Home >> Madhurima >> Cover Story
  • श्री वरदमूर्तये नमो नम:
    गणेश चतुर्थी पर्व पर जगह-जगह पंडाल लगाकर गणपति की पूजा अर्चना की जाती है। कुछ लोग घर में भी गणपति की प्रतिमा स्थापित करते हैं। वैसे तो आजकल गणपति के तरह-तरह के रूप उपलब्ध हैं, लेकिन परम्परागत तौर पर वर मुद्रा में लम्बोदर या गजानन रूप का ही पूजन श्रेष्ठ फलदायी होता है। गणपति देवताओं को भी वरदान देने वाले स्वयं ॐकार के स्वरूप माने गए हैं। जिस तरह प्रत्येक मंत्र के आरम्भ में ॐ का उच्चारण आवश्यक माना जाता है, उसी तरह शुभ अवसर पर गणपति पूजन अनिवार्य है। मारे शास्त्रों के तहत श्रद्धा और...
    August 27, 03:40 PM
  • खत में रोशन यादें
    उस पुराने, मुड़े-तुड़े ख़त में कई यादें बंद थीं। एक बार झांककर उसकी ओर देखा। ख़त के साथ-साथ मेरी ज़िंदगी में वह मीठा इंतज़ार लौट आया... आदरणीय मां और पापा, आशा करता हूं आप दोनों स्वस्थ व ख़ुश होंगे। मैं भी अच्छा हूं। स्वस्थ हूं, समय पर खाता हूं, सोता हूं और कोशिश कर रहा हूं कि अच्छा शेड्यूल बनाकर रख सकूं। यहां पढ़ाई भी बढ़िया होती है। हां! कुछ नए दोस्त भी बनाए हैं मैंने! बहुत अच्छे हैं वो... हम एक दूसरे से न केवल अपनी चीज़ें और किताबें, बल्कि अपना अकेलापन, दुख-सुख सब बांटते हैं। मां, आपने जैसा कहा था, मैं सोने से...
    August 20, 01:58 PM
  • जिम्मेदार आजादी
    लेने से पहले देना पड़ता है। अधिकारों और सुविधाओं से पहले कर्तव्य निभाने पड़ते हैं। ज़िम्मेदारियों में कोताही होती है, तो अधिकार भी बाधित होते हैं। आज़ादी के पर्व पर इस पहलू से भी सोचें... आज़ादी ढेरों अधिकार देती है, साथ ही यह आपसे कर्तव्य-पालन की अपेक्षा भी रखती है। इसलिए अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना, उनकी मांग करना ज़रूरी है, लेकिन अपनी जि़म्मेदारियां निभाना भी उतना ही ज़रूरी है। आप अपने कर्तव्य निभा रहे हैं या नहीं, यह बात दूसरों के अधिकारों को प्रभावित करती है और अक्सर आपके अपने...
    August 13, 12:50 PM
  • बयार, फुहार और दुलार का सावन
    सावन की बात ही निराली है। अल्हड़ और बेफ़िक्र बना देता है। बूंदों के बीच बहती बयार। शरारतें, शिकायतें, झिड़कियां और दुलार। और सबमें भरी ढेर-सारी मिठास। सावन की बातों और यादों का मौसम यहां भी आ ठहरा है। अ हा! सावन और वह भी बचपन का! अतीत के पन्ने पलटती हूं, तो होने लगता है अहसास कुछ मिठास का, कुछ खटास का, पर फिर भी अति मधुर। बात उस समय की है, जब मैंने आठ या नौ सावन ही देखे होंगे। अल्हड़ उम्र, चिंताओं और मान-अपमान से बेख़बर जि़ंदगी। बस सहेलियों का संग और मस्ती का रंग। सागर में हम परकोटा में रहते थे। घर...
    August 6, 11:30 AM
  • कलम के सिपाही को नमन
    सी के सृजन को देखकर रश्क करना और कहना कि काश, इसे हमने लिखा होता, बड़ा ही आम विचार है। लेकिन ऐसा दो लोगों के लिए नहीं कहता कोई - एक कबीर और दूसरे प्रेमचंद। शब्दों के धनी कई क़लमकार हुए हैं। सच भी है, अल्फाज़ ख़ूबसूरत न हुए, तो जुमलों का मज़ा ही क्या रहा। लेकिन प्रेमचंद का अंदाज़ बिल्कुल जुदा है। भाषा के साथ प्रयोग करते हुए लेखनी को सरल तथा पात्रों के चित्रण को सहज बनाए रखने की उन जैसी दक्षता किसी और लेखक में दिखाई नहीं देती। प्रेमचंद के सृजनसंसार में पात्र दीन-हीन हों, ग़ुरबत से जूझ रहे हों, धनी-मानी हों...
    July 30, 12:00 PM
  • दर दर भटकने से क्या फायदा
    घर-घर जाकर चीज़ें बेचने के काम में अपमान और अन्य ख़तरे तो होते ही हैं, फ़ायदा भी वैसा नहीं होता, जैसे सपने दिखाए जाते हैं। इसलिए ख़ासकर युवतियां बेहद सतर्क रहें या फिर कोई अन्य विकल्प तलाशें। पति को दफ़्तर के लिए विदा कर अमिधा ने मुख्य द्वार बंद किया और गुनगुनाते हुए अन्य कार्यों के लिए रसोई में आई ही थी कि कॉलबेल बज उठी। ज़रूर कुछ भूल गए होंगे...भुलक्कड़ कहीं के... बुदबुदाते हुए उसने जब मुख्य द्वार खोला, तो बाहर खड़ी युवती अभिवादन की मुद्रा में बोल पड़ी, भाभीजी, गुड मॉर्निंग। प्रत्युत्तर में वह सिर...
    July 23, 12:15 AM
  • स्वस्थ हम सुहाना हर मौसम
    गर्मी भी सता रही है अौर बारिश भी आ रही है। रंग बदलते मौसम के रंगों का आनंद तो लें, पर रोगों के ख़तरे को नज़रअंदाज़ भी न करें। जानें कि इस मौसम में स्वस्थ कैसे रहें। मौ सम दिन में कई-कई बार रंग बदल रहा है। कभी तेज़ धूप पड़ती है, कभी अचानक बादल घिर आते हैं, तो कभी थोड़ी-सी बारिश होकर आसमान साफ़ हो जाता है, फिर उमस बढ़ जाती है। एक ही दिन में हम कभी पसीने में भीगते हैं, कभी बरसात में। बुरी बात यह कि ऐसे मौसम में रोगों के संक्रमण का ख़तरा भी अधिक होता है। उससे भी बुरी बात यह कि इस बार मौसम की यह अनियमितता कुछ...
    July 16, 11:37 AM
  • सुबह माने क्या?
    किसी के लिए भोर वेला में पांच बजे ही सुबह हो जाती है, तो किसी के लिए दिन चढ़े दस बजे भी सुबह-सुबह ही होती है। आख़िर सुबह कब तक मानी जाए?इस अंतर के कारण कैसी-कैसी ग़लतफ़हमियां और परेशानियां हो सकती हैं, आप भी जानिए... सुबह-सुबह, यानी मॉर्निंग। अंग्रेज़ी के अर्ली मॉर्निंग के लिए हिंदी में ब्रह्म मुहूर्त या भोर शब्द का प्रयोग होता है, लेकिन आम बोलचाल की भाषा में अक्सर लोग अर्ली मॉर्निंग के लिए सुबह-सुबह का इस्तेमाल करते हैं। जैसे, आज सुबह-सुबह किसी ने डोरबेल बजाकर नींद से जगा दिया या सुबह-सुबह फोन की...
    July 9, 11:07 AM
  • घर जैसे डाॅक्टर
    प्रोजेक्ट पर कुछ वक़्त के लिए न्यूज़ीलैंड गई थी। वहां की आबोहवा रास नहीं आई। अक्सर थकान महसूस होती, जबकि वज़न बढ़ रहा था। पहले तो इसे नई जगह और दिनचर्या का कारण माना, फिर अपनी फैमिली डॉक्टर दिव्या को कॉल किया। उन्होंने तुरंत थायरॉइड टेस्ट कराने को कहा और उनका अंदाज़ा सही निकला। अाकृति अस्थाना, इंदौर नौकरी की ख़ातिर दूसरे शहर में बसना पड़ा। उम्रदराज़ हो चुके माता-पिता की चिंता सताती रहती है। अक्सर फोन पर पापा, मम्मी की ख़राब तबियत का हाल िछपा जाते हैं। मेरी ग़ैरमौजूदगी का फ़ायदा उठाकर मीठा भी खा लेते...
    July 1, 01:11 PM
  • चिर ‘साहब’
    डॉक्टर बड़ी मेहनत से पढ़ाई करके, सालों-साल का अनुभव हासिल करके, ऐसे विशेषज्ञ बनते हैं, जिन्हें इंसानी शरीर को बनाने वाले हर जटिल तंत्र का ज्ञान होता है। यानी इन्हें हम मेहनतक़श प्रोफेशनल कह सकते हैं। लेकिन प्रोफेशन और प्रोफेशनल्स तो कितने ही होते हैं, इनमें ऐसी क्या ख़ास बात है कि जब दर्द सता रहा हो, तो इनका सफ़ेद चोगा देखकर ही राहत मिल जाती है। कितने साल पहले बना होगा मरीज़ का इनसे ऐसे भरोसे का रिश्ता कि इनके आगे हर दुख बयां कर दे, शायद ही किसी को याद हो। और तो और, बिना किसी के कहे हम इन्हें डॉक्टर साहब...
    July 1, 01:11 PM
  • बुढ़ापा बाधा नहीं मोटापा रोड़ा नहीं
    बहुरूप धरना, बहुगुन पाने का ज़रिया बन सकता है। अली असग़र का निभाया क़िरदार और कीकू का रूप तारीफ़ ही नहीं, नई इंसानी ऊंचाइयां भी पा रहे हैं। ज ब कोई कलाकार पुरुष होकर नारी या नारी होकर पुरुष का क़िरदार निभाए, तो उसके लिए रोज़ नई चुनौती पेश आती है। जन्मजात गुणों से विपरीत गुणों को समझना, उन्हें कामयाबी से अदा करना अच्छे अवलोकन की निशानी तो है ही, इस दौरान उपजी समझ भी बतौर इंसान निखरने में मदद करती है। दादी और पलक के क़िरदार निभाने वाले अली असग़र और कीकू शारदा के पास भी इस निखार और समझ के अनुभव हैं, जो...
    June 25, 11:07 AM
  • पहनावा मायने रखता है...
    ऑफ़िस के लिए निकलने से पहले कपड़ों की अलमारी के सामने शायद महिलाओं का सबसे ज़्यादा समय गुज़रता है। क्या पहनूं? इसी उधेड़बुन में बहुत समय व्यर्थ होता है। यह प्रश्न बहुत बेमानी भी नहीं है, क्योंकि आपके कपड़ेे पहनने और तैयार होने के सलीक़े से ही आपका व्यक्तित्व आंका जाता है। कई बार व्यक्ति के रहन-सहन और कार्यक्षमता के आधार पर पदोन्नति या कार्यस्थल निर्धारित किया जाता है, ख़ासतौर पर प्राइवेट सेक्टर की सेवाओं में। सवाल उठाया जा सकता है कि इस तरह की बातों का ज़ोर महिलाओं पर ही अधिक क्यों होता है! इसका...
    June 25, 12:14 AM
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