आवरण कथा
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  • शुक्र है कमजोरियां हैं
    मामला घर का हो या बाहर का, हुक्म चलाने का लोभ किसी से नहीं छूटता। सामाजिक जीवन में क़दों की नापजोख भी इसी आधार पर होती है कि चलती किसकी है। सब आनंदित होते हैं हुक्म चलाने में, किसी पर लगाम कसे रखने में। लेकिन मन के किसी कोने में ख़ुद पर किसी और के नियंत्रण का बोध भी समाया रहे, ये कुदरत का क़ानून है। मुखर नियंत्रण सबके जीवन में होते हैं। और ख़ामोश कमज़ोरियां भी। हर इंसान ख़ुद को शीर्ष पर ही देखने की कल्पना करता है। वहां से दुनिया सुंदर दिखती है, इसलिए नहीं। बल्कि यह जानते हुए भी कि वहां अकेलापन होगा,...
    October 16, 02:01 PM
  • हिल-मिल झिलमिल करवाचौथ
    अनूठा उत्सव है करवाचौथ का। पृथ्वी के दूसरे हिस्से के लोग इसे कौतूहल से देखते हैं। निबाह के मायने और उसका आनंद समझाने वाले इस पर्व के मुरीद कई हैं। चांद के सामने, सदा बढ़ते रहने वाले प्रेम की आकांक्षा लिए उठते हैं करवे और अर्घ्य देते हैं। शादी के चाव का एक हिस्सा करवाचौथ भी है। यह पर्व भी है, व्रत भी, साथ पर नाज़ भी और निबाह का संकल्प भी। प्रतीकात्मक हैं इसकी रस्में। निराहार रहना भी एक संकेत है कि अन्न-जल भले न मिले, पर साथ सदा बना रहे। कितने ही मन सम्भल जाते हैं इस दिन। रस्मों को ढकोसला कहने वाले...
    October 8, 01:55 PM
  • रावण भी रोया था....
    शत्रु बहुत निकट आ पहुंचा था। मैं अंत को अपने समीप देख सकता था, यद्यपि मैं इसे स्वीकार नहीं करना चाहता था। कल ही तो अपने पुत्र की चिता को मुखाग्नि दी है। अब तो कुछ बचा ही नहीं था, केवल राम से अंत तक युद्ध करना ही शेष था। परंतु मैं किसलिए युद्ध कर रहा था? मेरा साम्राज्य समाप्तप्राय था, मेरे पुत्र की मृत्यु हो चुकी थी, मेरी रानी की मान-मर्यादा को धूल में मिला दिया गया था। अब शेष था ही क्या? जिस प्रकार कोई तीव्र लहर समुद्र के किनारे खड़ी चट्टान को क्षत-विक्षत कर देती है, उसी प्रकार मैं भी जर्जर होता जा...
    October 1, 12:38 PM
  • शक्तिम प्रणमाम्यम
    भगवती शक्ति जगत का पालन करती है। शक्ति के बिना संसार अशक्त हो जाता है। शक्ति ई कारांत है, स्त्रीलिंग है। शक्ति के अभाव में शिव भी शव हो जाता है। शक्ति ही जगन्माता है। नारी स्वरूपा है। मां है। ऋग्वेद के दशम् मंडल के 125वें सूक्त में आदिशक्ति जगदम्बा कहती हैं- मैं सम्पूर्ण ब्रह्मांड में भूलोक व सर्वलोक का विस्तार करती हूं। अखिल विश्व मेरी विभूति है। शारदीय नवरात्र को शाक्त महापर्व भी कहा जाता है। यह शक्ति संचय का महापर्व है। पूजा, अर्चना, व्रत, उपवास, जप, तप से शक्तिसंचय होता है। मां की कृपा...
    September 24, 12:36 PM
  • क़द बता देता है...
    जम्मू-कश्मीर में बारशि के कारण नदी-नहरें उबल पड़ीं। श्रीनगर में झेलम नदी ने अचानक अपने कनिारे तोड़ दएि। उस इलाक़े को पानी-पानी कर दयिा, जसिने ख़ुद को हमेशा इस तरह की मुश्कलिों से महफ़ूज़ माना था। क़ुदरत भी अजीब शै है। इंसान को याद दलिा ही देती है किउसके बस में कुछ नहीं। जब वो अपनी मनमानी करेगी, इंसान को सब भुला देगी। वो तमाम भेद भी, जन्हिें लोग अब तक अपनी ज़िन्दगीसे भी बड़ा मानते रहे हैं। सैलाब सब नाप लेता है। नापकर, बराबर करके दखिा देता है कुछ बड़ा नहीं क़ुदरत से, कुछ छोटा नहीं कसिी से। आपदाएं एकाएक यह...
    September 17, 12:53 PM
  • ओह, आपको हिंदी नहीं आती?
    तना गर्व महसूस होता है यह कहने में कि हमें हिंदी नहीं आती। ऐसे लोग आपको-हमको मिलते ही रहते हैं। और ऐसों की तो कमी ही नहीं, जो यह कहते हुए हीनता महसूस करें कि उन्हें अंग्रेज़ी नहीं आती। विदेशी भाषा का ऐसा रुआब होगा कि जिसका देश है, उसको दर-बदर होने का संकट झेलना पड़ेगा, यह तो सोच ही अहमक़ाना लगती है। वैसे जो ऐसी कल्पनाएं करके ही ख़ुश होते हैं कि हिंदी दिवस मनाने वाले मानते हैं कि भाषा पर संकट है, तो उन्हें अपनी ख़ुशफ़हमी दूर कर लेनी चाहिए, क्योंकि यह दिन मनाना संकट का द्योतक नहीं, अपने ही देश में, सैलानियों...
    September 10, 01:42 PM
  • गुरु मिले तो जग मिले
    शिक्षक पाठ्यपुस्तकों तक सीमित हो गए हैं, इसलिए विद्यार्थियों का संसार भी उन्हीं तक सिमट गया है। ज़रूरत है कि शिक्षक वे गुरु बनेंगे, जो दिशा दिखाते हैं, संसार की खिड़कियां खोलते हैं और जीना सिखाते हैं। टी वी पर आने वाले एक विज्ञापन में जब बच्चा कहता है कि दीवार दो तरह की होती है- एक अच्छी, दूसरी बुरी, तो बाक़ी बच्चे हंसते हैं। वे इसलिए हंसते हैं कि यह उनकी पाठ्यपुस्तकों और रट्टा लगाई गई जानकारी से बाहर की बात है। यह एक प्रसंग हमारी शिक्षा प्रणाली की पोल खोल देता है। यह बताता है कि हमारी शिक्षा...
    September 3, 03:41 PM
  • श्री वरदमूर्तये नमो नम:
    गणेश चतुर्थी पर्व पर जगह-जगह पंडाल लगाकर गणपति की पूजा अर्चना की जाती है। कुछ लोग घर में भी गणपति की प्रतिमा स्थापित करते हैं। वैसे तो आजकल गणपति के तरह-तरह के रूप उपलब्ध हैं, लेकिन परम्परागत तौर पर वर मुद्रा में लम्बोदर या गजानन रूप का ही पूजन श्रेष्ठ फलदायी होता है। गणपति देवताओं को भी वरदान देने वाले स्वयं ॐकार के स्वरूप माने गए हैं। जिस तरह प्रत्येक मंत्र के आरम्भ में ॐ का उच्चारण आवश्यक माना जाता है, उसी तरह शुभ अवसर पर गणपति पूजन अनिवार्य है। मारे शास्त्रों के तहत श्रद्धा और...
    August 27, 03:40 PM
  • खत में रोशन यादें
    उस पुराने, मुड़े-तुड़े ख़त में कई यादें बंद थीं। एक बार झांककर उसकी ओर देखा। ख़त के साथ-साथ मेरी ज़िंदगी में वह मीठा इंतज़ार लौट आया... आदरणीय मां और पापा, आशा करता हूं आप दोनों स्वस्थ व ख़ुश होंगे। मैं भी अच्छा हूं। स्वस्थ हूं, समय पर खाता हूं, सोता हूं और कोशिश कर रहा हूं कि अच्छा शेड्यूल बनाकर रख सकूं। यहां पढ़ाई भी बढ़िया होती है। हां! कुछ नए दोस्त भी बनाए हैं मैंने! बहुत अच्छे हैं वो... हम एक दूसरे से न केवल अपनी चीज़ें और किताबें, बल्कि अपना अकेलापन, दुख-सुख सब बांटते हैं। मां, आपने जैसा कहा था, मैं सोने से...
    August 20, 01:58 PM
  • जिम्मेदार आजादी
    लेने से पहले देना पड़ता है। अधिकारों और सुविधाओं से पहले कर्तव्य निभाने पड़ते हैं। ज़िम्मेदारियों में कोताही होती है, तो अधिकार भी बाधित होते हैं। आज़ादी के पर्व पर इस पहलू से भी सोचें... आज़ादी ढेरों अधिकार देती है, साथ ही यह आपसे कर्तव्य-पालन की अपेक्षा भी रखती है। इसलिए अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना, उनकी मांग करना ज़रूरी है, लेकिन अपनी जि़म्मेदारियां निभाना भी उतना ही ज़रूरी है। आप अपने कर्तव्य निभा रहे हैं या नहीं, यह बात दूसरों के अधिकारों को प्रभावित करती है और अक्सर आपके अपने...
    August 13, 12:50 PM
  • बयार, फुहार और दुलार का सावन
    सावन की बात ही निराली है। अल्हड़ और बेफ़िक्र बना देता है। बूंदों के बीच बहती बयार। शरारतें, शिकायतें, झिड़कियां और दुलार। और सबमें भरी ढेर-सारी मिठास। सावन की बातों और यादों का मौसम यहां भी आ ठहरा है। अ हा! सावन और वह भी बचपन का! अतीत के पन्ने पलटती हूं, तो होने लगता है अहसास कुछ मिठास का, कुछ खटास का, पर फिर भी अति मधुर। बात उस समय की है, जब मैंने आठ या नौ सावन ही देखे होंगे। अल्हड़ उम्र, चिंताओं और मान-अपमान से बेख़बर जि़ंदगी। बस सहेलियों का संग और मस्ती का रंग। सागर में हम परकोटा में रहते थे। घर...
    August 6, 11:30 AM
  • कलम के सिपाही को नमन
    सी के सृजन को देखकर रश्क करना और कहना कि काश, इसे हमने लिखा होता, बड़ा ही आम विचार है। लेकिन ऐसा दो लोगों के लिए नहीं कहता कोई - एक कबीर और दूसरे प्रेमचंद। शब्दों के धनी कई क़लमकार हुए हैं। सच भी है, अल्फाज़ ख़ूबसूरत न हुए, तो जुमलों का मज़ा ही क्या रहा। लेकिन प्रेमचंद का अंदाज़ बिल्कुल जुदा है। भाषा के साथ प्रयोग करते हुए लेखनी को सरल तथा पात्रों के चित्रण को सहज बनाए रखने की उन जैसी दक्षता किसी और लेखक में दिखाई नहीं देती। प्रेमचंद के सृजनसंसार में पात्र दीन-हीन हों, ग़ुरबत से जूझ रहे हों, धनी-मानी हों...
    July 30, 12:00 PM
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