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  • क़द बता देता है...
    जम्मू-कश्मीर में बारशि के कारण नदी-नहरें उबल पड़ीं। श्रीनगर में झेलम नदी ने अचानक अपने कनिारे तोड़ दएि। उस इलाक़े को पानी-पानी कर दयिा, जसिने ख़ुद को हमेशा इस तरह की मुश्कलिों से महफ़ूज़ माना था। क़ुदरत भी अजीब शै है। इंसान को याद दलिा ही देती है किउसके बस में कुछ नहीं। जब वो अपनी मनमानी करेगी, इंसान को सब भुला देगी। वो तमाम भेद भी, जन्हिें लोग अब तक अपनी ज़िन्दगीसे भी बड़ा मानते रहे हैं। सैलाब सब नाप लेता है। नापकर, बराबर करके दखिा देता है कुछ बड़ा नहीं क़ुदरत से, कुछ छोटा नहीं कसिी से। आपदाएं एकाएक यह...
    September 17, 12:53 PM
  • ओह, आपको हिंदी नहीं आती?
    तना गर्व महसूस होता है यह कहने में कि हमें हिंदी नहीं आती। ऐसे लोग आपको-हमको मिलते ही रहते हैं। और ऐसों की तो कमी ही नहीं, जो यह कहते हुए हीनता महसूस करें कि उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती। विदेशी भाषा का ऐसा रुआब होगा कि जिसका देश है, उसको दर-बदर होने का संकट झेलना पड़ेगा, यह तो सोच ही अहमक़ाना लगती है। वैसे जो ऐसी कल्पनाएं करके ही ख़ुश होते हैं कि हिंदी दिवस मनाने वाले मानते हैं कि भाषा पर संकट है, तो उन्हें अपनी ख़ुशफ़हमी दूर कर लेनी चाहिए, क्योंकि यह दिन मनाना संकट का द्योतक नहीं, अपने ही देश में, सैलानियों...
    September 10, 01:42 PM
  • गुरु मिले तो जग मिले
    शिक्षक पाठ्यपुस्तकों तक सीमित हो गए हैं, इसलिए विद्यार्थियों का संसार भी उन्हीं तक सिमट गया है। ज़रूरत है कि शिक्षक वे गुरु बनेंगे, जो दिशा दिखाते हैं, संसार की खिड़कियां खोलते हैं और जीना सिखाते हैं। टी वी पर आने वाले एक विज्ञापन में जब बच्चा कहता है कि दीवार दो तरह की होती है- एक अच्छी, दूसरी बुरी, तो बाक़ी बच्चे हंसते हैं। वे इसलिए हंसते हैं कि यह उनकी पाठ्यपुस्तकों और रट्टा लगाई गई जानकारी से बाहर की बात है। यह एक प्रसंग हमारी शिक्षा प्रणाली की पोल खोल देता है। यह बताता है कि हमारी शिक्षा...
    September 3, 03:41 PM
  • श्री वरदमूर्तये नमो नम:
    गणेश चतुर्थी पर्व पर जगह-जगह पंडाल लगाकर गणपति की पूजा अर्चना की जाती है। कुछ लोग घर में भी गणपति की प्रतिमा स्थापित करते हैं। वैसे तो आजकल गणपति के तरह-तरह के रूप उपलब्ध हैं, लेकिन परम्परागत तौर पर वर मुद्रा में लम्बोदर या गजानन रूप का ही पूजन श्रेष्ठ फलदायी होता है। गणपति देवताओं को भी वरदान देने वाले स्वयं ॐकार के स्वरूप माने गए हैं। जिस तरह प्रत्येक मंत्र के आरम्भ में ॐ का उच्चारण आवश्यक माना जाता है, उसी तरह शुभ अवसर पर गणपति पूजन अनिवार्य है। मारे शास्त्रों के तहत श्रद्धा और...
    August 27, 03:40 PM
  • खत में रोशन यादें
    उस पुराने, मुड़े-तुड़े ख़त में कई यादें बंद थीं। एक बार झांककर उसकी ओर देखा। ख़त के साथ-साथ मेरी ज़िंदगी में वह मीठा इंतज़ार लौट आया... आदरणीय मां और पापा, आशा करता हूं आप दोनों स्वस्थ व ख़ुश होंगे। मैं भी अच्छा हूं। स्वस्थ हूं, समय पर खाता हूं, सोता हूं और कोशिश कर रहा हूं कि अच्छा शेड्यूल बनाकर रख सकूं। यहां पढ़ाई भी बढ़िया होती है। हां! कुछ नए दोस्त भी बनाए हैं मैंने! बहुत अच्छे हैं वो... हम एक दूसरे से न केवल अपनी चीज़ें और किताबें, बल्कि अपना अकेलापन, दुख-सुख सब बांटते हैं। मां, आपने जैसा कहा था, मैं सोने से...
    August 20, 01:58 PM
  • जिम्मेदार आजादी
    लेने से पहले देना पड़ता है। अधिकारों और सुविधाओं से पहले कर्तव्य निभाने पड़ते हैं। ज़िम्मेदारियों में कोताही होती है, तो अधिकार भी बाधित होते हैं। आज़ादी के पर्व पर इस पहलू से भी सोचें... आज़ादी ढेरों अधिकार देती है, साथ ही यह आपसे कर्तव्य-पालन की अपेक्षा भी रखती है। इसलिए अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना, उनकी मांग करना ज़रूरी है, लेकिन अपनी जि़म्मेदारियां निभाना भी उतना ही ज़रूरी है। आप अपने कर्तव्य निभा रहे हैं या नहीं, यह बात दूसरों के अधिकारों को प्रभावित करती है और अक्सर आपके अपने...
    August 13, 12:50 PM
  • बयार, फुहार और दुलार का सावन
    सावन की बात ही निराली है। अल्हड़ और बेफ़िक्र बना देता है। बूंदों के बीच बहती बयार। शरारतें, शिकायतें, झिड़कियां और दुलार। और सबमें भरी ढेर-सारी मिठास। सावन की बातों और यादों का मौसम यहां भी आ ठहरा है। अ हा! सावन और वह भी बचपन का! अतीत के पन्ने पलटती हूं, तो होने लगता है अहसास कुछ मिठास का, कुछ खटास का, पर फिर भी अति मधुर। बात उस समय की है, जब मैंने आठ या नौ सावन ही देखे होंगे। अल्हड़ उम्र, चिंताओं और मान-अपमान से बेख़बर जि़ंदगी। बस सहेलियों का संग और मस्ती का रंग। सागर में हम परकोटा में रहते थे। घर...
    August 6, 11:30 AM
  • कलम के सिपाही को नमन
    सी के सृजन को देखकर रश्क करना और कहना कि काश, इसे हमने लिखा होता, बड़ा ही आम विचार है। लेकिन ऐसा दो लोगों के लिए नहीं कहता कोई - एक कबीर और दूसरे प्रेमचंद। शब्दों के धनी कई क़लमकार हुए हैं। सच भी है, अल्फाज़ ख़ूबसूरत न हुए, तो जुमलों का मज़ा ही क्या रहा। लेकिन प्रेमचंद का अंदाज़ बिल्कुल जुदा है। भाषा के साथ प्रयोग करते हुए लेखनी को सरल तथा पात्रों के चित्रण को सहज बनाए रखने की उन जैसी दक्षता किसी और लेखक में दिखाई नहीं देती। प्रेमचंद के सृजनसंसार में पात्र दीन-हीन हों, ग़ुरबत से जूझ रहे हों, धनी-मानी हों...
    July 30, 12:00 PM
  • दर दर भटकने से क्या फायदा
    घर-घर जाकर चीज़ें बेचने के काम में अपमान और अन्य ख़तरे तो होते ही हैं, फ़ायदा भी वैसा नहीं होता, जैसे सपने दिखाए जाते हैं। इसलिए ख़ासकर युवतियां बेहद सतर्क रहें या फिर कोई अन्य विकल्प तलाशें। पति को दफ़्तर के लिए विदा कर अमिधा ने मुख्य द्वार बंद किया और गुनगुनाते हुए अन्य कार्यों के लिए रसोई में आई ही थी कि कॉलबेल बज उठी। ज़रूर कुछ भूल गए होंगे...भुलक्कड़ कहीं के... बुदबुदाते हुए उसने जब मुख्य द्वार खोला, तो बाहर खड़ी युवती अभिवादन की मुद्रा में बोल पड़ी, भाभीजी, गुड मॉर्निंग। प्रत्युत्तर में वह सिर...
    July 23, 12:15 AM
  • स्वस्थ हम सुहाना हर मौसम
    गर्मी भी सता रही है अौर बारिश भी आ रही है। रंग बदलते मौसम के रंगों का आनंद तो लें, पर रोगों के ख़तरे को नज़रअंदाज़ भी न करें। जानें कि इस मौसम में स्वस्थ कैसे रहें। मौ सम दिन में कई-कई बार रंग बदल रहा है। कभी तेज़ धूप पड़ती है, कभी अचानक बादल घिर आते हैं, तो कभी थोड़ी-सी बारिश होकर आसमान साफ़ हो जाता है, फिर उमस बढ़ जाती है। एक ही दिन में हम कभी पसीने में भीगते हैं, कभी बरसात में। बुरी बात यह कि ऐसे मौसम में रोगों के संक्रमण का ख़तरा भी अधिक होता है। उससे भी बुरी बात यह कि इस बार मौसम की यह अनियमितता कुछ...
    July 16, 11:37 AM
  • सुबह माने क्या?
    किसी के लिए भोर वेला में पांच बजे ही सुबह हो जाती है, तो किसी के लिए दिन चढ़े दस बजे भी सुबह-सुबह ही होती है। आख़िर सुबह कब तक मानी जाए?इस अंतर के कारण कैसी-कैसी ग़लतफ़हमियां और परेशानियां हो सकती हैं, आप भी जानिए... सुबह-सुबह, यानी मॉर्निंग। अंग्रेज़ी के अर्ली मॉर्निंग के लिए हिंदी में ब्रह्म मुहूर्त या भोर शब्द का प्रयोग होता है, लेकिन आम बोलचाल की भाषा में अक्सर लोग अर्ली मॉर्निंग के लिए सुबह-सुबह का इस्तेमाल करते हैं। जैसे, आज सुबह-सुबह किसी ने डोरबेल बजाकर नींद से जगा दिया या सुबह-सुबह फोन की...
    July 9, 11:07 AM
  • घर जैसे डाॅक्टर
    प्रोजेक्ट पर कुछ वक़्त के लिए न्यूज़ीलैंड गई थी। वहां की आबोहवा रास नहीं आई। अक्सर थकान महसूस होती, जबकि वज़न बढ़ रहा था। पहले तो इसे नई जगह और दिनचर्या का कारण माना, फिर अपनी फैमिली डॉक्टर दिव्या को कॉल किया। उन्होंने तुरंत थायरॉइड टेस्ट कराने को कहा और उनका अंदाज़ा सही निकला। अाकृति अस्थाना, इंदौर नौकरी की ख़ातिर दूसरे शहर में बसना पड़ा। उम्रदराज़ हो चुके माता-पिता की चिंता सताती रहती है। अक्सर फोन पर पापा, मम्मी की ख़राब तबियत का हाल िछपा जाते हैं। मेरी ग़ैरमौजूदगी का फ़ायदा उठाकर मीठा भी खा लेते...
    July 1, 01:11 PM
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