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Badle ki Aag

बदले की आग

  • सोशल बोल: ईवीएम के तीसरे बटन को सात बार दबाने से शाम से पहले अच्छी खबर आती है!

    सोशल बोल: ईवीएम के तीसरे बटन को सात बार दबाने से शाम से पहले अच्छी खबर आती है!
    खबर अगर पक्की हो तो वो खबर होती है। और खबर अगर पक्की न रहे तो वो बड़ी खबर हो जाती है। जैसा पिछले दिनों ईवीएम के फर्जी निकलने की खबर के साथ हुआ। खुद ईवीएम बनाने वाले ने कभी न सोचा होगा कि मशीन पर इस तरह की गड़बड़ियों के आरोप लग सकते हैं। पिछले दिनों इलेक्शन कमीशन के दफ्तर मेंं एक आदमी इस बात की शिकायत करने को बैठा था कि ईवीएम की बटन दबाने पर लड्डू नहीं निकला।   दो घंटे की बहस के बाद उसे समझाया जा सका कि ऐसा ईवीएम नहीं, मंदिरों के बाहर सिक्के लेकर प्रसाद देने वाली मशीनों में हुआ करता था, जो कब की बंद हो चुका है। हारे नेताओं को इस बात की तसल्ली रही कि उन्हेंकुछ वोट मिले थे। अगर वो भी न मिलते तो आरोप लगते कि उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में ईवीएम का बटन दबाने पर छैंया-छैंया गाना बज रहा था। हाल के दिनों में ईवीएम की गड़बड़ियों वाला जो वीडियो वायरल हुआ, उसमें कुछ संदिग्ध नहीं था। वो तो बस सरकारी संस्थाओं पर हमारे भरोसे को दिखा रहा था। ईवीएम भी तो सरकारी ही होती है और इलेक्शन कमीशन भी। हम मानकर बैठे हैं कि कोई भी सरकारी चीज ठीक से काम कर ही नहीं सकती और अगर कर रही है तो पक्का कुछ न कुछ गड़बड़ होगी। सरकारी मशीन और सरकारी मशीनरी ढंग से काम करे, यही अपने आप में संदेहास्पद है। इधर इलेक्शन कमीशन ने खुली चुनौती दी है कि कोई भी आकर ईवीएम में गड़बड़ी साबित करे।   इलेक्शन कमीशन को ऐसा नहीं करना चाहिए। न भूलेंकि उनका सीधा-सीधा सामना नेताओं से हो रहा है। नेता दिन को रात, कन्नौज को कश्मीर और गोरखपुर को गोंडवाना साबित कर सकते हैं। और तो और नेताओं ने ही तो ये भरोसा दिला रखा है कि वो जनता की सेवा के लिए हैं। जो लोग पांच साल में एक बार आकर खुद को इतने सारे लोगों का हितैषी साबित कर सकते हैं। उनके लिए क्या मुश्किल होगा एक मशीन को गलत बताना। लेकिन अभी तक कोई...
  • सोशल बोल: गुटखा तो ठीक है, पर दफ्तरों में चाय-पानी मत बंद करा देना

    सोशल बोल: गुटखा तो ठीक है, पर दफ्तरों में चाय-पानी मत बंद करा देना
    एक सरकार को पांच साल का समय लगता है, कई-कई कठिनाइयां खड़ी करने में फिर चुनाव होते हैं। नई सरकारें अपने साथ नई तरह की कठिनाइयां लाती हैं। ये जाकर उन कठिनाइयों में बढ़ोत्तरी करती हैं, जो पिछली सरकार ने खड़ी की होती हैं। बेसिकली सरकारें बदलने से कुछ नहीं होता। कठिनाइयों का फ्लेवर बदल जाता है। जैसे अभी कठिनाई ये है कि उत्तर प्रदेश में नए मुख्यमंत्री ने आते ही सरकारी दफ्तरों में पान-गुटखा बंद करा दिया है। एक कर्मचारी बिना काम किए रह सकता है। बारह बजे आकर 3 बजे घर वापस जा सकता है। बिना चापलूसी किए रह सकता है, पर बिन गुटखे या पान मसाले के सरकारी दफ्तरों में एक भी दिन काम हो पाएगा? ये मेरी सोच से बाहर की बात है। कभी आपने ये सोचा कि सरकारी दफ्तर हमेशा गेरू से ही क्यों पोते जाते हैं? जवाब सीधा है ताकि गेरू और गुटखा अंत में एकाकार हो जाएं। गेरू और गुटखा जब मिलता है तभी तो गवर्नमेंट ऑफिस बनता है। सरकारी दफ्तरों में जाकर विचार पनपता है, माना कि भारत में ऐन मौके पर पीकदान नहीं मिलता, लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि वो सरकारी दफ्तरों में आकर थूकें। एक सरकारी दफ्तर के लिए जितना जरूरी गुटखा या पान मसाला है। उतनी ही जरूरी महिला कर्मचारियों का ऊन से स्वेटर बुनते रहना है। दस-बीस साल इस फील्ड में बिताने के बाद महिला कर्मचारी इतनी मल्टीटास्कर हो जाती हैं कि सब्जी काटने से लेकर बेटे का ब्याह तक ऑफिस में बैठे-बैठे तय कर लेती हैं। इसी तरह सरकारी दफ्तरों के लिए काम टालते रहने की आदत भी बहुत जरूरी है। हर जगह का एक सिस्टम होता है। सरकारी दफ्तर इस सिस्टम को सबसे कायदे से फॉलो करते हैं। दो मिनट में होने वाला काम भी आदमी दो महीने तक लटकाकर रखता है, वजह ये होती है कि जल्दी काम कर दो तो ऊपर वाले को ये अपने कार्यक्षेत्र में अतिक्रमण लगता है। एक दफ्तर के चलते रहने...
  • सोशल बोल: इस नोटबंदी को एक न एक दिन चूरन तक आना ही था

    सोशल बोल: इस नोटबंदी को एक न एक दिन चूरन तक आना ही था
    जिस बैंक का वह एटीएम है, उससे "अभी लंच है, बाद में आना' वाली पर्ची भी निकल सकती थी।  इस नोटबंदी को एक न एक दिन चूरन तक आना ही था 2000 रुपए का नोट, बुधुआ की लुगाई हो गया है। जो सबके निशाने पर रहता है, और सबका अत्याचार सहता है। दिल्ली के एक एटीएम से 2000 के नोट की बजाय चूरन वाले नोट निकले। काजल लगाते-लगाते आंख फूट जाती है और मजाक करते-करते मजाक सच हो जाता है। आते के साथ ही जिस नोट को चूरन वाला कहा गया था, अब उसकी जगह सच में चूरन वाला नोट निकला। ताज्जुब तो इस बात का है कि निकालने वाले ने कैसे असली-नकली में फर्क कर लिया। हमें तो अब भी जब तक नोट न चल जाए कॉन्फिडेंस नहीं रहता कि नोट असली है या नकली। खैर इसी के साथ साबित हो गया कि देश स्वतंत्र है, किसी को कहीं भी जाने का हक है, अब देखिए न नकली नोट भी एटीएम तक पहुंच गए। जिसके नोट नकली निकले उसके लिए दुखी मत होइए, नकली ही सही कम से कम निकले तो, वरना जिस बैंक का वो एटीएम है, उससे "अभी लंच है, बाद में आना' वाली पर्ची भी निकल सकती थी। उस आम आदमी के लिए ये आधे सुख-आधे दुःख वाली हालत रही होगी, दुःख नकली नोटों का और खुशी इस बात की कि अब भीड़ छंट गई है और एटीएम के बटन दबा पाने का सुख तो मिला। वर्ना पहले तो हाल ये था कि कई लोग एटीएम से पैसे निकलने वाली खुर्र-खुर्र की आवाज को मिस कर रहे थे। बाजारवाद इस कदर हावी हो चुका है कि नोट निकलने की खुर्र-खुर्र आवाज महंगे दामों में इंटरनेट पर बिक रही थीं, जिन्हें सिर्फ कैश देकर खरीदा और सुना जा सकता था। कुछ पर्यटन कंपनियों ने तो नवविवाहित जोड़ों के लिए एक लग्ज़री हनीमून प्लान भी तैयार किया था, जिसमें 7 दिन और 6 रातों के हनीमून पैकेज में भीड़ भरे एटीएम के अंदर तक दो चक्कर लगवाने भी शामिल थे। वक़्त हर घाव को भर देता है, कुछ को तो सही वक़्त पर भर देता है। ऐसा न होता और एटीएम पर पहले जैसी...
  • तमिलनाडु में शपथ ग्रहण के बाद टेंट वाले ने कुर्सियां ले जाने से किया इनकार

    तमिलनाडु में शपथ ग्रहण  के बाद टेंट वाले ने कुर्सियां ले जाने से किया इनकार
    तमिलनाडु की राजनीति में जो हो रहा है, वो बताता है उत्तर हो या दक्षिण, भारत एक है। वैसे ही भारत की राजनीति भी एक है। यूपी में लड़ाई चाचा-भतीजे की थी। तमिलनाडु में चिनम्मा से है। उत्तर में भी आदमी को, आदमी की पार्टी से पल भर में निकाल दिया जाता है, दक्षिण में भी। और एक बात ये भी साफ हो गई कि अगर कोई किसी राज्य का सीएम बन गया है तो वो खुद को सबसे ऊपर न समझे क्योंकि मौका आने पर न अखिलेश की चलती न पन्नीरसेलवम की। इस हिसाब से केजरीवाल देश के सबसे सफल मुख्यमंत्री हैं, इसलिए नहीं कि उनकी दिल्ली में चलती है, बल्कि इसलिए कि खुद वो अगल-बगल के दो-चार राज्यों में चले जाते हैं।  राजनीति का एक फायदा है, बात जब ज्यादा फैलती है तो जनता को चीजें याद होने लगती हैंं। अभी आप किसी से भी पूछ लीजिए- वो तमिलनाडु की राजधानी सवाल खत्म होने से पहले ही बता डालेगा। ये अच्छी बात है, ऐसा ही राजनैतिक संकट अगर देश के हर राज्य में फैलने लगे तो एक साल के अंदर पांचवी क्लास में पढ़ने वाले हर बच्चे को देश के सारे प्रदेशों की राजधानी के नाम याद हो जाएंगे। अभी एक आम आदमी को चिनम्मा से लेकर, चेन्नामनेनी विद्यासागर राव और के. पलानीसामी जैसे खांटी साउथ इंडियन टर्म कंठस्थ हो चुके हैं। एक यही तरीका है, जो साउथ और नॉर्थ इंडिया को थोड़ा और पास-पास ला सकता है।  भारत फैलाव में उत्तर से दक्षिण तक है और असर में खुसरो से इसरो तक का देश है। अभी हाल ही में इसरो ने 104 सैटेलाइट्स एक साथ लॉन्च किये हैं। इधर तमिलनाडु में दो महीने के अंदर तीन मुख्यमंत्री बदल गए। इसरो कुछ दिन रुक जाता तो तमिलनाडु मुख्यमंत्री बदलने के मामले में, इसरो के सैटेलाइट्स की संख्या को कहीं पीछे छोड़ देता। जितनी जल्दी-जल्दी मुख्यमंत्री बदल रहे हैं, और आ-जा रहे हैं।  अखबारों ने ‘मुख्यमंत्री बदले’ और ‘नए मुख्यमंत्री’...
  • Yeh Lo: ट्रम्प को मोदी ने समझाया व्हाइट हाउस का नक्शा

    Yeh Lo: ट्रम्प को मोदी ने समझाया व्हाइट हाउस का नक्शा
    अमेरिका का राष्ट्रपति बने डोनाल्ड ट्रम्प को चार दिन भी नहीं हुए। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फोन लगा बात कर डाली। बड़ा आदमी ये होता है, किसी से फोन पर बात भी कर ले तो खबर बन जाती है। एक हमारे रिश्तेदार हैं कि जरा सा बड़े आदमी बने नहीं कि किसी से बात ही करना बंद कर दते हैं। पदभार संभालते ही मोदी को कॉल करने से, वो बहुएं याद आ गईं, जो ससुराल पहुंचते ही सीधे फोन लगा मायके में बताती हैं, कि बाकी सब ठीक है, शॉवर से पानी कम आता है। ट्रम्प ने मोदी को कॉल क्यों किया, इस बारे में लोग सवाल उठा सकते हैं, लेकिन सच कोई नहीं बताएगा। सच ये है कि कोई अमेरिका का राष्ट्रपति बनता ही क्यों हैं? ताकि एक दिन वो इंडिया आए और ताजमहल के सामने खड़ा होकर फोटो खिंचा सके। ताजमहल के सामने किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के फोटो खिंचाते ही भारत में जीडीपी सुधर जाती है। विश्वशांति के प्रयास सफल हो जाते हैं। इराक में जो तब नहीं मिले थे वो रासायनिक हथियार मिलने लगते हैं। सीरिया में बम हमले बंद हो जाते हैं। रूस अपनी विदेश नीति बदल लेता है और चीन का निर्यात साल में 12 फीसदी नीचे चला जाता है। बस ट्रम्प ने यही पूछने के लिए कॉल किया था कि उनकी फोटो खिंचाने को वो पत्थर की बेंच अब भी वहां लगी है या नहीं। साथ ही ट्रम्प ने ये इच्छा भी जताई कि वो ताजमहल की चोटी पकड़कर भी एक फोटो जरूर खिंचवाना चाहेंगे। एक सच ये भी है कि ट्रम्प ने मोदी से व्हाइट हाउस का नक्शा समझने के लिए कॉल किया था। ट्रम्प पहली बार ही व्हाइट हाउस पहुंचे हैं, लेकिन मोदी तो कुछ ही दिनों में कई बार अमेरिका जा चुके हैं। सूत्र बताते हैं कि मोदी ने ही ट्रंप को बताया कि व्हाइट हाउस में 132 कमरे, 35 बाथरूम और 412 दरवाजे हैं। ये मोदी ने ही बताया कि ब्लू रूम, ग्रीन और रेड रूम के बीच है। चूंकि मोदी जी का व्हाइट हाउस में अक्सर आना...
  • सोशल बोल: चुनाव में चिड़िया गिनने वाले

    सोशल बोल: चुनाव में चिड़िया गिनने वाले
    कुछ प्राणी शीतनिद्रा में होते हैं, ठंड बीतते ही अचानक एक्टिव हो जाते हैं। ऐसा ही एक प्राणी और होता है। जो "चीट-निद्रा' में होता है। और पांच साल में एक बार अचानक से एक्टिव हो जाता है। विज्ञान की किताबों में उसे नेता कहा जाता है। पांच साल में एक्टिव होने वाला नेता सिर्फ चुनावों के लिए हाथ-पैर नहीं मारता। कई बार वो इस पार्टी से उस पार्टी में भी गुलाटी मारता है। पांच साल में यही वो समय होता है, जब अचानक से उसकी अंतर्रात्मा जाग जाती है, मानो अंतर्रात्मा अब तक आदर्श आचार संहिता लगने के इंतज़ार में थी।  दल बदलने वाले नेता का दिल चोट खाए आशिक की तरह हो जाता है। हमेशा एक ही शिकायत रहती है। उसने मुझे समझा ही नहीं। जिस तरह से ब्रेकअप के बाद प्रेमी जोड़ों को एक-दूसरे में खोट ही खोट नज़र आने लगते हैं। वैसा ही दल बदलने वाले नेता और छोड़ी गई पार्टी के साथ होता है। हाल ही में एक नेता ने कहा, मेरी पिछली पार्टी कौशल्या नहीं कैकई थी। बदले में पार्टी का जवाब आया, बेटा तुम भी तो कभी राम या श्रवण कुमार नहीं रहे। इसके अलावा जाने वाले नेता की कई छोटी-मोटी शिकायतें भी होती हैं, जिनको सुलझाने के लिए बैठा जाए तो एक राज्य सरकार का पांच साल का पूरा कार्यकाल उनकी शिकायतें सुलझाने में बीत जाए।  चुनावों के ठीक पहले का मौसम प्रयास और प्रवास का होता है। नेता पहले प्रयास करता है, उसे टिकट मिल जाए। उसे मिल गया तो बेटे-बेटी को मिल जाए और अगर प्रयास असफल रहें तो प्रवास कर लेता है। मतलब एक पार्टी से दूसरी पार्टी में चला जाता है। अखबार में दलबदल की खबरें वैसे ही बढ़ जाती हैं, जैसे किसी खास मौसम में किसी खास प्रजाति के पक्षियों का झुण्ड बनाकर एक ही दिशा में उड़ना। पार्टियां भी इसके लिए तैयार होती हैं, जितने जा रहे होते हैं, उसके दोगुने वो सामने की पार्टी से खींच लेती हैं।...

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