हां, दिक्कू हूं मैं

 
Source: विनय भरत     Designation: शिक्षक, लेखक
 
 
 
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http://unified.bhaskar.com/city_blogger_author_images/thumb_image/100147_thumb.jpg मैं गुमला में पैदा हुआ. यहीं नेहरु बाल विकास विद्यालय ( जो पालकोट रोड में था और अब बंद हो चुका है, जिसके संस्थापक मेरे पिताजी ही थे) में मेरी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा हुई. 4 वर्षों के बाद पापा का तबादला कार्तिक उरांव कोलेज से राँची स्नातकोत्तर रसायन विभाग में हुआ और हम सब राँची आ गए. तब से लेकर आज तक राँची में पढा और राँची में ही नौकरी कर रहा हूँ. पर कल तक ‘अंदरी’ था, आजकल ‘बाहरी’ हो गया हूँ.

माँ-पापा बिहार के हैं और मेरी चमड़ी भी बिहारियों सी है. पर बिहार में जाता हूँ तो लोग वहाँ भी मुझे “बाहरी” वाला और झारखंडी बोलते हैं क्योंकि मेरी सोच और जुबान दोनों पहाड़ी हो गए हैं. मेरी जुबान में कहीं भी बिहार का अक्खडपन और बेलाग अंदाज नहीं दिखता. जेहन से झारखंडी, जुबान से झारखंडी पर जिस्म से बिहारी हूँ मैं. कल तक झारखण्ड भी बिहारी था, आज बाहरी हो गया है. मैंने चर्च द्वारा संचालित कॉलेजों में पढाई की है और मेरी जुबान मिशनरी और सोच भी मिशनरी हो गयी है. मैंने आपने कॉलेज के ज़माने में “बिहारी” दोस्तों से ज्यादा “झारखंडी” दोस्त बनाये क्योंकि हमारी सोच और जीने की शैली मिलती थी.

होली भी मनायी पर क्रिसमस के समय गैद्रिंग्स की एंकरिंग भी की. दिन–दिन भर गिटार, कैरोल्स के गीत गाए और थकान मिटाने के लिए साथियों के साथ हडिया भी पी. झूमा, डांस किया और झारखंडी सपने भी देखे. दशम के किनारों को अपना माना, हुंडरू के संगीत ने माँ-की तरह मेरी आत्मा को सींचा. यहाँ के पत्तों-पत्तों की महक ने मेरे नस-नस को छुवा और सींचा है. यहाँ का दर्द मेरा दर्द बना. मैंने झारखण्ड बनने की खुशी में नाचा है. माघे पर्व में नाचा है और समृधि की कामना की है. मसीही-गैर मसीही मेरे दोस्त बने. सरना स्थल की मैंने भी पूजा की है और एक भी सरहुल मिस नहीं किया. ये मेरे रूह के उत्सव हैं. इन्होने मुझे गोद लिया है.

झारखंडी धरती को लुटते–बिकते जब देखता हूँ। अखबारों में छपे मेरे अक्षर आग बरसाते हैं. मैं सियासी चाल की पदचाप सुनता हूँ और देखता हूँ, यहाँ के कुछ लीडर्स ने आपने ही जंगल में आग लगा दिया है और शक की अंगुलियां किसी और ओर मोड़ दी हैं. " शक” की राजनीति पर शोषण चल रहा है. और इस खेल में “बाहरी” और “अंदरी” दोनों की जबरदस्त सांठ-गांठ है.

आज मैं बोल नहीं सकता, क्योंकि मेरा जिस्म बिहारी है और मैं “बाहरी” हूँ. “दिक्कू”हूँ. आज मैं बिहार में भी “बाहरी “ हूँ, क्योंकि मैंने पूरी पढाई और सोच “झारखंडी” पाल रखी है. मेरा वहाँ कोई अपना नहीं. मेरा यहाँ भी कोई अपना नहीं. मेरे कॉलेज के समय के दोस्त भी अब मुझे यहाँ के लोगों का दर्द समझाते हैं. जैसे मुझे कोई इल्म नहीं. जब गन्ने खाता हूँ, तो पूछते हैं-“गन्ना बिहारी फसल है या झारखंडी?” अब मैं उन्हें कैसे समझाऊं , “क्या फर्क पड़ता है, गन्ना बिहारी फसल है, या कि झारखंडी, इसके ख़रीदे जाने से जिनका पेट पल रहा है, वो तो झारखंडी ही हैं ना!” लेकिन मैं जानता हूँ, उनके प्रश्न का एक ही अर्थ है- उन्हें अब अपने इस साथी पर शक है.और ये शक उनका अपना नहीं है. इन्हें बाहर से आरोपित किया जा रहा है. और इसी शक पर खेली जा रही है, पिछले 12 वर्षों से झारखण्ड की अस्थायी, अस्थिर, लूट खसोट और बंदरबाट की खिचड़ी राजनीति.

मुझे धूमिल की ये कविता याद आ रही है-

"एक आदमी रोटी बेलता है
दूसरा आदमी रोटी सेंकता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है
न रोटी सेंकता है
वो सिर्फ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं- ये तीसरा आदमी कौन है?
मेरे देश की संसद मौन है!"

अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा-

"यदि तुम्हे मुझे दिक्कू कहने में मजा आता है,
तो चलो मैं खुद से कहता हूँ-
दिक्कू हूँ मैं.
पर झारखण्ड के विकास के मार्ग पर
खड़े “बाहरी” और “भीतरी”
दोनों के खात्मे की दुआ करता हूँ मैं."
 
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