अब तक अच्छा या बुरा, नहीं बन सका कोई जननायक

 
Source: विनय भरत     Designation: शिक्षक, लेखक
 
 
 
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http://unified.bhaskar.com/city_blogger_author_images/thumb_image/100147_thumb.jpg मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा अभी 'जोहर यात्रा' के क्रम में सिमडेगा में थे. उनके काफिले पर किसी आदिवासी महिला समुराई टेटे ने पत्थर भी चलाये. चूँकि मैं मुख्यमंत्री की इस यात्रा के चार दिन पहले ही राउरकेला से राँची, सिमडेगा और ठेथईटांगर होते हुए लौटा हूँ, मैं महसूस कर सकता हूँ कि उस आदिवासी महिला को रोड पर पत्थर खोजने में तनिक भी देर नहीं लगी होगी. क्योंकि नया झारखण्ड जमीन के अंदर खनिज और सड़कों के ऊपर गड्ढे और पत्थरों के लिए जाना जाता है. ये नए बिहार की सड़क थोड़े न थी.



सिमडेगा से जब मैं सड़क के रस्ते गुजर रहा था, मुझे यही लगा, झारखण्ड लौह युग से पाषाण काल की ओर लौट रहा है. कोलेबिरा, तमरा और सिमडेगा के बीच लगभग 90 कि.मी. गड्ढों और पत्थरों के सहारे सड़कें बनी थीं. सुबह के 6 बजे राउरकेला से निकला था, और राँची तक तक़रीबन 230 कि.मी.की यात्रा में मुझे 8 घंटे लग गए. लगभग इतनी ही दूर राँची से औरन्गाबाद की यात्रा में मुझे महज 4.30 घंटे लगे. झारखण्ड अगर बिहार से महज 200 किमी की दूरी तय करने में यदि 3.30 घंटे पीछे चल रहा हो तो नए बिहार और नये झारखण्ड की रफ़्तार और विकास की तुलना हम आसानी से लगा सकते हैं.



झारखण्ड सिर्फ एक मामले में आगे रहा है. 12 साल में 10 सरकारें बन गयीं. झारखण्ड में अब तक अच्छा या बुरा – कोई एक जननायक नहीं बन सका. 32 जनजातीय भाषा बोलने वाला ये समाज शायद एक दूसरे की भाषा को समझ नहीं पा रहा. सब अपने –अपने कुनबे के नेता हैं. जन नेता कोई भी नहीं. कुछ नेतावों में आस दिखती है, पर आग जंगल के अंदर और झारखण्ड की धरती के बहुत नीचे तक लगी हुई है. और ऊपर वालों की प्यास असीम है.



अर्जुन मुंडा ने अपनी इस यात्रा के दौरान अपनी उपस्थति दर्ज कराई- दो इंजिनियर को बर्खास्त तथा एक को सस्पेंड करके. हलवाई पुल के निर्माण की देरी के वजह से एक ईई को भी सस्पेंड किया. जब इस रास्ते से गुजर रहा था, तो अपनी पत्नी अर्चना से, जो गोद में मासूम बच्ची आन्विः को सुला रही थी, मैंने इन गुमनाम इंजीनियरों को गरियाते हुए कहा था- “ कमीनों को फांसी पर चढा देना चाहिए. एक तो झींगुर की आवाज से सुनसानियत के साये में लिपटे जंगलों के बीच से नक्सली बंदूकों के चमकने का खतरा और ऊपर से खराब रोड. गाड़ी आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रही.” आज जब मुख्यमंत्री जी ने इन्हें बर्खास्त किया, दिल को बड़ी तस्सली मिलती अगर इस बीच एक सेवानिर्वित जे.ई. से मेरी बात नहीं हुई होती. उन्होंने साफ़ कहा, झारखण्ड के ज्यादातर बनती हुई सड़क पर फीता भी नहीं लगाया जाता. अनुमान से ‘ओ.के.’ किया जाता है. गाड़ी में फीता देखते ही अगले दिन अगवा होने का खौफ़ होता है. जहाँ तक पुल निर्माण की बात है, 80 % इंजिनिअर साईट पर पहुँच तक नहीं पाते. ऐसा नहीं है कि उनके पास सरकारी गाड़ी या पैर नहीं है. पर साईट की जाँच करने पर उनके पैर-हाथ काट दिए जाने का दहशत है. जो लोग ये दहशत पैदा कर रहे हैं, हो सकता है उन्हें हमारे विधानसभा में बैठे खोखले और थोथे लोगों से नफरत हो..इनके विकास के निकासी रास्ते पर भरोसा न हो. जो भी हो, काल के इतिहास में एक भूखंड समता और विकास के पन्नों से कहीं बहुत बाहर खड़ा दिखता है.


पर काम कैसे होता है,किसका कितना परसेंटेज है, ये मेरे लिए रहस्य ही रहा, क्योंकि खौफ़ इतना है कि वो रिटायर होने के बाद भी मुँह खोलने से डरते हैं. 35 साल की नौकरी ने उनकी जुबान को कुतर दिया है. ठीक उसी तरीके से जैसे हम जैसे आम आवाम को चुनाव के वक्त शोर करता हुए अलग –अलग पार्टियों के चोंगे से उठती हुई आवाज़ सुनाई नहीं देती. ना ही इलेक्शन कमीशन की गुजारिश- ‘वोट करें, चोट करें’.



अब सब दिखावा लगता है- सस्पेंसन का गेम और यात्रा में बोला गया जोहार.. न ही अब कोई यात्रा डांडी है, न ही कहीं कोई सत्य-आग्रह.


अर्जुन से उम्मीदें हैं. शायद उनकी यात्रा से सड़क के घाव चिप्पियों से शायद भर भी गए हों.,समुराई टेटे के घाव भरें , न भरें..!
 
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