



बात 1976 की गर्मी की छुट्टियों की है। मेरे पतिदेव के पास छुट्टी न होने के कारण मैं अपनी ममिया ननद को उसके माता-पिता के पास छोड़ने के लिए लिंबडी (गुजरात) गई थी। लिंबडी में झांसी से मेरी मौसेरी ननद सपरिवार द्वारिका जा रहे थे, चूंकि मैंने भी द्वारिकाधीश के दर्शन नहीं किए थे, सो उन लोगों के आग्रह पर मैं भी साथ जाने तैयार हो गई।
हम लोग शाम को वहां से पैंसेजर ट्रेन में बैठे, जो सीधे दूसरे दिन द्वारिका पहुंचाती थी। बाकी रिश्तेदारों के पास प्रथम श्रेणी का पास था और मेरे पास दूसरे दर्जे का टिकट, इस कारण मुझे उनसे अलग लेडीÊा डिबे में बैठना पड़ा। गाड़ी छोटे-छोटे स्टेशनों पर रुकती...