Madhurima
ज्यों ही बस बाएं-दाएं डिगती, वह अपने गोद के बच्चे के साथ उसी तरफ झुककर लगभग गिरने को होती। अभी गांव के स्टैंड से वह बस में चढ़ी थी। उसकी याचक दृष्टि सीट पर बैठे हर यात्री से थोड़ी जगह मांग रही थी। बस का डंडा पकड़े वह कभी सीधे खड़े रहने...
 
उलझन
साहित्य
कैंसर यह शब्द सुनते ही जैसे केकड़े के हज़ार-हज़ार डंक चुभने लगते हैं। ‘मैं ही क्यों ईश्वर’, सवाल मन में और आंसू आंखों में घुमड़ आते हैं। हौसले घुटने टेकने लगते हैं। जीवन में अंधकार छाने लगता है। हर इंसान यही कहता मिलता है, ‘ओह, अभी तो तुमने जिया ही कहां था?’ यही सोच रहे हैं न आप? नहीं! कैंसर शब्द सुनकर हर दिल नहीं कांपता। हर आंख में आंसू नहीं घुमड़ते। ‘मैं ही क्यों’, वाली पुकारें नहीं गूंजती। ‘तुमने अभी जिया ही कहां था’, वाले जुमले भले ही सुनाई दें लेकिन कान इन पर गौर नहीं करते। हौसले चार कोनों से मुड़कर मज़बूती में बंध जाते हैं। दूर ही सही, पर रोशनी की किरण राह दिखाने लगती है। कई ज़िंदगियां हैं, जो जानती हैं, जिन्होंने साबित किया है कि कैंसर से लड़ना सीखो, जीतना आ जाएगा। विश्व कैंसर दिवस पर मधुरिमा सलाम करती है उन हौसलामंदों को, जिन्होंने हारना नहीं सीखा। अपनी...
क्या चाहिए 1 लीटर बिना मलाई वाला दूध, २ चम्मच साइट्रिक एसिड और १ चुटकी बेकिंग पाउडर। चाश्नी के लिए - 750 ग्राम शक्कर, १ चुटकी हाइड्रो पाउडर, १ अरीठे का टुकड़ा और १ चम्मच गुलाब जल। ऐसे बनाएं दूध को शाम के समय गर्म कर रात भर के लिए फ्रिज़ में रख दें। सुबह दूध छानकर मलाई निकाल...
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बात 1976 की गर्मी की छुट्टियों की है। मेरे पतिदेव के पास छुट्टी न होने के कारण मैं अपनी ममिया ननद को उसके माता-पिता के पास छोड़ने के लिए लिंबडी (गुजरात) गई थी। लिंबडी में झांसी से मेरी मौसेरी ननद सपरिवार द्वारिका जा रहे थे, चूंकि मैंने भी द्वारिकाधीश के दर्शन नहीं किए थे, सो उन लोगों के आग्रह पर मैं भी साथ जाने तैयार हो गई।



हम लोग शाम को वहां से पैंसेजर ट्रेन में बैठे, जो सीधे दूसरे दिन द्वारिका पहुंचाती थी। बाकी रिश्तेदारों के पास प्रथम श्रेणी का पास था और मेरे पास दूसरे दर्जे का टिकट, इस कारण मुझे उनसे अलग लेडीÊा डिबे में बैठना पड़ा। गाड़ी छोटे-छोटे स्टेशनों पर रुकती...

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ज़िंदगीनामा

 

काफी समय हो गया था, हम बच्चों को लेकर बाहर नहीं गए थे। इसलिए मेरी बहन और मैंने बच्चों के साथ पिकनिक मनाने के लिए डैम जाने का प्रोग्राम बनाया। उस दिन हल्की-हल्की फुहार पड़ रही थी। हम सभी मौसम का आनंद लेते वहां पहुंचे। मौसम सुहाना था और सभी इधर-उधर टहलकर प्रकृति के सुंदर नज़ारों का आनंद ले रहे थे। कुछ अपनी तैराकी में व्यस्त थे, तो कुछ पेड़ों के नीचे बैठे बातों में खोए थे। ऐसे ही वक्त बीत गया और कब दोपहर के एक बज गए, पता ही नहीं चला। सभी खाने के लिए आ पहुंचे। हम सभी ने अपना-अपना लाया हुआ भोजन चटाई बिछाकर परोसना शुरू किया। खाने की प्लेटें लगाई। मेरी बहन का बेटा बड़ा शैतान था। वो सीढ़ियों की ओर भागा, मैं भी उसके पीछे भागी। उसे पकड़कर मैं सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी, तभी पैर साड़ी में फंस जाने के कारण मैं गिर पड़ी। सीढ़ियों के पास ही एक परिवार अपना भोजन खोलकर बैठा था। मैं उन्हीं के खाने में शामिल रायते के डोंगे में जा गिरी। अब मेरा मुंह रायते के डोंगे में था और पूरे मुंह पर बूंदी लग चुकी थी। कुछ मिनटों तक तो मुझे समझ ही नहीं आया पर जैसे ही मैंने मुंह ऊपर उठाया, सब मेरी...