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स्नेहा की राह पकड़ कई और उतरेंगी मैदान में

By: रूपक राग

सिण्ड्रैला को मुक्ति के लिए कब तक राजकुमार के आसरे रहना होगा कि वो आये और शीशे की जूतियां पहनाकर उत्पीड़न के चंगुल से उसे छुड़ा ले जाये? स्नेहा और मैं एक ही मोहल्ले में रहते...
 
व्यंग्य : ना मांगूं सोना- चांदी

By: रवींद्र पांडेय.

सोना शर्म से गड़ा जा रहा है। जिस तेजी से उसके भाव गिर रहे हैं, कुछ ही दिनों में बेचारे की भारी दुर्गति होनेवाली है। भिंडी-बैंगन के बराबर भी तो पूछ नहीं रही। गली-मुहल्लों में...
 
हालात से समझौता आखिर कब तक!

By: अंजू सिंह।

राजधानी में बढ़ती आपराधिक घटनाओं से उद्योग-व्यवसाय जगत सकते में है। डरे-सहमे व्यवसायी-उद्यमी अपने रहनुमाओं से सिर्फ एक ही सवाल पूछ रहे हैं, आखिर कब तक हम यों ही चुपचाप...
 
हुआ विकास, बढ़ी समस्याएं लेकिन जिम्मेवार हैं बेखबर

By: संजय सिंह।

संयुक्त बिहार के समय से अलग राज्य बनने के 12 साल बाद तक राजधानी में कई बदलाव हुए। विकास तो हुए, लेकिन समस्याएं भी बढ़ती गईं। वजह साफ है, अनप्लांड डेवलपमेंट। राजधानी के विकास...
 
हां, दिक्कू हूं मैं

By: विनय भरत

मैं गुमला में पैदा हुआ. यहीं नेहरु बाल विकास विद्यालय ( जो पालकोट रोड में था और अब बंद हो चुका है, जिसके संस्थापक मेरे पिताजी ही थे) में मेरी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा हुई. 4...
 
अजब नाम की गजब कहानी

By: कुंदन कुमार चौधरी

रांची. आदिवासियों के लिए पेड़-पौधों उनकी जिंदगी, उनकी संस्कृति से जुड़ी हैं। इसलिए प्रकृति से जुड़े नाम रांची में खूब देखने को मिलते थे, जैसे जहां कहीं कटहल का विशाल...
 
अटपटे नामों में छिपा है रांची का रोचक इतिहास

By: कुंदन कुमार चौधरी

एक छोटे से कस्बे से बढ़ते-बढ़ते रांची झारखंड राज्य की राजधानी बनी। कभी कहा जाता था, 'पीठ पर छौआ, माथ पर खांची/ जब देखो तो समझो रांची'। यहां के मोहल्लों और स्थानों के अटपटे...
 
... और नन्हीं सी श्रेया के नन्हें से सपने ने भी दम तोड़ दिया

By: सैयद शहरोज़ कमर.

नन्ही सी श्रेया के नन्हे से सपने ने भी दम तोड़ दिया। दादी सरोज को लोगों ने सफेद कपड़ों से न जाने क्यों लपेट दिया है। उन्हें तो पहली सितम्बर को आ रहे उसके बर्थ डे के लिए अच्छा...
 
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