मधुरिमा
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  • नाम गया तो क्या बचा?
    नाम में ही पहचान है, सम्मान है और शान है। नाम ही सबकुछ है। फिर भी अपने और दूसरों के नामों की इतनी उपेक्षा! प्राचीन मिस्रवासियों की मान्यता थी कि परछाईं की तरह नाम भी व्यक्ति का जीवंत हिस्सा होता है। भारतीय मनीषियों के अनुसार व्यक्ति का नाम उसके रोम-रोम में रच-बस जाता है। सारी पहचान ही नाम से होती है। नाम से पुकारे जाने पर मन गद्गद हो उठता है, क्योंकि नाम में आत्मीयभाव होता है। व्यक्ति का नाम ही युगों तक जीवित रहता है। यशस्वी भी वह नाम से होता है, विशिष्ट भी बनता है। कोई आश्चर्य नहीं कि भाषा के...
    May 20, 12:00 AM
  • शॉपिंग का नया ज्ञान
    खर्च तो मानो सांस लेने जैसी रवायत बन गए हैं।बाजार का आकर्षण तो है ही और उंगलियों के निर्देश भी बड़े व्यय करा देते हैं। ऐसे में बचत के लिए शोध तो करने ही थे। देखें, नतीजे क्या बताते हैं... मॉल्स हैं, हर हफ़्ते वहां की सैर है, और शॉपिंग स्टोर्स पर आता नित नूतन निखार है। ग्राहक कब तक और कैसे बचें? अध्ययनों ने बताया है कैसे... सजावट सराहने के लिए है सुपर मार्केट और मॉल्स में सबसे आगे आकर्षक रंगों वाली चीज़ें रखी जाती हैं। इसके पीछे मॉल को संवारने के साथ-साथ ग्राहकों को लुभाने का मनोविज्ञान छिपा हुआ...
    May 13, 12:00 AM
  • मां को मिले नई सोच
    बाल मन से सीखकर मां का जीवन भी ज़्यादा सरल, सहज और सुखमय होता जाता है। सच ही कहते हैं कि मां के रूप में स्त्री का एक नया मां मनुष्यता गढ़ती है। लेकिन बच्चे भी मां के जीवन में अकेले नहीं आते। उनका आना साथ लाता है चेतना और नए विचार। नन्हे क़दमों के साथ चलते हुए खुलती हैं समझ की नई खिड़कियां। वे फिर रूबरू करवाते हैं ज़िंदगी से। ले जाते हैं प्रकृति की ओर। परिचय करवाते हैं इंद्रधनुष की सतरंगी छटा से। हर बात ऐसी, जैसे अपने ही बचपन से फिर मिलना हुआ हो। बचपन, जो निश्छल होता है, निर्बाध बहता है। कुछ ऐसे ही...
    May 6, 12:00 AM
  • संगीत साधे सब सधै
    एकै साधे सब सधै... कविवर रहीम की यह उक्ति संगीत के संदर्भ में सटीक है। संगीत-साधना का असर जीवन के हर पहलू पर पड़ता है और व्यक्तित्व काे पूरी तरह बदल देता है। कहा जा रहा है? अपने निजी अनुभवों से हम सब जानते हैं कि संगीत सुकून पहुंचाता है, प्रेरणा देता है, उत्साह बढ़ाता है, तनाव घटाता है, ग़म भुलाता है, दिल में प्रेम जगाता है और न जाने क्या-क्या असर करता है। और ये सब होता है, सुनने भर से! सोचिए, हम संगीत सीखें, उससे सीधे जुड़ें, उसकी साधना करें, तो कैसे चमत्कार हो सकते हैं! जब मैं संगीत कहती हूं, तो मैं गायन...
    April 29, 12:00 AM
  • साझा सब है, सब होगा भी!
    22 अप्रैल, पृथ्वी दिवस इस धरा के सुख बांटे हैं हमने। और जो अब सोच रहे हों कि अपने हिस्से कम आया, तो मोल लगाने पर हासिल हो सकेगा, सो भूल होगी। सबकुछ सबका रहा है। जो अब भी न जागे, तो दुख भी साझे ही होंगे। बेमौसम बारिश और ओलों से हुई बर्बादी पर एक टीवी रिपोर्ट में कहा गया - किसान की इस मौसम की फ़सल बर्बाद हो गई। इस वाक्य में कुछ ग़लत या अटपटा नहीं है। हम आदी हैं, ऐसी बातें सुनने-कहने के। इसी से साबित हो जाता है कि हम अपनी धरा से, उसके दर्द से कितनी दूरी बना चुके हैं। ध्यान दीजिएगा जनाब, किसान महीने-भर किसी...
    April 22, 12:00 AM
  • उल्टी सोच का सैलाब
    फेसबुक एक ऐसी दुनिया है, जिसे मेलजोल बढ़ाने और लोगों को सामाजिक बनाने के लिए रचा गया था। लेकिन अपने फेसबुक अकाउंट में एक बार झांककर देखें कि आज कितने लोगों ने सकारात्मक पोस्ट डाली हैं या ख़ुद आपने कितनी सकारात्मक पोस्ट लाइक या शेयर की हैं? यहां तो नकारात्मकता और उल्टी सोच का सैलाब आया हुआ है। इस आभासी दुनिया को भी हम अपनी असली दुनिया जैसा ही बना रहे है। या नक़ली चेहरों से भरी यह आभासी दुनिया हमें असल ज़िंदगी में नकारात्मक बना रही है? शोध ने कियासोचने पर मजबूर सोशल वेबसाइट्स से लोगों के रवैये...
    April 15, 12:00 AM
  • सांसत में सांस
    अगर सुनें कि किसी को अस्थमा हो गया है, यानी दमे का रोग, तो अमूमन ऐसी प्रतिक्रिया होती है, मानो जान पर घात आ पड़ी हो! हां, यह मुश्किल हालात की ओर इशारा करता है, लेकिन इसे सम्भाला जा सकता है। दमा है क्या? इसे समझने के लिए फेफड़ों की बनावट को समझना होगा। हम पेड़ को उल्टा खड़ा करने की कल्पना करें, यानी जड़ें ऊपर की ओर। अब पेड़ के तने को सांस की वह मुख्य नली, यानी विंड पाइप मानें जो गले से उतरकर फेफड़ों तक जाती है। यह मोटे कार्टिलेज की बनी होती है, सो सिकुड़ती नहीं। इस तने से जुड़ी हैं पेड़ की छोटी-बड़ी शाखाएं। ये हैं...
    April 8, 12:00 AM
  • चिड़चिड़ेपन के फायदे
    हमेशा सुना है कि मीठी ज़बान से दिल जीते जाते हैं, मगर इसमें क्या कमाल! असली आज़माइश तो यह है कि तल्ख़ मिज़ाजी के बावजूद महबूब आपको चाहे। एक बदमिज़ाज आदमी को सात ख़ून माफ़ होते हैं, क्योंकि इस बेचारी (ख़ूबी) में बर्दाश्त का माद्दा बिल्कुल नहीं होता है। चिड़चिड़ेपन के फ़ायदों के बारे में तफ़्सील से जानिए। हमको बचपन से तालीम मिली थी कि ख़ुशमिज़ाजी औरत का सबसे बड़ा गुण है। लेकिन जनाब तजुर्बे और मुशाहिदे ने हमें कुछ और ही सबक़ सिखाया। और वह था चिड़चिड़ेपन का फ़ायदा, यानी वह सब जो हम इतने साल की ख़ुशमिज़ाजी से न हासिल कर...
    April 1, 12:00 AM
  • हर हाथ जल्लाद
    न कोई सुनवाई, न सुबूत, न गवाह, न सफ़ाई का मौक़ा। लात-घूंसे, पत्थर, डंडे से बर्बर पिटाई और मौत! क्या ऐसे समाज की कल्पना की थी हमने? अब तो कोई भी सुरक्षित नहीं लगता। दीमापुर में 5 मार्च को जो कुछ हुआ, उसकी तकलीफ़ अब भी पूरा हिंदुस्तान महसूस कर रहा है... पर क्या यह घटना सिर्फ़ अफ़सोस जताने या सिस्टम को कोसनेभर की है? बीच सड़क दस हज़ार की भीड़ का तालिबानी इंसाफ़ यह साबित करता है कि तमाम बातों के बावजूद हम अपने उस सिस्टम को रत्ती भर भी आगे नहीं खिसका पाए हैं, जिसे हर ऐसी वारदात के बाद बिल्कुल बदल देने की बात...
    March 25, 12:00 AM
  • खुशी की एक मकाम यह भी
    काम करने को लेकर अलग-अलग सोच हैं हमारे समाज में। जी हां, अब भी हैं।एक का पक्ष सुन लीजिए, शायद कुछ तस्वीर साफ़ हो! बहुत बार मुझसे ये सवाल पूछे गए हैं- तुम्हें नौकरी करने की क्या ज़रूरत है? पति नौकरी कर तो रहे हैं, कोई कमी रह जाती है क्या? कोई इल्ज़ाम लगाने वाले लहज़े में कहता है- ख़ूब हाथ खुला होगा तुम्हारा, तभी तो एक की कमाई कम पड़ती है। लेकिन ज़्यादातर की राय यही होती है- घर में रहना पसंद नहीं है, इसलिए काम करती हैं आज की औरतें। घर से िनकल जाएं, तो बस आज़ाद। फिर क्या फ़िक़्र घर की, रिश्तों की! बस, अपने कमाओ, और उड़ाओ।...
    March 18, 12:00 AM
  • बड़े बढ़ाएं तो छोटू संवरे
    बड़ों के अनुभवों की छांव नन्ही कोपलों को न सिर्फ़ ज़िंदगी की कड़ी घूप से बचाती है, बल्कि स्नेहसिक्त विकास देती है। बुजुर्गों से दूरी, बच्चों के हित में कहां...? बुजुर्ग अक्सर कहते सुने जाते हैं कि मूल से ज़्यादा प्यारा सूद होता है। सूद (ब्याज) से यहां आशय नाती-पोतों से है। शायद ही कोई व्यक्ति हो, जो अपने बच्चों के बच्चों के साथ ज़्यादा से ज़्यादा समय न बिताना चाहता हो। कई वृद्धों की तो सारी ख़ुशियां पोते-पोतियों के इर्द-गिर्द होती हैं और वे जीते भी उन्हीं के लिए हैं। एक छत के नीचे तीन पीढ़ियों का साथ...
    March 11, 12:00 AM
  • इक डाल के पात सब
    अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का अवसर है। कम होना, कम मानने पर निर्भर है। कम समझा जाना पहले ख़ुद के दिमाग़ में उपजता है और फिर दूसरे की सोच में शामिल होता है। क़ुदरत में ऐसा फ़र्क़ कहीं नहीं है। अब हमारे बीच, यहां भी न हो! कोई पात यह मानेगा कि वो कम हरा है, वो भी महज़ इसलिए कि दूसरी डाल का एक अन्य पत्ता ऐसा मानता है? पेड़ का इससे कोई ताल्लुक़ नहीं। यह पत्तों की निजी राय है। पेड़ के लिए दोनों समान हैं। समान हैं भी। आज क़ुदरत के अपने हिस्से पर इक समदृष्टि डालकर भी देखते हैं। आइए, एक बच्ची से मिलते हैं। रानी...
    March 4, 12:00 AM
  • क्रिकेट धर्म है
    आपने इससे क्या सीखा है? भारत में यह पूछना बेमानी है कि आपके लिए क्रिकेट की क्या अहमियत है। जो खिलाड़ी नहीं है, वह दर्शक और स्वघोषित विशेषज्ञ तो है ही। आपने क्रिकेट खेला, देखा, मैचों का विश्लेषण किया... क्या क्रिकेट से कुछ सीखा भी? भारत में भले ही कोई क्रिकेट खेले, न खेले, पर देख ज़रूर लेता है। देश में यूं तो महिलाएं क्रिकेट में कम ही रुचि रखती हैं, परंतु भारत और पाकिस्तान के मुकाबलों का रोमांच ऐसा होता है कि वे भी टीवी के सामने बैठ ही जाती हैं। लोग सच ही कहते हैं कि भारत में क्रिकेट भी एक धर्म है।...
    February 25, 12:00 AM
  • सर्वेश्वर शिव
    शिव सबके प्रिय हैं और सब शिव के प्रिय हैं। दसों दिशाओं में वे एक समान पूजनीय हैं। वे महादेव हैं। जानिए, इस अद्भुत आकर्षण का रहस्य। आदि शंकराचार्य रचित निर्वाण षट्कम कहता है- शिवोऽहम्। अर्थात मैं स्वयं शिव हूं। मैं भी शिव की बात स्वयं से शुरू करता हूं। मुझे लगता है कि मैं भगवान शिव की तरफ़ आकर्षित हुआ, क्योंकि मैं भी उनकी तरह विद्रोही और ओढ़ी गई अभिजातता का विरोधी हूं। शिव की सहजता मुझे आकर्षित करती है। लेकिन, राजा-महाराजा, चक्रवर्ती सम्राट भी शिव के अनन्य भक्त रहे हैं। एक तरफ़, निर्धन, दीन-हीन,...
    February 18, 12:00 AM
  • अपेक्षा प्रेम की उपेक्षा
    हमने प्यार या विवाह किया। एक व्यक्ति के इर्दगिर्द अपने सपनों का संसार बुन लिया। उस शख़्स से दुनियाभर की उम्मीदें भी जोड़ लीं। और फिर दिक़्क़त शुरू हो गई! प्यार और विवाह सबसे ज़्यादा किस कारण से दरकते हैं? प्रेम दिवस के ठीक पहले यह सवाल बड़ा अजीब लगेगा, लेकिन शायद इसी में प्यार और रिश्ते को पुख़्ता बनाने का रहस्य भी छुपा है। जवाब आसान है : उम्मीदें पूरी न होने के कारण। लेकिन फिर यहां सवाल उठता है कि सारी उम्मीदें तो शायद अन्य रिश्तों से भी पूरी नहीं होतीं। परंतु, उम्मीदें पूरी न होने का कारण...
    February 11, 12:00 AM
  • सुहाना सफर
    नवजीवन में नए हमसफर के साथ पहला सफर सुरक्षित होगा,तब ही सुखद भी हो पाएगा। इस मामले में मेरे अनुभवशायद आपके लिए भी मददगार हों। जीवन के नए सफर की शुरुआत थी। सफर नया था, पर हमसफ़र पुराना। वही, सात जन्मों का साथी! हा-हा-हा। हम अपने हनीमून के लिए जा रहे थे और स्वाभाविक है कि हम दोनों ही जा रहे थे। प्रेम, लगाव, रोमांच, उत्साह, उत्सुकता जैसी भावनाएं मन में उमड़-घुमड़ रही थीं। तैयारी पूरी थी, पर साथ ही धुकधुकी भी लगी थी। अकेले (मतलब दुकेले) यात्रा, अनजान स्थान, एकदम अपरिचित लोग। बचपन से अब तक सुनीं तमाम...
    February 4, 12:00 AM
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