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साहित्य

सच अपना-अपना

समय भी कितना अजीब होता है। कब.. कहां.. किसे.. कैसे मिलवा देता है, यकीन ही नहीं होता। ऐसे ही एक दिन मेरी मुलाकात इंदु से हो गई। मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि इंदु से मैं फिर कभी मिल पाऊंगी। हम दोनों ही ऑडिटोरियम में एक नाटक देखने गए थे और इसे संयोग ही कहेंगे कि हम दोनों की कुर्सियां आसपास ही थीं। मैं बहुत देर से उसे देख रही थी। चेहरा जाना-पहचाना लग रहा है। हालांकि पच्चीस सालों का अंतराल बहुत होता है। इस दौरान हम कभी नहीं मिले, क्योंकि कॉलेज खत्म होते ही मेरी शादी हो गई और इंदु का उद्देश्य पीएससी की तैयारी करके सिविल सेवा में जाने का था। उसके घरवालों का भी यही सोचना था। सो...
 

पनघट

गांव के पनघट पर उल्लसित सजी युवतियां अपने-अपने घड़े भर कर जा चुकी थीं। एक अलबेली छबीली अभी घड़े में फंदा डाल ही रही...

अस्तित्व

विभा सिंह, चिरमिरी, छत्तीसगढ़ दो बज गए थे। मैं जल्दी-जल्दी घर की तरफ कदम बढ़ाने लगी। पति जब से रिटायर हुए हैं,...
 
 
 

मासूम

सुबह से ही अस्पताल के बरामदों में उसकी आवाज सुनाई देने लगती है। ‘चाय-चाय-चाय.।’ बहुत सवेरे ही वह नहा-धोकर तैयार हो...

अच्छे लोग!

चूल्हे पर आखिरी रोटी सिकने वाली थी। लकड़ी के कोयले लाल सुर्ख जल रहे थे। ‘बापू ये आग कितनी सुंदर लगती है।’ तवा...
 
 

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  • August 10, 11:59
     
    हिंदी के महाप्राण, युग प्रवत्र्तक, सुप्रसिद्ध महाकवि पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी निराला कवयित्री महादेवी वर्मा के मुंहबोले भाई थे। एक बार वे रक्षाबंधन के दिन सुबह-सुबह आ पहुंचे अपनी लाडली बहन के घर और रिक्शा रुकवाकर चिल्लाकर द्वार से बोले, ‘दीदी जरा बारह रुपए तो लेकर आना।’ आवाज सुनकर महादेवी तुरंत रुपए लेकर बाहर आईं। उन्होंने पूछा, ‘ये तो बताओ भैया, यह सुबह-सुबह बारह रुपए की...
     

  • August 10, 11:24
     
    भागते शहर की बेतरतीब जिंदगी से दूर नीली बैगनी क्षितिज रेखा के उस पार एक गांव बसा था। यह गांव अपने नाम से उतना प्रसिद्ध नहीं था, जितना इसके एक छोर पर बने खंडित शिवाले के कारण। न सिर्फ इस गांव के लोग बल्कि आसपास के दस गांवों में खंडित शिवाले को लोग बरम बाबा (ब्रह्मा बाबा) के नाम से पुकारते थे। गांव के बूढ़े बरगद की निचली कोटर में बना किसी अनजाने अनचीन्हे भक्त की श्रद्धा का प्रतीक यह...
     

  • August 6, 03:24
     
    ‘ताऊजी को किसी मित्र के यहां शादी में जाना था। उसी दिन हम सभी यानी आप, हम दोनों भाई और छोटी चाची अपनी दोनों बेटियों के साथ ताऊजी के यहां पहुंच जाते थे। सरकारी क्वार्टर था उनका, पिछवाड़े बड़ा-सा बगीचा, जिसमें आम और जामुन के पेड़ थे। आगे भी काफी खुली जगह थी, जिसे चारों ओर से मेहंदी की बागड़ लगाकर ताऊजी ने बैठने के लिए बगीचा-सा बना लिया था। सरकारी क्वार्टर का अपना अलग ही सुख होता है।...
     

  • July 27, 05:27
     
    नागपुर ‘कनु तुम्हारी बिंदी कहां है? सुबह-सुबह सूना माथा अच्छा नहीं लगता!’ मुझे बगीचे में टहलते देख पड़ोस की माया आंटी दीवार से लगे मोगरे की बेल से फूल तोड़ते हुए पूछ रही थीं। तभी पीछे से जम्हाई लेते परेश आए और कहने लगे, ‘अरे आंटी, कनु की बिंदी माथे पर कम तकिए के गिलाफ में, सोफे के हत्थे पर, ड्रेसिंग टेबल, अलमारियों के आइने में या बाथरूम की टाइल्स में •यादा लगी होती हैं।’ तभी माया आंटी...
     

  • July 13, 10:53
     
    प्राणदायनी हवा जब मेहरबान होती है, तो कहां किसी को ख्याल आता है उसका।जब घुटन बढ़े, हवा रूठी-रूखी हो जाए, तो याद आती हैं वो मेहरबानियां। Êिांदगी भी ऐसे मोड़ ले आती है कभी-कभी। ‘जैसे हवा है...उसी से तो सांस लेते हैं, ज़िंदा रहते हैं, लेकिन उसके बारे में कभी सोचते हैं क्या? बस हवा है, तो है..। लेकिन कभी सोचा है, जब हवा नहीं होती, तो कैसी घुटन हो जाती है।’ मन्नू भंडारी, ‘एक कहानी यह भी’ पुस्तक में...
     
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