जब जुड़ा झारखंड के गजराज और 'महाराज' का कनेक्शन, पढ़िए यह रोचक प्रसंग

 
Source: मधुकर श्रीवास्तव.     Designation: पत्रकार.
 
 
 
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http://unified.bhaskar.com/city_blogger_author_images/thumb_image/100122_thumb.gif बादशाह अकबर की महानता हमारे इतिहास में दर्ज है और हम उससे वाकिफ भी है। झारखंड आकर अकबर से जुड़ा एक प्रसंग दिल और दिमाग पर प्राय: दस्तक देता रहता है। उन्हीं को आप सब से साझा करता हूं।

अकबर के दरबार में नवरत्न हुआ करते थे। उनमे रहीम दास जी एक थे। एक मर्तबा वे किन्ही कारणों से नाराज होकर चित्रकूट चले गए। जब बादशाह अकबर को यह बात मालूम हुई, तो वे रहीम जी को मनाने चित्रकूट चल पड़े। वे जिस हाथी पर सवार थे, वह रास्ते में पड़ी धूल को सूंढ़ से उठाकर ऊपर उड़ा देती। हाथी के ऐसा करने से बादशाह की आंख में किरकिरी पड़ गई। वे दर्द से चिल्ला उठे। गुस्से में उन्होंने हाथी की इस गुस्ताखी के लिए मृत्युदंड की सजा मुकर्रर कर दी। चित्रकूट पहुंचने के दूसरी सुबह हाथी को मौत के घाट उतारा जाना तय हुआ। खबर पूरे चित्रकूट में फैल गई।

अकबर की तरह झारखंड के लोगों को भी गजराज से काफी नाराजगी है। हाथी आए दिन जंगलों से निकलकर गांवों में घुस जाते हैं। घर, झोपड़े ढहा देते हैं। खेत में खड़ी फसलों को तहस नहस कर डालते हैं। उनके सम्मुख जो भी आए, उसकी तबाही निश्चित है। उत्पात मचाना इनकी प्रकृति है। तोड़ फोड़ करना इनके स्वभाव में है। प्राय: हम इसी निष्कर्ष पर विराम लेते हैं। ऐसी समीक्षा पर मानव और दानव के फर्क की सीमा रेखा सिकुड़ती दिखती है।
झारखंड वन संपदा का धनी राज्य है। राज्य के तिहारो, चिनिया हेतार, डोल कैरबेरा, कुलुकेरा, हाथीबाड़ी, कुरूडेग जंगल छत्तीसगढ़ से जुड़े हैं। इन वनों में नक्सल गतिविधियां चलती रही हैं। बहुत तेजी से इन वनों में वनराज की गर्जना और गजराज की चिंघाड़ मौन होती जा रही है। आप वहां पक्षियों का कलरव नहीं सुन सकते। कुलांचे भरते मृग नजर नहीं आते। वन्यजीवो के बसेरे में नक्सली कैंप हैं। मोर्टार व बंदूकें गरजती हैं। लैंड माइंस बिछे हैं। नक्सली चौपालें लगाई जाती हैं। ट्रेनिंग कैंप चलते हैं। ऐसे में हाथियों के झुंड उधर आ जाए, तो उन्हें तितर बितर करने के लिए फायरिंग शुरू हो जाती है। गंधक की गंध और बारूद की आवाज से बौराए गजराज सुरक्षित ठिकाने की खोज में जंगल छोड़कर बाहर का रुख कर लेते हैं। जंगल के बाहर गांव और शहरों में पहुंच जाते हैं। उत्पात मचाते हैं। कई बार वे खुद भी घटना के शिकार हो जाते हैं। रेल से कटकर जान गंवा देते हैं। करंट की चपेट में आकर मारे जाते हैं। जंगल के बाहर भी उनको मौत मिलती है।

खैर, जिक्र अकबर का चला था। वह काल धन्य था कि रहीम और तुलसी धरा पर विद्यमान थे। इन दोनों विद्वानों ने हाथी को बचाने की जिम्मेदारी आधी आधी बांट ली। हाथी को सजा देने के समय रहीम दास उपस्थित हुए। उन्होंने बादशाह से गुजारिश की कि इस गजराज को माफ कर दें। इस पर बादशाह रहीम दास से पूछते हैं कि इस हाथी ने ऐसी हरकत क्यों की। गोस्वामी तुलसीदास से मिले उत्तर को रहीम ने दोहे में पिरोकर अकबर को समझाया।

रज उड़ावत गज चले,
कहु रहीम केहि काज।
जेहि रज ऋषि पत्नी तरी,
तेहि ढुंढत गजराज।।

महाराज इस गज की मनसा आपकी आंख में रज डालना नहीं था। यह तो धूल में उस कण को खोज रही थी, जिसके स्पर्श से गौतम ऋषि की पत्नी देवी अहिल्या का कल्याण हुआ था। ज्ञात हो कि गौतम ऋषि के शाप से अहिल्या पत्थर की हो गई थीं। भगवान श्री रामचंद्र के वन गमन के दौरान उनके पैरों से पाषाण में परिणत अहिल्या छू गई। इस स्पर्श से युगों बाद अहिल्या को शाप से मुक्ति मिली। यह हाथी सारी राह धूल के उसी कण को फूंक फूंक क खोज रही थी। इस तर्क को सुनकर अकबर ने गजराज की सजा माफ कर दी।

इंसानों का शिकार करना, विध्वंस मचाना, गजराज या वनराज का मकसद कतई नहीं है। ये उनका नैसर्गिक स्वभाव भी नहीं है। वन जहां वे स्वयं को सुरक्षित पाते हैं। उनका ठिकाना होता है। अब वे वहां असुरक्षित हैं। जंगल से खदेड़े जाने पर ये पशु अपना आपा खो बैठते हैं। तब वे उत्पात मचाते हैं। अपने लिए मुफीद ठिकाना खोजते हैं। अकबर ने तो गजराज को माफ कर दिया लेकिन झारखंड व छत्तीगढ़ में लोग हाथियों को माफ नहीं करते। अक्सर जंगल से भटकर गांव में घुस आए हाथी को ग्रामीण जख्मी कर देते हैं। इससे उनकी मौत भी हो जाती है। क्या बंदूकें जानवर और इंसानो के साथ साथ इंसानियत को भी मार रही हैं।
 
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