Madhurima
रघुवीर अपने बीमार बच्चे के लिए फल खरीदने के लिए आया था। फलों के बढ़े हुए दाम सुनकर मन ही मन सोच रहा था, ‘क्या लूं और क्या न लूं? लूं भी कुछ या न लूं? लेना तो पड़ेगा थोड़ा बहुत शंकर के लिए। कितनी महंगाई हो गई है? फलों के दाम भी कहां से कहां...
 
उलझन
साहित्य
महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों में दिनोंदिन इज़ाफा हो रहा है। क्यों? सब कहते हैं कि इनमें कमी आनी चाहिए, पर नहीं आती। क्यों? क्या पीड़ा भी लिंगभेद का शिकार है? स्त्री के हिस्से पीड़ा आती है और बदनामी, राहत नहीं? क्या इसीलिए मजबूर है पीड़ित स्त्री? एक पड़ताल। प्रकरण-1 राजस्थान के एक दूरवर्ती गांव में 8 वर्षीय बालिका के साथ उसी के रिश्ते में लगने वाले मामा ने ज्यादती की। यह कृत्य उसने तब अंजाम दिया, जब वह घर में अकेली थी। बच्ची इस दुराचार को सहन नहीं कर पाई और घटना के तीसरे दिन उसने दम तोड़ दिया। प्रकरण-2 19 साल की युवती गीता की हत्या के आरोप में पुलिस ने उसके सौतेले पिता जय को गिरफ्तार किया है। रिक्शे पर सामान ढोने वाला जय अपनी दूसरी बीवी और सौतेली बेटी गीता के साथ रहता था। गीता की हत्या ने उसकी मां की मानसिक हालत पर गहरा असर डाला है। प्रकरण-3 22 वर्षीय परिधि बलात्कार...
क्या चाहिए100 ग्राम पनीर,2 कटोरी क्रीम, 1 बड़ा चम्मच अदरक व लहसुन पेस्ट, 1 छोटा चम्मच काली मिर्च पाउडर, स्वादानुसार नमक, 1 बड़ा चम्मच रेड चिली फ्लेक्स। ऐसे बनाएं स बसे पहले ताजे पनीर को चौकोर टुकड़ों में काट लें। एक बर्तन में क्रीम, अदरक-लहसुन का पेस्ट, नमक और काली मिर्च...
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‘देह को पूंजी मानना और निवेश योग्य समझना ही गलत था। मानव विधाता की सर्वश्रेष्ठ कृति है। संवेदना, बुद्धि, चेतना सम्पन्न। उसे कैसे आलू-बैंगन की तरह खरीदा बेचा जा सकता है। देह माध्यम है उसे पूंजी कैसे माना जा सकता है। देह सम्पदा प्रतिदिन घटती है और एक दिन पूर्णत: नष्ट।’ प्रिय उर्वशी! मैं तुम्हारी मां से लड़ने के मूड में उन्हें पत्र लिखना चाह रही थी कि तुम तड़प कर बोल उठीं-‘सम्भावना! सारी ज़िंदगी तो मैं मां की आज्ञाकारिणी बन जीती रही, उनका कहा मानती रही, मेरी ज़िंदगी अपनी कहां रही। तुम मेरी तरफ से मां से लड़ो, उन सब मांओं से जिन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा में बच्चों का बचपन खा...
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ज़िंदगीनामा

 

दस साल पहले की बात है। शाम को किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी थी। मैंने खोला, तो सामने सिद्धांत को खड़ा पाया। हाथ में कुछ खाने का सामान लिए खड़ा था। मुझे लगभग धकियाते हुए अंदर आया और बोला- मुझसे शादी करोगी? पल-भर को सबकुछ ठहर गया। पचास साल की मैं और बावन साल का सिद्धांत। लम्हे उल्टे दौड़ने लगे। मेरे पति नलिन, उनके साथ बिताए शादी-शुदा ज़िंदगी के तीस साल, उनका मेरा हर तरह से ख्याल रखना, बस एक बात की ज़िद कि हर पाई का हिसाब होना चाहिए (जो मुझे काफी चिढ़ा भी देता था), मेरे बिना किसी टूर पर भी न जाना, मेरे लिए हर अवसर पर ढेर सारे तोहफे लाना, खुशियों के कई-कई पल.. ज़िंदगी दौड़ती-दौड़ती रुकी, तो उस लम्हे पर, जब नलिन एक छोटी-सी चिट्ठी रखकर बाहर गए थे कि जल्दी आ जाऊंगा, पर नहीं लौटे। क्यों नहीं, मैं नहीं जान सकी, सिर्फ उनके न रहने की खबर आई थी। फिर सबकुछ रुक गया। यूं ही दिन कटने लगे, बेमकसद जीवन। उसी दौरान मेरी दोस्त दीपा की अचानक मौत हो गई। उसके घर भी बड़े लम्बे अरसे के बाद उसी दिन गई थी। सिद्धांत, दीपा के पति को टूटा हुआ देखा, तो अपने दर्द को बंटता हुआ पाया। वह पहले भी •यादा नहीं बोलता...