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  • यात्राओं से झांकता वैभवशाली अतीत
    यात्रा और जीवन, जीवन और यात्रा मिलते-बिछुड़ते साथ-साथ चलते। यात्रा तो आपने भी की होगी पर उनकी मंजिल निश्चित रही होगी। मंजिल तक पहुंचने के लिए रास्ते पहले से ही बने-बनाए होंगे। केवल उस पर चलकर अपनी मंजिल को पा लेना भर था। पर इतनी सरल यात्रा भी हममें से ज्यादातर लोगों को कठिन लगती है। कभी-कभी पहुंचने की जल्दी में हम यात्रा करने के आनंद को ही खो देते हैं। पर कुछ लोगों ने अपने जीवन में ऐसी यात्राएं की हैं, जिनकी मंजिल तो तय थी पर रास्ते नहीं। उन्होंने अपने रास्ते पहाड़ों के शिखर और समुद्री तूफानों के...
    April 20, 05:04 AM
  • पथिक, यात्रा, पड़ाव और जीवन
    मुंह अंधेरे ही उठना होता है ..सड़क कहीं बहुत आगे जमीन में नीचे की तरफ जाती दिखती है। मैंने चाहा था कि देखा जाए दूर दिखती नीचे की तरफ जाती सड़क आखिर जाती कहां है? चलते-चलते भी सपाट ही रही। मैं भी चलता रहा सड़क का छोर कहीं हाथ आ जाए ..दिख तो रहा है मगर छूना कैसे होगा उसे.. छोर का रंग न जाने कब बदल जाता है.. मेरा मैं लगातार पीछा कर रहा है, आखिर ये सड़क जाती कहां है? कैसे जानें.. तो दरवेश बन ढूंढ़ना है। निर्मल वर्मा कहीं कुंभ के संदर्भ में लिखते हैं, मैं सोचता नहीं, सिर्फ घिसटता जाता हूं। गंगा मेरे साथ बह रही है,...
    April 20, 05:00 AM
  • यह भारत, यह विश्व नए रूप में प्रकट हो!
    प्राचीन भारतीय बड़े यात्री थे। पुराने ग्रंथों में इन यात्राओं के प्रमाण बिखरे पड़े हैं। हमारे सारे महाकाव्य व प्राचीन ग्रंथ रामायण, महाभारत, उपनिषद, वेद आदि का विश्लेषण करें तो ये यात्रा-साहित्य का एक बड़ा जखीरा हैं। सारे प्राचीन ग्रंथों में दुर्गम वन-प्रांतरों, जंगलों, घाटी-क्षेत्रों, समुद्रों, नदियों, ग्रामों, जनपदों की यात्राओं और भौगोलिक विशिष्टताओं का बड़ा ही विपुल वर्णन है। दरअसल वेद से लेकर रामायण तक कुल मिलाकर एक ही कहानी है वह है भारतीय उपमहाद्वीप में जंगलों को साफ करने, गांवों को...
    April 20, 05:00 AM
  • यहीं उतरे थे परमात्मा के इकलौते पुत्र
    गेग्हार्द मठ गारनी से कोई दस किलोमीटर ही दूर है। बारहवीं-तेरहवीं सदी में यूरोप में ईसाई संतों ने ऐसे अनेक मठ यूरोप भर में बनाए थे। इस मठ को फलक-मठ (मॉनेस्ट्री ऑफ लांस) भी कहते हैं, क्योंकि यहां लोंजाइनस नाम के उस रोमन सैनिक के उस भाले का फलक (लांस) सुरक्षित था, जिससे उसने क्रॉस पर लटके जीसस की देह को कोंचा था। संत थादेदस और संत बॉर्थोलोयू इस फलक को आरमीनिया लाए थे। बाद में यह फलक एजमीआजीन चर्च ले जाया गया। मैंने इसके दर्शन वहीं किए, और भी रेलिक्स (पवित्र अवशेष) देखे। रेलिक्स ही नहीं, इस तरह के मठ...
    April 20, 05:00 AM
  • डैफोडिल याद आने लगे
    कभी-कभी ऐसा होता है कि कल्पनातीत बातें भी अचानक साकार हो जाती हैं और कभीकभी ऐसा भी कि हर दिन नसीब होने वाली चीज भी कल्पना बन जाती है। इंग्लैंड की यात्रा मेरी कल्पना से बाहर नहीं थी, पर मैं वर्ड्सवर्थ के घर को अपनी आंखों से देख पाऊंगी, जमीन के उन हिस्सों पर कदम रखूंगी जिन पर कभी प्रकृति का वह चितेरा चला और घूमा था ऐसा मैं सपने में भी नहीं सोच सकती थी। मन का कौन-सा कोना होता है जहां ऐसी ख्वाहिशें छुपकर सांस लेती हैं और हमें पता भी नहीं चलता। एक दिन अनायास ऐसा घटित हो जाता है तो हमें लगता है कि यह इच्छा...
    April 20, 05:00 AM
  • भोली सी सूरत..
    नृत्य, सौंदर्य, अभिनय, मुस्कान.. उसका जादू रुपहले परदे से कैनवास तक बिखरा है! उसकी नृत्यकला अभिनय की आंच में पकती है और उसका अभिनय उसके नृत्य की धूप में निखर उठता है.. शायद इसीलिए लोग उसे दीवा कहते हैं। और उसकी सफलता से मुग्ध आधी दुनिया कह उठती है मैं माधुरी दीक्षित बनना चाहती हूं.. पर कोई माधुरी कैसे हो! वे तो एक ही हैं.. अद्वितीय, असाधारण और अनन्य!!! पढ़िए अपनी जीवनकथा के पन्ने पलटती इस मोहिनी नायिका को.. मुझे शुरू से ही परफ़ार्मेस का क्रेज था। डांस का क्रेज था। स्कूल, कॉलेज के हर कार्यक्रम में जमकर...
    March 20, 05:17 PM
  • दिल का मिजाज इश्क़िया है
    अभिषेक चौबे की हिट फिल्म इश्क़िया की अगली कड़ी डेढ़ इश्क़िया आजकल सिनेमाघरों में जलवे दिखा रही है। यों तो फिल्मों के बारे में प्रेमराग में बातें नहीं होती हैं, फिर भी इस फिल्म का जो फलसफाना किरदार है, वह इस बाबत हमें बार बार बहसतलब करता है। फिल्म एक खास तरीके से इस बात को तवज्जो देती है कि हर इश्क़ के सात मक़ाम होते हैं और इन्हीं मक़ामात से गुजरकर इश्क़ अपने उफ़क़ तक पहुंचता है। ये मक़ामात हैं दिलकशी, उन्स, मोहब्बत, अक़ीदत, इबादत, जुनून और मौत। पता नहीं, फिल्म में इस कॉन्सेप्ट को कहीं से उधार लिया गया है या यह...
    March 20, 04:16 PM
  • तलाशिए एक बीज सुख का...
    करात ने कहा, ख़ुद को जान लेना ही सुख है। तो प्लेटो ने माना, गूढ़ अर्थो को समझ लेना सुख है। अरस्तू ने बतलाया कि सुख तर्क है। जबकि एपीक्यूरस ने समझाया सरलता सुख है। स्टॉकिंस का सुख प्रयोजनवादी था तो चार्वाक का नास्तिक.. वेदांत ने यही सुख मुमुक्षत्वं में खोजा तो बुद्ध ने करुणा में, महावीर ने अहिंसा में, ईसा ने ईश्वर के बंदों में और नानक ने रब की मर्जी में.. फ्रायड, डार्विन, मिल या स्पेंसर, जितनी दृष्टि उतने दर्शन, लेकिन सुख तब भी अपरिभाषित ही रहा। सुख की चर्चा करते हुए, जाने क्यूं, आज वो सज्जा पंखिया बहुत...
    March 20, 04:08 PM
  • जितना बड़ा संघर्ष उतना बड़ा सुख..
    जो बसे हैं वे उजड़ते हैं प्रकृति के जड़ नियम सेपर किसी उजड़े हुए को फिर बसाना कब मना है- है अंधेरी रात पर दिवा जलाना कब मना है- हरिवंश राय बच्चन पृथ्वी पर जब से जीवन है, तब से संसार के सभी जीवों का एक मात्र उद्देश्य है सुख प्राप्त करना। संसार भर में जितने भी कार्य हो रहे हैं, फिर वह युद्ध ही क्यों न हो, सभी इसी के लिए हैं। मानव ने सुख की अपनी अपनी परिभाषाएं गढ़ ली हैं। भारतीय, पाकिस्तानी, अमेरिकी, फ्रांसीसी या विश्व के किसी भी देश, धर्म, जाति, वर्ग का मानव, हर कोई भटक रहा है, सुख की तलाश में, जो पूरी होती...
    March 20, 04:03 PM
  • मित्र! चल सृजन करें
    मानव! मानव जीवन!! मानवीय संबंधों की चरम अवस्था मित्रता। यह सृजन की प्रक्रिया है, जो तब और निखरेगी जब यह मानव के सांस्कृतिक विकास के चरण में महत्वपूर्ण भूमिका में होगी। जीवन के नव सृजन का शंखनाद करने वाली मित्रता मानव संस्कृति की महानतम उपलब्धि है। भारत में आर्थिक और राजनीतिक संक्रमण और संकट की तो बात लगातार की जाती है पर बहुत कम लोगों को एहसास है कि सांस्कृतिक संकट और गहरा तथा निर्णायक है। यह संकट उन समाजों में भी रिस रहा है जहां फिलहाल आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था ठीक ठाक दिखाई देती है।...
    February 24, 03:08 PM
  • एक महान रुपांतरण घटित होने को है!
    अतीत में बहुत से भविष्यद्रष्टा दुनिया के खत्म होने की भविष्यवाणियां करते रहे हैं। यही नहीं उन्होंने दिन और साल तक तय कर दिए थे। बहुत से विचारक इस बात से चिंतित रहे हैं कि मानवजाति अब इस चरण में पहुंच गई है कि वह अपना विनाश कर लेगी। यह भी माना जाता रहा है कि यदि मनुष्य नहीं तो प्रकृति में ही कुछ ऐसी बड़ी उथलपुथल होगी कि पृथ्वी पर जीवन खत्म हो जाएगा। ऐसी सारी भविष्यवाणियां धरती पर मानव जीवन की वास्तविक यात्रा की उपेक्षा करती रहीं और उनका आधार प्राय: जीवन के वे नकारात्मक पहलू रहे हैं, जो बहुत...
    January 21, 01:04 PM
  • सचिन का सच!
    वे 20 सेकेंड! सचिन विकेट पर पहुंचते हैं तो एकबारगी सारे मैदान पर, क्षेत्ररक्षकों की स्थिति पर नार डालते हैं, फिर गार्ड लेते हैं.. फिर होता है एक कोई 15-20 सेकेंड का वक्त जब सचिन बल्ले से पिच के आसपास का इलाका ठोकते, वहां की मिट्टी जमाते, कोई खरपतवार हटाते नजर आते हैं। वे 15-20 सेकेंड गुजर जाएं तो फिर सचिन खेल के लिए तैयार होते हैं! क्या हैं ये 15-20 सेकेंड? बकौल सचिन : मैं जब भी मैदान में उतरता हूं, इतना तेज शोर होता है, सैकड़ों लोग अपनी जगह से खड़े हो जाते हैं, तालियां-सीटियां बजाते हैं। विकेट पर पहुंचकर, अगल-बगल...
    December 19, 03:43 PM
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