूदा सरकारें कमजोर से कमजोर होती गई हैं।
केएन गोविंदाचार्य का मानना है कि नई पीढ़ी के पास ज्यादा आत्मविश्वास है। उनका मानना है कि आजादी पाने के बीस बरसों के अंदर ही सबको भोजन और सबको काम जैसी समस्याओं पर काबू पा लिया गया होता, अगर हम जनता की ताकत और स्वभाव का अध्ययन करते हुए योजनाएं बनाते। अगले कुछ सालों में देश के भविष्य के प्रति वे काफी आश्वस्त हैं।
देश के लोकतंत्र की नब्ज पर गहरी पकड़ रखने वाले प्रो योगेंद्र यादव की नजर में अब राजनीति से उतनी नहीं, जनांदोलनों से ही कुछ उम्मीदें बची हैं। 1999 से 2004 तक प्रो यादव ने कई बड़े चुनाव सर्वे डिजायन किए हैं और उन्हें संचालित किया है। भारतीय लोक की मनोदशा का अध्ययन किया है।
भारत पूरी दुनिया के सामने एक प्रमुख आर्थिक ताकत के रूप में सामने आया है। वह नई तकनीकी और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के बल पर विव्श्र का अग्रणी देश बन सकता है। विकास के लाभ को देश के कोने-कोने तक पहुंचाने के लिए शिक्षा के व्यापक प्रसार की आवश्यकता है। इसमें एनजीओ और कापरेरट सेक्टर आग आएं।
हमें हिंदुस्तानी होने पर गर्व है और खासकर हमारी पीढ़ी को क्योंकि हमें मालूम है कि हम एक प्रोग्रेसिव देश हैं। हम आगे बढ़ रहे हैं। रंग दे बसंती में आजादी तराने गाने वाले और बेहद सेक्युलर कवि असलम यानी कुणाल कपूर का कहना है कि हमें किसी क्रांति की जरूरत नहीं है। हमें खुद को अंदर से ही बदल डालने की जरूरत है और यही काम ऐसा है जो नहीं हो पा रहा।
पंजाब के जाने माने सूफी गायक हंसराज हंस के मुताबिक आजादी ऐसी चीज है जो तब तक नहीं हासिल मानी जा सकती जब तक कि लोगों की सबसे अहम जरूरतें ही पूरी नहीं हो पा रहीं। कला के संदर्भ में भी आजादी को लेकर वह अलग खयाल रखते हैं। उनका मानना है कि कलाकार को इतनी आजादी भी नहीं होनी चाहिए कि वह जैसी चाहे वीडियो बना ले।
हमने अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा, बायोटैक्नोलॉजी, एप्लाइड साइंस के क्षेत्र में, नैनो टैक्नोलॉजी, पार्टिकल फिजिक्स, एस्ट्रो फिजिक्स के क्षेत्र में काफी तरक्की की है और कई अहम मुकाम हासिल किए हैं। इसका दूसरा नकारात्मक पक्ष यह है कि हमारी यूनिवर्सिटीज में शिक्षा का स्तर गिरा है और इसकी वजह से युवा वैज्ञानिकों की कमी खल रही है। आईटी ग्रेजुएट्स और वैज्ञानिकों की उस फौज के बार में बात करना ही बेमानी है जो अगर इस प्रकार के अंधविश्वासों पर यकीन करती हो।
हिंदू पिता और मुस्लिम पठान मां की बेटी तबस्सुम राष्ट्रीय एकता की मिसाल रही हैं। गुलाम हिंदुस्तान में जन्म लेने के बाद उन्होंने आजादी हासिल करने से लेकर आजादी के बाद गुजर 60 सालों को अपनी आंखों से देखा है। वे मानती हैं कि हमने तरक्की तो बहुत की है मगर फिर भी अभी देश में मशीनी नहीं रूहानी तरक्की की जरूरत है। वह बदलते हुए सांस्कृतिक माहौल से काफी तकलीफ महसूस करती हैं।
60 साल की आजादी के बाद भी इस देश की आधी जनता के पास घर नहीं है तो इसकी वजह हैं नेता। इन्हें मुफ्त में घर मिलता है इसलिए ये नहीं जानते कि घर की अहमियत क्या होती है और कितनी मुश्किल से यह खड़ा होता है। यह कहना है जाने माने आर्कीटैक्ट हफीज कॉन्ट्रेक्टर का।
जाने माने इतिहासकार इरफान हबीब की विशेषज्ञता मध्यकालीन इतिहास पर है, पर अगर उनकी नजर को अनदेखा किया जाता है तो कई मायनों में आजादी के बाद के 60 सालों को सही परिप्रेक्ष्य में देख पाना मुश्किल होगा। उनका कहना है कि आजादी के बाद हमने सबसे बड़ी राष्ट्रीय शर्म का सामना किया- गांधी जी की हत्या और इसके बाद भी फेहरिस्त खत्म नहीं हुई है। लेकिन अच्छी बातें भी हैं इस 60 साल के सफर में और हमारे ख्वाब अभी अधूरे हैं। इन्हें पूरा होना है।
फॉरेन कॉरेस्पॉन्डेंट्स का दिल्ली में सत्ता के गलियारों में खासा दबदबा रहता है, राजधानी के ड्रॉइंग रूम्स में उनकी एक अहमियत होती है। मगर बीबीसी के मार्क टुली के साथ वह बात नहीं रही। धीरे- धीरे अपने काम की वजह से उन्होंने भारतीयों के मन में जगह बनाई। कलकत्ता में जन्मे और फिर स्कूलिंग के बाद यहीं बस गए सर मार्क टुली के लिए भारतीय आजादी के 60 सालों का अपना ही मतलब है।