आवरण कथा
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  • प्रण की तितली उड़ गई!
    पहली जनवरी को बड़े जोश से जो प्रण लिए जाते हैं, अमूमन छह दिन या बहुत हुआ तो लड़खड़ाते एक महीने में काफ़ूर हो जाते हैं। प्रण ग़लत नहीं, इरादा भी नेक है, तो चूक कहां होती है? सोचा था ज़्यादा,कम की क्षमता थी... नए साल के जोश में ज़्यादा सोच-विचार ही नहीं किया। बस, प्रण लेने थे, सो एक साथ कई ले लिए। रोज़ व्यायाम करेंगे, जल्दी उठेंगे, किताब पढ़ेंगे, डायरी लिखेंगे इत्यादि। ऐसा लगा, जैसे एक ही दिन में ख़ुद को पूरा बदल डालेंगे। पर शुरुआत से ही अन्य कार्यों के चलते दिक़्कत आने लगी और एक-एक कर प्रण छूटते चले गए। मन भी टूट गया।...
    February 3, 12:16 AM
  • माचिस क्यों, लाइटर क्यों नहीं
    एक दिन मैं किचन में खाना बना रही थी। तभी मेरे दस वर्षीय बेटे को पता नहीं क्या सूझी कि एकदम से अाकर बोला, मां, हमारे यहां गैस जलाने का लाइटर क्यों नहीं है, आप माचिस से गैस क्यों जलाती हैं? सच भी था, मैं हमेशा माचिस से ही गैस चूल्हा जलाती थी। पर असल बात यह थी कि मैं लगभग हर कम्पनी का लाइटर ख़रीद चुकी थी, लेकिन वह कुछ दिनों में ख़राब हो जाता था। इस बारे में जब परिचितों से पूछती तो वे कहते, पता नहीं, हमारा तो दस साल में एक बार भी ख़राब नहीं हुआ। मुझे समझ में न आता कि ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है। इसलिए तंग आकर...
    February 3, 12:11 AM
  • हर हाल बेगाने, पराएपन की पीड़ा से बिंधे दिलों की कहानियों का संग्रह है। मृदुला गर्ग जैसी मंझी हुई कथाकार की क़लम से सरजी ये कहानियां विदेश में बसे भारतीयों के मन का आईना हैं। परदेस में जो कुछ सहा जाता है, मन कैसे मसोसा-मरोड़ा जाता है, यह तो संग्रह के शीर्षक से ही ज़ाहिर हो जाता है, लेकिन कहानियों का शिल्प कुछ ऐसा है कि परायापन केवल परदेसियों की ओर से ही नहीं, अपनों के हाथों भी मिलता और उसी तीखेपन से चुभता महसूस होता है। अमूमन कहानियां एक पात्र का सिरा पकड़कर चलती हैं और अपनी बात रखती जाती हैं। यहां...
    February 3, 12:09 AM
  • अरे! कैमरा अच्छा, फोटो खराब
    महंगा डिज़िटल कैमरा ख़रीदा लिया। फिर भी फोटो कभी धुंधले हो जाते हैं, तो कभी अंधेरा छा जाता है। फोटो उतनी अच्छी नहीं आती, जितनी आनी चाहिए थी। ऐसी समस्याएं अक्सर नए फोटोग्राफर्स को आती हैं। अगर आपको भी ऐसी परेशानियां पेश आ रही हैं, तो ज़रा ग़ौर करें- अरे! हाथ कब हिले समस्या- नए फोटोग्राफर जिस समस्या से सबसे ज़्यादा दो चार होते हैं, वह है फोटो के धुंधलेपन की। यह तकनीकी कारणों से लेकर कैमरा हैंडलिंग के कारण हो सकती है। क्या करें- इससे बचने के लिए कैमरे की शटर स्पीड कम न रखें। यह 1/100 से ज़्यादा ही हो। इसके...
    February 3, 12:07 AM
  • अंतत: सुरक्षित
    बचपन से कोई सुरक्षित नहीं मानता था, इसलिए हमेशा घर का कोई न कोई साथ रहता ही था। लेकिन बेटे ने आख़िरकार पूर्ण सुरक्षाकी व्यवस्था कर ही दी... रात के ढाई बज रहे थे। सड़क किनारे खम्भे की बार-बार चालू-बंद होती धुंधली-सी रोशनी में एक बुज़ुर्ग आकृति बेंच पर बैठी नज़र आ रही थी। बुढ़िया माई के हाथ में छड़ी थी, जो शायद उनकी झुकती कमर का एकमात्र सहारा थी। गोद में बच्चे की तरह एक पुराना सूटकेस हज़ारों यादें लिए पड़ा था। तभी एक हवाई जहाज़ की आवाज़ ने रात के सन्नाटे को चीर दिया। माई ने आसमान की तरफ़ देखा, फिर अपने ठीक सामने...
    February 3, 12:06 AM
  • वेज से आगे वेगान
    यूं तो खानपान को लेकर अब तक हम लोगों को सिर्फ़ मांसाहारी और शाकाहारी में ही बांटते आए हैं। लेकिन शाकाहार के भीतर भी एक नया चलन देखने में आ रहा है, जिसमें लोग मांसाहार को तो त्याग ही देते हैं, जीव-जंतुओं से मिलने वाले खाद्य पदार्थों से भी परहेज करते हैं। यानी अनाज, फल, सब्ज़ियां और कंद-मूल ही लेते हैं। पश्चिमी देशों के इस चलन को वेगानिज़्म कहा जाता है और इसके तहत आने वाले फूड व लोगों को वेगान कहते हैं। यह जीवनशैली अपनाने वाले लोग हमारे देश में भी तेज़ी से बढ़ते जा रहे हैं। चलिए, जानते हैं वेगान से जुड़ी कुछ...
    February 3, 12:05 AM
  • अनजान था अजनबी नहीं
    ये अनुभव मेरी सहेली के हैं, पर मुझे लगता है कि हर महिला इस अहसास को समझ सकती है। आगे की बातें सहेली के शब्दों में... फ़ेसबुक पर कई बार उसकी फ्रेंड रिक्वेस्ट आई। आख़िरकर एक दिन हैलो-हाय हो ही गई। फिर लम्बा अरसा बीता, नेट पर सक्रिय नहीं रही। एक दिन मन हुआ तो फ़ेसबुक खोला। न जाने कितने मैसेज़ थे उसके- प्लीज़ टॉक टू मी। सोचा, चलो इस विदेशी मित्र से चैटिंग की जाए, वहां की संस्कृति के बारे में पता चलेगा। बातें शुरू हुईं। फिर रोज़ ही गुड मॉर्निंग, गुड नाइट, ब्रेकफास्ट लिया, लंच हुआ, डिनर लिया, क्या कर रही हो, कैसी...
    February 3, 12:04 AM
  • स्टाइल कहां खो गया?
    कॉलेज के लिए तैयार होना अब बोझ लगने लगा है। सही ड्रेस तय करने, ढूंढने और एक्सेसरीज़ के साथ सेट करने में इतना वक़्त लगता है कि पूछो मत! क्या ऐसा आपके साथ भी हो रहा है? कॉलेज या किसी फंक्शन पर जाने का आधा उत्साह तो तैयारी में छुपा होता है। उसी में ऊब होने लगे, तो बुझे-बुझे से तो लगेंगे ही। पता लगाइए कि कहीं आपका वॉर्डरोब भी तो नहीं ऊब चुका? या अति अस्त-व्यस्त होने के चलते हांफने लगा हो? इलाज शुरू करने से पहले समस्या की तह तक पहुंचना ज़रूरी होगा। बेतरतीबी- अस्त-व्यस्त अलमारी में कपड़े न तो दिखते हैं, न ही...
    February 3, 12:03 AM
  • आप भी हम जैसे न थे?
    मेरी पढ़ाई एक साल पहले ख़त्म हुई और अब जॉब कर रहा हूं। कल के एक दृश्य ने मेरी कुछ पुरानी यादों को ताज़ा कर दिया। कल जब घर पहुंचा, तो देखा कि पिताजी छोटे भाई को समझाइश दे रहे थे कि ज़िंदगी में लक्ष्य तय करो, तुम भी आजकल के युवाओं की तरह मत बनो। उनका कहना था कि अब युवा न तो संवेदनशील हैं और न ही अनुशासित। यह ठीक है कि घर के बड़े युवाओं को लेकर फ़िक्रमंद होते हैं, लेकिन इस चक्कर में वे कई धारणाएं भी पाल लेते हैं। अभिभावकों को मुझे लेकर भी भ्रांतियां थीं, हालांकि समय के साथ उनकी राय बदल गई। अब मेरे भाई को लेकर...
    February 3, 12:02 AM
  • हड्डियां कुछ कह रही हैं...
    ऑस्टियोपोरोसिस एक तरह का चुप्पा रोग है, क्योंकि इसकी वजह से कमज़ोर होती हडि्डयों के बारे में तब तक पता नहीं चलता, जब तक कि साधारण चाेट से कोई हड्डी टूट ही न जाए। यह गम्भीर स्थिति होती है, जब हडि्डयां भुरभुरी और कमज़ोर हो चुकी होती हैं। बावजूद इसके शुरुआती अवस्थाओं में भी कुछ संकेत मिलते हैं, जिन्हें पहचानकर इसकी रोकथाम की जा सकती है। क्या है ऑस्टियोपोरोसिस यह 55 वर्ष या अधिक उम्र में होने वाली समस्या है। दरअसल, हडि्डयों में ताउम्र विकास होता रहता है। पुरानी अस्थि कोशिकाएं नष्ट होती जाती हैं और...
    February 3, 12:01 AM
  • उत्थान में चुनौती है...
    उपनिषदों में कहा गया है कि ईश्वर ने इंसान को ऊपर उठने के लिए बनाया है, नीचे गिरने के लिए नहीं। संदेश आत्मोत्थान का है। हर हाल में, हर परिस्थिति में प्रगति ही एक रास्ता है। यानी साफ़ है कि रोते-झींकते, शिक़ायतें करते लोगों को प्रगतिपरक नहीं कहा जा सकता। और इस संदेश की गम्भीरता को समझें, तो जान जाएंगे कि इंसान का जन्म इसलिए नहीं हुआ कि वो हार जाने या अकर्मण्य हो जाने के बारे में सोचे भी। उत्थान के बारे में हमारी उत्पत्ति की एक अवधारणा भी कुछ कहती है। कहते हैं कि हम बंदर से इंसान बने। यानी चौपाए की तरह...
    February 3, 12:00 AM
  • देश की सारी तरक़्क़ी और नागरिकों को मिली शक्ति के मूल में है संविधान।आइए, गणतंत्र दिवस पर दुनिया के इस सबसे बड़े और अनूठे संविधान की ख़ूबियों को जानें और इसके प्रति कृतज्ञ हों। हम अपने गणतंत्र की 66वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, तो बहुत-से मित्र एक सवाल भी पूछ रहे हैं कि इस दौरान देश ने क्या खोया, क्या पाया? उनका आशय है कि देश को संविधान से क्या मिला! मैं मानता हूं कि भारत ने संविधान के दिखाए रास्ते पर चलते हुए ही भुखमरी, ग़रीबी, निरक्षरता जैसे गम्भीर मसलों को काफ़ी हद तक सुलझाया। अनेक मत फिर भी एकमत भारत...
    January 26, 06:29 AM
  • हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम-1956 में पैतृक सम्पत्ति को लेकर मिलने वाले अधिकारों का उल्लेख है। लेकिन बेटियों के लिहाज़ से इसमें कुछ कमियां थीं, इसलिए 2005 में महिला हिंदू उत्तराधिकार(संशोधन) अधिनियम लाया गया। अब बेटा-बेटी बराबर : इस संशोधन के बाद पुत्री को भी पिता की सम्पत्ति में बराबर हक़ प्रदान किया गया है। हिंदू परिवार (सिख, जैन और बौद्ध भी इसी दायरे में आते हैं) में जो अधिकार पुत्र को प्राप्त होते हैं, अब वही अधिकार बेटियों को भी हैं। इस संशोधन से पहले बेटी पिता के घर पर रह तो सकती थी, लेकिन पिता की...
    January 26, 06:26 AM
  • ग्रहाक सबसे ऊपर होता है!
    अगर आप किसी वस्तु या सेवा के बदले भुगतान करते हैं, तो आप उपभोक्ता हैं और उचित गुणवत्ता की चीज़ या सेवा प्राप्त करना आपका बुनियादी हक़ है। उपभाेक्ता संरक्षण क़ानून आपको कई अधिकार देता है। अ ब शुद्ध हवा और पानी भी मुफ़्त नहीं है। इस लिहाज़ से हर व्यक्ति कुछ न कुछ उपभोग कर रहा है। उपभोक्ता होने के नाते अपने अधिकारों को जानना ज़रूरी है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, देश में 93 प्रतिशत लोग उपभोक्ता मामलों की शिकायत ही नहीं करते। इसका एक कारण सुनवाई की प्रक्रिया में समय लगना है। कुछ लोग न्यायालय की प्रक्रिया...
    January 26, 06:23 AM
  • बचपन को मिला है पूरा संरक्षण
    बच्चे देश का भविष्य हैं और यह भविष्य निर्भर करता है उनकी संवार पर। इसलिए संविधान में बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं और उन्हें एक स्वस्थ माहौल की गारंटी दी गई है। भा रत का संविधान मानवीय गरिमा, स्वतंत्रता और समानता के बुनियादी मूल्यों का दस्तावेज़ है। यह बच्चों के लिए ख़ासतौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बतौर मानव उन्हें स्वतंत्रता के साथ जीने (अनुच्छेद- 21) समेत तमाम मौलिक अधिकार तो देता ही है, उनकी बेहतरी के लिए विशेष प्रावधान भी करता है। अनुच्छेद 23 में...
    January 26, 06:20 AM
  • बचाएंगे तभी ही बचेंगे...
    संविधान निर्माताओं ने पर्यावरण के महत्व को समझा था, इसलिए इसे अधिकार के साथ कर्तव्यों में भी शामिल किया गया। लेकिन स्वार्थ और लापरवाही के चलते जनता और सरकारें, दोनों इस कर्तव्य को भुला बैठी हैं। य ह भारतीय संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता ही कही जाएगी कि दशकों पहले उन्होंने पर्यावरण की महत्ता को समझ लिया था। उन्होंने न सिर्फ़ स्वच्छ पर्यावरण को व्यक्ति के अधिकारों में शामिल माना, बल्कि पर्यावरण की रक्षा को आम जनता के कर्तव्यों और राज्य की ज़िम्मेदारियों में सम्मिलित भी किया। अधिकार है...
    January 26, 06:16 AM
  • उंगली पर टिका है गणतंत्र
    प्रजा ख़ुश रह सकती है, पर वह किसी के रहमो-करम पर होती है। नागरिक दुखी हो सकते हैं, पर अपने भाग्यविधाता ख़ुद होते हैं। मतदान का अधिकार हमें नागरिक बनाता है। इसका प्रयोग करें। म तदान और चुनाव लड़ने का अधिकार गणतांत्रिक व्यवस्था का बुनियादी अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 326 में 18 वर्ष से अधिक उम्र के सभी नागरिकों को मतदान का अधिकार है। संविधान सभा में इस पर लम्बी बहस हुई थी कि क्या वोट देने का अधिकार सभी लोगों को होना चाहिए। लेकिन संविधान निर्माताओं की समझ साफ़ थी कि हर व्यक्ति- चाहे पढ़ा-लिखा हो या...
    January 26, 06:13 AM
  • सूचना है शक्ति और अधिकार
    सूचना का अधिकार (आरटीआई) लोकतंत्र की नींव है। संविधान के अनुच्छेद 19 में वर्णित अभिव्यक्ति के अधिकार से ही इसका क़ानूनी सम्बंध है। साल 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम के माध्यम से नागरिकों को यह अहम अधिकार प्राप्त हुआ है। लोकतंत्र के सही संचालन के लिए मतदान के अलावा सूचना के अधिकार के ज़रिए ही नागरिकों और जनप्रतिनिधि-नौकरशाह जैसे सरकारी तंत्र के बीच सीधा रिश्ता बनता है। एक महिला है मिसाल जयपुर के हरमाड़ा की पूर्व सरपंच नौरती देवी ने इस अधिकार के महत्व और उपयोगिता को समझा। उन्होंने पंचायत की...
    January 26, 06:09 AM
  • बेसहारा नहीं छोड़ सकेगा कोई
    इसीलिए क़ानून में भरण-पोषण के लिए दावा कर सकने का प्रावधान किया गया है। यह दावा कोई भी साधनहीन-अक्षम व्यक्ति कर सकता है। भा रतीय संविधान का अनुच्छेद 21 स्वतंत्रता के साथ जीने की गारंटी देता है। यह जीना सिर्फ़ सांसें लेना भर नहीं है, जैसा कि उच्चतम न्यायालय ने अपने एक निर्णय में कहा था कि जीवित रहने का अधिकार केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवीय गरिमा के साथ जीवित रहने का अधिकार भी उसके परिक्षेत्र में आता है। इसीलिए, भरण-पोषण को लेकर क़ानून बनाए गए हैं और सरकारें निराश्रित पेंशन की...
    January 26, 06:05 AM
  • फिर क्यों खुद़ पर वार?
    मेटाबॉलिज़्म, यानी शरीर की चयापचय प्रक्रिया। आहार को ऊर्जा में बदलने का काम हमारे शरीर का मेटाबॉलिज़्म करता है। यही ऊर्जा शरीर से जुड़े सभी कार्यों को अंजाम देती है। इसलिए शरीर के चयापचय में तेज़ गति से काम करने की क्षमता होनी चाहिए, जिससे ऊर्जा का संचार होता रहे और हमारा शरीर सुचारु रूप से काम कर सके। लेकिन हर दिन हम कई ऐसी छोटी-बड़ी ग़लतियां कर देते हैं, जिससे इस प्रक्रिया पर नकारात्मक असर पड़ने लगता है। ग़ौर कीजिए इन ग़लतियों पर, शायद आप भी इन्हें दोहरा रहे हों... नींद बिगाड़े काम क्या ग़लती हो जाती है-...
    January 20, 12:12 AM