यहां झूठा है विकास का सुहाना सफर

 
Source: अश्विनी कुमार पंकज।     Designation: संपादक/रंगकर्मी।
 
 
 
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http://unified.bhaskar.com/city_blogger_author_images/thumb_image/100157_thumb.jpg झारखंड की अर्जुन मुंडा सरकार ने बीते 11 सितम्बर को दो वर्ष के कार्यकाल को पूरा लिया है। वे राज्य के 8वें मुख्यमंत्री हैं और अपनी सरकार के दो साल पूरे कर लेने पर उन्होंने घोषणा की है कि झारखंड के छोटे निवेशकों को राज्य में ही वन व पर्यावण क्लीयरेंस दिया जायेगा। राज्य सरकार स्टेट इनवायरमेंटल इंपैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी बनायेगी। इसके तहत बी कैटेगरी के उद्योगों का क्लीयरेंस यहीं पर मिलेगा। दिल्ली जाने की जरूरत नहीं पडे़गी। इसी के साथ जब नगड़ी के सवाल पर विस्थापन बनाम विकास की लड़ाई राजधानी में चरम पर है मुण्डा सरकार ने औद्योगिक नीति 2012 जारी करते हुए 22431.79 करोड़ के निवेश के लिए सात कंपनियों के साथ एमओयू की भी जानकारी दी। और दो साल के कार्यकाल को सफल मानते हुए मुण्डा सरकार ने छह दिवसीय फिल्म समारोह ‘सुहाना सफर’ का आयोजन कर राज्य को यह संदेश दिया कि झारखंड प्रगति के सुहाने सफर पर है।


भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो), और ऑजसू पार्टी तथा दो निर्दलीय विधायकों के समर्थन से चल रही गठबंधन सरकार का सफलतापूर्वक बिना किसी बड़े विवाद के दो वर्षों तक चलना ही इस सरकार की एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। अर्जुन मुंडा सरकार ने अपने दो वर्ष के कार्यकाल में मुख्यमंत्री लाडली लक्ष्मी योजना, बिटिया वर्ष, मुख्यमंत्री दाल-भात योजना, गुटखे पर प्रतिबंध, उद्योग नीति और ऊर्जा नीति 2012, जेनरिक दवा दुकानें समेत अन्य योजनाओं को पिछले एक वर्षं के कार्यकाल में सफलतापूर्वक लागू किया। इसके अलावा पंचायत चुनाव, राष्ट्रीय खेल, सेवा प्रदाय कानून, ई-गर्वनेंस समेत अन्य योजनाएं भी मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के कार्यकाल की देन हैं। पर सफलता के इन दावों के बावजूद राज्य की जनता के बुनियादी सवाल और जरूरतें जस की तस हैं।


सरकार के अनुसार नई औद्योगिक नीति 2012 एक अप्रैल 2011 से प्रभावी लागू मानी जाएगी। इसमें कहा गया है कि औद्योगिक नीति को रोजगारोन्मुखी बनाने का प्रयास किया गया है और नई औद्योगिक नीति से अगले पांच वर्षों में जहां 20 लाख लोगों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार मिल पाएगा, वहीं इस्पात उत्पादन भी 12-13मिलियन टन प्रतिवर्ष से बढ़कर 25 मिलियन टन प्रतिवर्ष हो जाने की उम्मीद है। साथ ही सीमेंट और एल्यूमिनियम उत्पादन में भी अगले पांच वर्षों में दुगुना हो जाएगा। लेकिन बुनियादी नागरिक सुविधाओं की बात करें और विधानसभा के मानसून सत्र में महालेखाकार द्वारा रखी गई रिपोर्ट की मानें तो राज्य के अधिकारियों और व्यापारियों ने मिलीभगत कर वित्तीय वर्ष 2010-11 में 1396.85 करोड़ का चूना लगाया है। राज्य के 12 बोर्ड, निगमों में से चार ने 724.42 करोड़ का घाटा खाया है। प्रदेश के 17 शहरों में 444.83 करोड़ की लागत वाली एपीडीआरपी योजना सिर्फ पांच शहरों में ही लागू हो सकी। राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतिकरण के तहत लक्षित 27147 गांवों में से 21100 गांवों में ही काम हो सका और इसमें भी महज 13486 गांवों तक बिजली पहुंच सकी।


झारखंड को बने बारह साल हो गये। इन बारह सालों में झारखंड की हर सरकार ने ‘विकास’ की बड़ी-बड़ी बातें की। एमओयू हुए। शिलान्यास किये गये और हवाई घोषणाओं की रेवड़ियां बांटी गईं। राष्ट्रीय एवं झारखंडी, सभी राजनीतिक पार्टियों का पूरा पराक्रम ‘सरकार बनाने व बचाने’ पर केन्द्रित रहा। जनता हाशिए पर रही। फायदा देशी-विदेशी कंपनियों, राजनेताओं और ‘विनोद सिन्हा’ जैसे सत्ता के दलालों को मिला। झारखंडी जनता और जंगल (बिर) के आदमियों (होड़) को मिली भूख से मौतें। ‘मनरेगा’ नरेटा (गले) में फंसकर जान लेता रहा। फिर भी, मुण्डा सरकार कह रही है कि झारखंड सुहाने सफर पर है।


स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क सभी क्षेत्रों की हालत बदतर है। न तो विद्यालयों की हालत सुधर रही है और न ही शिक्षकों की नियुक्ति की जा रही है। स्वास्थ्य सेवाएं तो कई गांवों तक पहुंची ही नहीं है। मामूली बीमारी के लिए भी लोगों को भाग कर शहर आना पड़ता है। घटती हुई जन्मदर बताता है कि राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत कितनी खराब है। राज्य के सबसे बड़े और एकमात्र चिकित्सा संस्थान रिम्स में एक जनवरी से मुफ्त इलाज बंद हो गया है। विभिन्न योजनाओं के लिए केन्द्र सरकार से मिली राशि खर्च नहीं हुई है। अरबों की राशि हर साल लौटायी जातमी है या फिर लैप्स होती है। ऐसे में जाहिर है कि राज्य का सबसे बड़ा सवाल विस्थापन सरकार की प्राथमिक कार्यसूचि में नहीं है और राज्य के एक छोर से दूसरे छोर तक जमीन अधिग्रहण की असंवैधानिक कार्रवाई ‘कानून’ के बल पर जारी है। लेकिन लगातार हो रहे विस्थापन विरोधी आंदोलन इस बात का संकेत हैं कि वे विकास के जनविरोधी चेहरे को बरदाश्त करने के लिए अब और तैयार नहीं हैं। वह भी तब, जब न्यायालय (नगड़ी में लॉ युनिवर्सिटी के कुलाधिपति चीफ जस्टिस हैं और वही संबंधित केस की सुनवाई भी कर रहे हैं) भी इस खेल में शामिल हो।
 
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