विभा सिंह, चिरमिरी, छत्तीसगढ़
दो बज गए थे। मैं जल्दी-जल्दी घर की तरफ कदम बढ़ाने लगी। पति जब से रिटायर हुए हैं,...
सुबह से ही अस्पताल के बरामदों में उसकी आवाज सुनाई देने लगती है। ‘चाय-चाय-चाय.।’ बहुत सवेरे ही वह नहा-धोकर तैयार हो...
चूल्हे पर आखिरी रोटी सिकने वाली थी। लकड़ी के कोयले लाल सुर्ख जल रहे थे। ‘बापू ये आग कितनी सुंदर लगती है।’ तवा...
भागते शहर की बेतरतीब जिंदगी से दूर नीली बैगनी क्षितिज रेखा के उस पार एक गांव बसा था। यह गांव अपने नाम से उतना...
नागपुर
‘कनु तुम्हारी बिंदी कहां है? सुबह-सुबह सूना माथा अच्छा नहीं लगता!’ मुझे बगीचे में टहलते देख पड़ोस की माया आंटी दीवार से लगे मोगरे की बेल से फूल तोड़ते हुए पूछ रही थीं। तभी पीछे से जम्हाई लेते परेश आए और कहने लगे, ‘अरे आंटी, कनु की बिंदी माथे पर कम तकिए के गिलाफ में, सोफे के हत्थे पर, ड्रेसिंग टेबल, अलमारियों के आइने में या बाथरूम की टाइल्स में •यादा लगी होती हैं।’
तभी माया आंटी...
प्राणदायनी हवा जब मेहरबान होती है, तो कहां किसी को ख्याल आता है उसका।जब घुटन बढ़े, हवा रूठी-रूखी हो जाए, तो याद आती हैं वो मेहरबानियां। Êिांदगी भी ऐसे मोड़ ले आती है कभी-कभी।
‘जैसे हवा है...उसी से तो सांस लेते हैं, ज़िंदा रहते हैं, लेकिन उसके बारे में कभी सोचते हैं क्या? बस हवा है, तो है..। लेकिन कभी सोचा है, जब हवा नहीं होती, तो कैसी घुटन हो जाती है।’ मन्नू भंडारी, ‘एक कहानी यह भी’ पुस्तक में...