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  • दर दर भटकने से क्या फायदा
    घर-घर जाकर चीज़ें बेचने के काम में अपमान और अन्य ख़तरे तो होते ही हैं, फ़ायदा भी वैसा नहीं होता, जैसे सपने दिखाए जाते हैं। इसलिए ख़ासकर युवतियां बेहद सतर्क रहें या फिर कोई अन्य विकल्प तलाशें। पति को दफ़्तर के लिए विदा कर अमिधा ने मुख्य द्वार बंद किया और गुनगुनाते हुए अन्य कार्यों के लिए रसोई में आई ही थी कि कॉलबेल बज उठी। ज़रूर कुछ भूल गए होंगे...भुलक्कड़ कहीं के... बुदबुदाते हुए उसने जब मुख्य द्वार खोला, तो बाहर खड़ी युवती अभिवादन की मुद्रा में बोल पड़ी, भाभीजी, गुड मॉर्निंग। प्रत्युत्तर में वह सिर...
    12:15 AM
  • स्वस्थ हम सुहाना हर मौसम
    गर्मी भी सता रही है अौर बारिश भी आ रही है। रंग बदलते मौसम के रंगों का आनंद तो लें, पर रोगों के ख़तरे को नज़रअंदाज़ भी न करें। जानें कि इस मौसम में स्वस्थ कैसे रहें। मौ सम दिन में कई-कई बार रंग बदल रहा है। कभी तेज़ धूप पड़ती है, कभी अचानक बादल घिर आते हैं, तो कभी थोड़ी-सी बारिश होकर आसमान साफ़ हो जाता है, फिर उमस बढ़ जाती है। एक ही दिन में हम कभी पसीने में भीगते हैं, कभी बरसात में। बुरी बात यह कि ऐसे मौसम में रोगों के संक्रमण का ख़तरा भी अधिक होता है। उससे भी बुरी बात यह कि इस बार मौसम की यह अनियमितता कुछ...
    July 16, 11:37 AM
  • सुबह माने क्या?
    किसी के लिए भोर वेला में पांच बजे ही सुबह हो जाती है, तो किसी के लिए दिन चढ़े दस बजे भी सुबह-सुबह ही होती है। आख़िर सुबह कब तक मानी जाए?इस अंतर के कारण कैसी-कैसी ग़लतफ़हमियां और परेशानियां हो सकती हैं, आप भी जानिए... सुबह-सुबह, यानी मॉर्निंग। अंग्रेज़ी के अर्ली मॉर्निंग के लिए हिंदी में ब्रह्म मुहूर्त या भोर शब्द का प्रयोग होता है, लेकिन आम बोलचाल की भाषा में अक्सर लोग अर्ली मॉर्निंग के लिए सुबह-सुबह का इस्तेमाल करते हैं। जैसे, आज सुबह-सुबह किसी ने डोरबेल बजाकर नींद से जगा दिया या सुबह-सुबह फोन की...
    July 9, 11:07 AM
  • घर जैसे डाॅक्टर
    प्रोजेक्ट पर कुछ वक़्त के लिए न्यूज़ीलैंड गई थी। वहां की आबोहवा रास नहीं आई। अक्सर थकान महसूस होती, जबकि वज़न बढ़ रहा था। पहले तो इसे नई जगह और दिनचर्या का कारण माना, फिर अपनी फैमिली डॉक्टर दिव्या को कॉल किया। उन्होंने तुरंत थायरॉइड टेस्ट कराने को कहा और उनका अंदाज़ा सही निकला। अाकृति अस्थाना, इंदौर नौकरी की ख़ातिर दूसरे शहर में बसना पड़ा। उम्रदराज़ हो चुके माता-पिता की चिंता सताती रहती है। अक्सर फोन पर पापा, मम्मी की ख़राब तबियत का हाल िछपा जाते हैं। मेरी ग़ैरमौजूदगी का फ़ायदा उठाकर मीठा भी खा लेते...
    July 1, 01:11 PM
  • चिर ‘साहब’
    डॉक्टर बड़ी मेहनत से पढ़ाई करके, सालों-साल का अनुभव हासिल करके, ऐसे विशेषज्ञ बनते हैं, जिन्हें इंसानी शरीर को बनाने वाले हर जटिल तंत्र का ज्ञान होता है। यानी इन्हें हम मेहनतक़श प्रोफेशनल कह सकते हैं। लेकिन प्रोफेशन और प्रोफेशनल्स तो कितने ही होते हैं, इनमें ऐसी क्या ख़ास बात है कि जब दर्द सता रहा हो, तो इनका सफ़ेद चोगा देखकर ही राहत मिल जाती है। कितने साल पहले बना होगा मरीज़ का इनसे ऐसे भरोसे का रिश्ता कि इनके आगे हर दुख बयां कर दे, शायद ही किसी को याद हो। और तो और, बिना किसी के कहे हम इन्हें डॉक्टर साहब...
    July 1, 01:11 PM
  • बुढ़ापा बाधा नहीं मोटापा रोड़ा नहीं
    बहुरूप धरना, बहुगुन पाने का ज़रिया बन सकता है। अली असग़र का निभाया क़िरदार और कीकू का रूप तारीफ़ ही नहीं, नई इंसानी ऊंचाइयां भी पा रहे हैं। ज ब कोई कलाकार पुरुष होकर नारी या नारी होकर पुरुष का क़िरदार निभाए, तो उसके लिए रोज़ नई चुनौती पेश आती है। जन्मजात गुणों से विपरीत गुणों को समझना, उन्हें कामयाबी से अदा करना अच्छे अवलोकन की निशानी तो है ही, इस दौरान उपजी समझ भी बतौर इंसान निखरने में मदद करती है। दादी और पलक के क़िरदार निभाने वाले अली असग़र और कीकू शारदा के पास भी इस निखार और समझ के अनुभव हैं, जो...
    June 25, 11:07 AM
  • पहनावा मायने रखता है...
    ऑफ़िस के लिए निकलने से पहले कपड़ों की अलमारी के सामने शायद महिलाओं का सबसे ज़्यादा समय गुज़रता है। क्या पहनूं? इसी उधेड़बुन में बहुत समय व्यर्थ होता है। यह प्रश्न बहुत बेमानी भी नहीं है, क्योंकि आपके कपड़ेे पहनने और तैयार होने के सलीक़े से ही आपका व्यक्तित्व आंका जाता है। कई बार व्यक्ति के रहन-सहन और कार्यक्षमता के आधार पर पदोन्नति या कार्यस्थल निर्धारित किया जाता है, ख़ासतौर पर प्राइवेट सेक्टर की सेवाओं में। सवाल उठाया जा सकता है कि इस तरह की बातों का ज़ोर महिलाओं पर ही अधिक क्यों होता है! इसका...
    June 25, 12:14 AM
  • नए सत्र में नया तरीका
    नया शिक्षा सत्र, यानी बच्चे से नई उम्मीदें। लेकिन यदि आप पुराने ढर्रे पर ही चलेंगी, तो सिर्फ़ बच्चे की कोशिशों से ये उम्मीदें पूरी होने वाली नहीं।इसलिए, इस बार ख़ुद को, अपने तरीक़े को बदलने का संकल्प लें... न ए शिक्षा सत्र का आरम्भ भी तो नववर्ष की तरह ही है, बल्कि बच्चों और अभिभावकों के नज़रिए से देखें, तो यह कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है। तो क्यों न इस बार कुछ संकल्प भी लिए जाएं, ताकि न केवल बच्चे पढ़ाई में बेहतर परिणाम ला सकें, बल्कि वे और आप तनावमुक्त तथा ज़्यादा ख़ुश भी रह सकें! बच्चे के सिर पर सवार...
    June 18, 12:10 AM
  • पिता नजर आए
    मां से तो न जाने कितनी बातें करता था मैं, पर पापा ज़रा धीर-गम्भीर क़िस्म के थे। वे कम बोलते थे, लेकिन उनकी राय हमेशा मेरे काम आई। निर्णय लेने के गुर मैँंने पापा से ही सीखे हैं। (नचिकेत गौर, आर्किटेक्ट) पापा जैसे कोई जादू जानते थे, हर मुश्किल का हल चुटकियों में खोज निकालने का। बात छोटी हो या बड़ी, मां को हमेशा उनसे सलाह लेते देखा। मैं भी जब बड़ी हुई, तो अपनी परेशानी उनसे साझा करने लगी। आज भी जब कभी किसी मुश्किल में होती हूं, तो सबसे पहले यही सोचती हूं कि पापा ऐसी स्थिति में क्या करते और मेरी समस्या...
    June 11, 10:44 AM
  • पापा भी परफेक्ट होते हैं...
    परफेक्ट पापा होने का क्या मतलब है? वह जो बाहर ही नहीं, समय आने पर घर की भी सारी ज़िम्मेदारियां निभा सके। बीते दिनों एक चाय की गुमटी पर चार-पांच पुरुषों की मंडली जैसी जमी थी। पहले तो लगा कि साधारण बातचीत का दौर है, लेकिन ग़ौर से सुनने पर पता चला कि एक महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा हो रही थी। िवषय था- एक पुरुष का खाना पकाना किस हद तक सही है? चंद लम्हों में चाय के साथ-साथ वह बहस भी अपने अंत तक पहुंच गई। सही-ग़लत की इस बहस के बाद वे किस निर्णय पर पहुंचे, मैं नहीं जानता। हां! अपने अनुभवों से उनकी चर्चा का हल मैंने...
    June 11, 12:18 AM
  • बेकसूर को सजा
    जिन्होंने न गुनाह जाना, न गुनहगार को पहचाना, वो सारी ज़िंदगी कैसे सज़ा भुगतते हैं, केवल दंगे ऐसे मुक़ाम दिखाते हैं। फ़साद के ज़ख्मों को कुरेदकर एक मां ने आपबीती बयान की। दंगों की ख़ूनी आंधी जाने कितने मुस्तक़बिल उलटकर रख जाती है और कितनों पर अंधेरों की स्याही मलकर देती है। चंद घरों में छाया कुछ दिनों का सन्नाटा नहीं है ये। कई पीढ़ियों पर वीरानी फेर देते हैं दंगे। दंगाई कौन होते हैं? मिलकर किसी की दुनिया उजाड़ने वाले दूसरे दिन क्या एक-दूसरे के चेहरे भी पहचान पाते होंगे? ख़ैर, पहचान तो इंसानों की होती...
    June 11, 12:07 AM
  • जड़ों से है जीवन
    कोई भी वृक्ष अपनी जड़ों के साथ जुड़ा होता है और अगर उसे जड़ से अलग कर दिया जाए तो वह सूख जाता है, उसी तरह किसी भी समाज की जड़ उसका अतीत होता है और अगर उसको उसके अतीत से काट दिया जाए, तो वह भी तरक़्क़ी नहीं कर पाता है। हमें भी अपने अतीत की संस्कृति से अपने नाते को दोबारा जोड़ना होगा। इसकी तीन आवश्यकताएं हैं- अरण्य हमारी भारतीय संस्कृति अरण्य संस्कृति थी। हमारे शिक्षा के केंद्र अर्थात आश्रम अरण्य में थे। गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अरण्यों को पुनर्जीवित करने के लिए शांति निकेतन की स्थापना की।...
    June 4, 12:16 AM
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