मधुरिमा
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  • मैं जरा ऊंचा बोलती थी...!
    ...एक दिन बड़े बेटे की आवाज़ में इसकी गूंज सुनी अक्सर अभिभावक बच्चों में अपने ही बर्ताव की छवि देखते हैं। यदि यह छवि नकारात्मक दिखे, तो ख़ुद में बदलाव लाने की शुरुआत कर दीजिए। तीन वर्षीय बेटे की मां अनीता की शिकायत थी कि उनका बेटा उनकी कोई बात नहीं सुनता और यदि वे उसे कुछ करने से रोकें, तो वह बदतमीज़ कहकर चिल्ला दिया करता है। मैंने उनसे पूछा कि बच्चे पर ग़ुस्सा करते वक़्त वे क्या कहती हैं? एक पल में उनका जवाब हाज़िर था, जो वही विशेषण था जिसका प्रयोग बच्चा कर रहा था। आश्चर्य की बात थी कि वे अब भी बेख़बर थीं।...
    July 29, 12:00 AM
  • सच हो जाए तो...
    कोई है, जो कहे को सुनता है। कोई है, जिसे सुनाने के लिए कहा जाता है। हम तो ग़रीब आदमी हैं, बर्तन धोकर गुज़ारा कर लेंगे... परिस्थितियों के हाथों निराश हुए लोगों से अक्सर ऐसा सुना होगा आपने भी। अगर बड़े वहां मौजूद होते, तो तुरंत टोक देते कि बुरी बात नहीं कहते। बड़े-बुज़ुर्ग ऐसा क्यूं कहते हैं? कहने से क्या कोई ग़रीब हो जाता है? ग़रीब नहीं हो जाता, लेकिन अपनी सोच को ज़रूर ज़ाहिर कर देता है कि वह हालात के बुरे हो जाने के बारे में कितना ज़्यादा सोचता है। हम वही तो कहते हैं न, जो हम चाहते हैं। स्वप्रबंधन विशेषज्ञ और...
    July 29, 12:00 AM
  • सेल भारी या आपकी समझदारी ?
    आप अक्सर सेल के चक्कर में जरूरत से ज्यादा शॉपिंग कर बैठती हैं, तो इस आलेख पर गौर फरमाएं... मौसम के बदलने का वक़्त हो या किसी उत्सव की शुरुआत, शॉपिंग स्टोर्स और मॉल्स में सेल की बहार छा जाती है। अच्छे ऑफर्स का प्रलोभन अपना जादू चलाता है और हम ज़रूरत न होने पर भी न जाने कितनी चीज़ें ख़रीद लेते हैं। ऐसे मौक़ों पर थोड़ी समझदारी से काम लेंगी, तो बेवजह पैसे ख़र्च नहीं होंगे... सिर्फ-3 का नियम अतिरिक्त खरीदारी से ख़ुद को बचाने के लिए सिर्फ़-3 का नियम अपनाएं। शॉपिंग के लिए जाने से पहले ही यह सोच लें कि किसी भी हालत...
    July 29, 12:00 AM
  • मुमकिन है सब फुर्तीले हो!
    किसी भी शारीरिक गतिविधि को सिर्फ एक महीने के लिए अपनी आदत बना लें। इससे मिली चुस्ती और सेहत लाभ आपको ख़ुद-ब-ख़ुद यह अंतराल बढ़ाने के लिए प्रेरित करेंगे। खुद को टटोलिए, क्या दिनभर में आप 30 मिनट की शारीरिक तौर पर पूरी तरह सक्रिय रहने वाली कोई गतिविधि करते हैं? ऐसे मौक़ों पर अधिकांश महिलाओं का जवाब होता है कि दिनभर घर के काम करने के दौरान हम सक्रिय ही रहते हैं। लेकिन यहां बात मामूली हिलने-डुलने की नहीं, बल्कि पूरी चुस्ती-फुर्ती वाली नियमबद्ध गतिविधि में शामिल होने की हो रही है। अब घर पर चार-चार क़दम...
    July 22, 12:00 AM
  • लड़ेंगे-जिएंगे साथ-साथ!
    मतभेद, बहस की सीढ़ी बनते हैं और बहस लड़ाई में बदल जाती है। बहस तो एक कला है, फिर रिश्ते को तोड़ने का ज़रिया क्यों बने! कुछ दिनों पहले हुए एक शोध ने बेहद सकारात्मक तथ्य पर रोशनी डाली। इसके अनुसार, पति-पत्नी के सम्बंधों में प्यार बनाए रखने और मतभेदों को कम करने के लिए 5:1 का अनुपात ध्यान में रखना चाहिए। यहां 5 रिश्ते को बचाने के लिए व उसमें मिठास बनाए रखने के लिए किए गए प्रयासों को दर्शाता है, वहीं 1 मतभेद, अनबन और दुखों को दर्शाता है। यानी एक बार आप दोनों के बीत मतभेद हो जाए, तो संतुलन बनाए रखने के लिए पांच...
    July 15, 12:00 AM
  • Its an testing page. Its an updated testing page. Its a vuukle testing WhatsApp Post: पप्पू को बीड़ी पीने की लत लग गई और अब हैं ये हाल ! 20 साल की अनिता को रविवार को एक छापेमारी के दौरान हिरासत में लिया गया, लेकिन उसके द्वारा नॉर्मल जिंदगी जीने की इच्छा जताए जाने के बाद पुलिस ने
    July 14, 03:07 PM
  • कर लीजिए नौकरी छोड़ने की तैयारी
    हर नौकरीपेशा महिला जानती है कि आकस्मिक स्थिति, पारिवारिक जि़म्मेदारी या बदली हुई परिस्थिति के चलते उसे नौकरी से विराम लेना पड़ सकता है। लेकिन वह इस बदलाव के लिए तैयार नहीं रहती। तैयारी पूरी होगी, तो बिना नौकरी के भी जीवन सहज गति से चलेगा और भविष्य में दूसरी नौकरी आसानी से मिल सकेगी। परिवर्तन अटल सत्य है। यह दार्शनिक बात भर नहीं है। हर नारी इस बात को अच्छी तरह समझती और महसूस करती है, ख़ासकर भारतीय नारी। पढ़ाई, कॅरिअर, विवाह, मातृत्व, परवरिश जैसे पड़ावों पर उसके जीवन में बड़े बदलाव होते हैं। हर...
    July 8, 12:00 AM
  • फरिश्ते के भीतर इंसान
    आज डॉक्टर्स डे है... हम जीवन देने वाले भगवान के बाद जीवन बचाने वाले डॉक्टर को रखते हैं। फिर हैरान भी होते हैं कि रोग, पीड़ा, आंसू, ख़ून, भय और मौत के बीच वे कैसे अपना काम कर पाते हैं! डॉक्टर्स डे के मौके पर ख़ुद उन्होंने हमें बताया कि जब वे किसी पीड़ित के लिए फ़रिश्ते की भूमिका निभा रहे होते हैं, तो उनके भीतर का इंसान क्या सोच रहा होता है... मैं इंसान हूं, पहले डॉक्टर हूं... डॉ. मीनाक्षी पटवा, स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टरों से अक्सर यह सवाल पूछा जाता है कि वे कैसे इतने सख़्त और भावहीन हो सकते हैं। पहले...
    July 1, 12:00 AM
  • आंखों के नूर जब घर से हों दूर...
    बच्चे उच्च शिक्षा के लिए घर से दूर जाएं, उस दौरान और उससे पहले उन्हें व्यावहारिक शिक्षा देना आवश्यक है, ताकि वे बाहरी दुनिया में रहने के क़ाबिल और बेहतर इंसान बन सकें। जिंदगी में कितनी ही बार वक़्त अपनी तेज़ रफ़्तार का अहसास करा जाता है। जैसे, बच्चे के कॉलेज में दाख़िले का समय आने पर अधिकांश अभिभावक सोचते हैं- मानो कल ही की बात है, जब हम तुम्हें पहली बार स्कूल छोड़ने आए थे। उस वक़्त हम जितने उत्साहित थे, उतना ही मन घबरा भी रहा था कि कैसे अनजान माहौल और लोगों के बीच तुम रमोगे। ऐसी ही चिंता बच्चों को उच्च...
    June 24, 12:00 AM
  • पापा के दिल से...
    तुम्हें नहीं लगता, तुमने ग़लत किया है? पत्नी मुझसे कहती है। मन से जानता हूं कि शायद आज ग़लत कर दिया है, फिर भी मुंह से कुछ नहीं बोलता। मैं उसे छोड़ने आया हूं। वो कार पूल कर कॉलेज जाती है। मन अजीब-सा हो उठा है। उसकी कार आज इतनी देर क्यों लगा रही है आने में! ख़ामोशी चुभ रही है आज, कुछ लम्हे ऐसी ही चुभन में गुज़रते हैं। उसकी कार आ गई है। गाड़ी का दरवाज़ा खोलकर वह मुझे देखती है। उसके साथ थोड़ा वक़्त बिताना। वो कहती है। मैं सिर हिलाता हूं। घर पहुंचता हूं। ऊपर सीढ़ियां चढ़कर जाता हूं, इधर-उधर कमरों में झांकता हूं।...
    June 17, 12:00 AM
  • अकबर हार गया फिर हम किस खेत की मूली है!
    बाजार में बिकने वाली पानी की बोतल का हम किफायत से इस्तेमाल करते हैं। मोल ज़्यादा चुकाया इसलिए? जल अपव्यय पर जाने-माने पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र का यह लेख हकीकत के छींटे मारकर जगाने के लिए है। इस वजह से अकबर बादशाह को बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा, हमारे शहर-कस्बे भी उसी से जूझ रहे हैं। अकबर को तो दूसरा ठिकाना मिल गया था, पर हम कहां भागेंगे...? मेरी कॉलोनी में दिन में दो वक़्त पानी आता ही है। इसका शुल्क थोड़ा-बहुत बढ़ भी जाए, तो मुझे कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला। नदी-तालाब सूख जाएं, नल न आए, तो बोर तो है...
    June 10, 12:00 AM
  • आत्मा पर बोझ तो नहीं?
    एक कचरे का थैला हम रोज़ बाहर फेंकते हैं। धरती का वो बोझ, हमें क्यों उद्वेलित-विचलित नहीं कर पा रहा? आपने लोगों को पौधों पर थूकते देखा होगा। ये लोग अपने घर में ऐसा करते होंगे? कोई थूककर उस स्थान को नहीं देखता। उसे मतलब ही क्या है उस ज़मीन से, जिसे उसे साफ़ नहीं करना है। लेकिन यदि बस में बैठे किसी यात्री का थूक इन महाशय पर आ पड़े, तो मरने-मारने पर उतारू हो जाएंगे। क्यों भई, आप साफ़, धरती गंदी? धरती पलटकर वार कर सकती, तो रोज़ कितने ही पिटते! दूसरी बात, सड़क पर कहीं भी थूक देने वालों के घर के फर्श क्या सड़क जैसे...
    June 3, 12:00 AM
  • छुपकर वार करता है आहार
    भोजन सही था,तो क्या गलत था? व्यापारी श्यामलाल जी का वज़न 105 किलो था। वे सांस लेने में परेशानी महसूस कर रहे थे। इसी वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती भी कराया गया। रक्तचाप बढ़ा हुआ था और पीठ में लगातार दर्द की समस्या थी। उनकी जीवनशैली का अवलोकन करने पर पता चला कि उनका काम सारा दिन बैठे रहने का है। सो पीठ दर्द की जड़ समझ में आ गई। लेकिन बढ़ता वज़न अब भी सवालों के घेरे में था। बहुत हद तक साफ़ था कि समस्या खानपान से ही जुड़ी है, क्योंकि उनकी पत्नी व दो बच्चों का वज़न भी काफ़ी ज्य़ादा था। श्यामलाल जी की आहार तालिका...
    May 27, 12:00 AM
  • नाम गया तो क्या बचा?
    नाम में ही पहचान है, सम्मान है और शान है। नाम ही सबकुछ है। फिर भी अपने और दूसरों के नामों की इतनी उपेक्षा! प्राचीन मिस्रवासियों की मान्यता थी कि परछाईं की तरह नाम भी व्यक्ति का जीवंत हिस्सा होता है। भारतीय मनीषियों के अनुसार व्यक्ति का नाम उसके रोम-रोम में रच-बस जाता है। सारी पहचान ही नाम से होती है। नाम से पुकारे जाने पर मन गद्गद हो उठता है, क्योंकि नाम में आत्मीयभाव होता है। व्यक्ति का नाम ही युगों तक जीवित रहता है। यशस्वी भी वह नाम से होता है, विशिष्ट भी बनता है। कोई आश्चर्य नहीं कि भाषा के...
    May 20, 12:00 AM
  • शॉपिंग का नया ज्ञान
    खर्च तो मानो सांस लेने जैसी रवायत बन गए हैं।बाजार का आकर्षण तो है ही और उंगलियों के निर्देश भी बड़े व्यय करा देते हैं। ऐसे में बचत के लिए शोध तो करने ही थे। देखें, नतीजे क्या बताते हैं... मॉल्स हैं, हर हफ़्ते वहां की सैर है, और शॉपिंग स्टोर्स पर आता नित नूतन निखार है। ग्राहक कब तक और कैसे बचें? अध्ययनों ने बताया है कैसे... सजावट सराहने के लिए है सुपर मार्केट और मॉल्स में सबसे आगे आकर्षक रंगों वाली चीज़ें रखी जाती हैं। इसके पीछे मॉल को संवारने के साथ-साथ ग्राहकों को लुभाने का मनोविज्ञान छिपा हुआ...
    May 13, 12:00 AM
  • मां को मिले नई सोच
    बाल मन से सीखकर मां का जीवन भी ज़्यादा सरल, सहज और सुखमय होता जाता है। सच ही कहते हैं कि मां के रूप में स्त्री का एक नया मां मनुष्यता गढ़ती है। लेकिन बच्चे भी मां के जीवन में अकेले नहीं आते। उनका आना साथ लाता है चेतना और नए विचार। नन्हे क़दमों के साथ चलते हुए खुलती हैं समझ की नई खिड़कियां। वे फिर रूबरू करवाते हैं ज़िंदगी से। ले जाते हैं प्रकृति की ओर। परिचय करवाते हैं इंद्रधनुष की सतरंगी छटा से। हर बात ऐसी, जैसे अपने ही बचपन से फिर मिलना हुआ हो। बचपन, जो निश्छल होता है, निर्बाध बहता है। कुछ ऐसे ही...
    May 6, 12:00 AM
  • संगीत साधे सब सधै
    एकै साधे सब सधै... कविवर रहीम की यह उक्ति संगीत के संदर्भ में सटीक है। संगीत-साधना का असर जीवन के हर पहलू पर पड़ता है और व्यक्तित्व काे पूरी तरह बदल देता है। कहा जा रहा है? अपने निजी अनुभवों से हम सब जानते हैं कि संगीत सुकून पहुंचाता है, प्रेरणा देता है, उत्साह बढ़ाता है, तनाव घटाता है, ग़म भुलाता है, दिल में प्रेम जगाता है और न जाने क्या-क्या असर करता है। और ये सब होता है, सुनने भर से! सोचिए, हम संगीत सीखें, उससे सीधे जुड़ें, उसकी साधना करें, तो कैसे चमत्कार हो सकते हैं! जब मैं संगीत कहती हूं, तो मैं गायन...
    April 29, 12:00 AM
  • साझा सब है, सब होगा भी!
    22 अप्रैल, पृथ्वी दिवस इस धरा के सुख बांटे हैं हमने। और जो अब सोच रहे हों कि अपने हिस्से कम आया, तो मोल लगाने पर हासिल हो सकेगा, सो भूल होगी। सबकुछ सबका रहा है। जो अब भी न जागे, तो दुख भी साझे ही होंगे। बेमौसम बारिश और ओलों से हुई बर्बादी पर एक टीवी रिपोर्ट में कहा गया - किसान की इस मौसम की फ़सल बर्बाद हो गई। इस वाक्य में कुछ ग़लत या अटपटा नहीं है। हम आदी हैं, ऐसी बातें सुनने-कहने के। इसी से साबित हो जाता है कि हम अपनी धरा से, उसके दर्द से कितनी दूरी बना चुके हैं। ध्यान दीजिएगा जनाब, किसान महीने-भर किसी...
    April 22, 12:00 AM
  • उल्टी सोच का सैलाब
    फेसबुक एक ऐसी दुनिया है, जिसे मेलजोल बढ़ाने और लोगों को सामाजिक बनाने के लिए रचा गया था। लेकिन अपने फेसबुक अकाउंट में एक बार झांककर देखें कि आज कितने लोगों ने सकारात्मक पोस्ट डाली हैं या ख़ुद आपने कितनी सकारात्मक पोस्ट लाइक या शेयर की हैं? यहां तो नकारात्मकता और उल्टी सोच का सैलाब आया हुआ है। इस आभासी दुनिया को भी हम अपनी असली दुनिया जैसा ही बना रहे है। या नक़ली चेहरों से भरी यह आभासी दुनिया हमें असल ज़िंदगी में नकारात्मक बना रही है? शोध ने कियासोचने पर मजबूर सोशल वेबसाइट्स से लोगों के रवैये...
    April 15, 12:00 AM
  • सांसत में सांस
    अगर सुनें कि किसी को अस्थमा हो गया है, यानी दमे का रोग, तो अमूमन ऐसी प्रतिक्रिया होती है, मानो जान पर घात आ पड़ी हो! हां, यह मुश्किल हालात की ओर इशारा करता है, लेकिन इसे सम्भाला जा सकता है। दमा है क्या? इसे समझने के लिए फेफड़ों की बनावट को समझना होगा। हम पेड़ को उल्टा खड़ा करने की कल्पना करें, यानी जड़ें ऊपर की ओर। अब पेड़ के तने को सांस की वह मुख्य नली, यानी विंड पाइप मानें जो गले से उतरकर फेफड़ों तक जाती है। यह मोटे कार्टिलेज की बनी होती है, सो सिकुड़ती नहीं। इस तने से जुड़ी हैं पेड़ की छोटी-बड़ी शाखाएं। ये हैं...
    April 8, 12:00 AM
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