दस साल पहले की बात है। शाम को किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी थी। मैंने खोला, तो सामने सिद्धांत को खड़ा पाया। हाथ में कुछ खाने का सामान लिए खड़ा था। मुझे लगभग धकियाते हुए अंदर आया और बोला- मुझसे शादी करोगी?
पल-भर को सबकुछ ठहर गया। पचास साल की मैं और बावन साल का सिद्धांत। लम्हे उल्टे दौड़ने लगे। मेरे पति नलिन, उनके साथ बिताए शादी-शुदा ज़िंदगी के तीस साल, उनका मेरा हर तरह से ख्याल रखना, बस एक बात की ज़िद कि हर पाई का हिसाब होना चाहिए (जो मुझे काफी चिढ़ा भी देता था), मेरे बिना किसी टूर पर भी न जाना, मेरे लिए हर अवसर पर ढेर सारे तोहफे लाना, खुशियों के कई-कई पल.. ज़िंदगी दौड़ती-दौड़ती रुकी, तो उस लम्हे पर, जब नलिन एक छोटी-सी चिट्ठी रखकर बाहर गए थे कि जल्दी आ जाऊंगा, पर नहीं लौटे। क्यों नहीं, मैं नहीं जान सकी, सिर्फ उनके न रहने की खबर आई थी।
फिर सबकुछ रुक गया। यूं ही दिन कटने लगे, बेमकसद जीवन। उसी दौरान मेरी दोस्त दीपा की अचानक मौत हो गई। उसके घर भी बड़े लम्बे अरसे के बाद उसी दिन गई थी। सिद्धांत, दीपा के पति को टूटा हुआ देखा, तो अपने दर्द को बंटता हुआ पाया। वह पहले भी •यादा नहीं बोलता...