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  • खुले पंख चेतना के
    यह बल्गारिया की राजधानी सोफिया थी, जहां के ओवरब्रिज के नीचे से भारत से गए हम चार लोगों का समूह जैसे ही निकलकर बाहर आने के करीब था कि लगभग छह-सात बल्गेरियन लड़कियों का झुंड हाथ जोड़कर नमस्ते कहते हुए हम लोगों के सामने अचानक प्रकट हुआ और आई लव यू कहने के बाद वहां के माहौल को एक सुहावनी-खिलंदड़ी हंसी से सराबोर कर दिया। दरअसल उनका यह आई लव यू हमारे लिए नहीं, बल्कि उस देश के लिए था, जहां से हम उनके देश में गए हुए थे, जैसा कि उन्हीं में से एक ने कहा था आपके देश में राधा हुई थी और कृष्ण भी। जाहिर है कि उसके...
    August 20, 01:32 PM
  • भारत एक अनंत संभावना है..
    भारत क्या है? क्या एक देश? एक सभ्यता? एक संस्कृति? कैसा है यह देश, यह सभ्यता, यह संस्कृति? हम लंबे अरसे तक जानते ही न थे कि हम यह देश हैं, फिर जानना शुरू किया तो विदेशियों के नजरिए से खुद को देखा, और गलत जाना। जब बोध हुआ तो अपने नजरिए तलाशने शुरू किए और अपने बारे में ढेरों गलतफहमियां गढ़ लीं। परिणाम यह हुआ कि एक पराजित हीनताबोध और एक मिथ्या श्रेष्ठता ग्रंथि के तहत आज हम इस देश को जानते हैं। इसमें अपने अस्तित्व के बारे में हम या तो उदासीन हैं, या आज भी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त हैं या फिर अतीत के...
    August 20, 01:30 PM
  • ऐसे उजड़े कि फिर न बस सके
    (प्रतीकात्मक फोटो) पेरिस से करीब 180 मील दूर, क्यूस नदी के किनारे बसा यह कस्बा कभी जीवन के कलरव से गूंजता था, लेकिन कहते हैं कि आज यहां भूतों का बसेरा है। पर.. यह भूत और कौन हो सकता है सिवाय अतीत के! जो भी हो, फिलहाल इस कस्बे को पर्यटन की चीज बना दिया गया है, ताकि आने वाले यहां के भूत और वर्तमान को तोलते हुए मर्माहत भले न हों, पर युद्ध के विचार पर एक बार पुनर्विचार अवश्य कर सकें। फ्रांस के इस कस्बे का नाम है वेर्डन। इसके दक्षिण पूर्व में करीब चार मील पर डायमोंट नाम का एक खुशहाल गांव हुआ करता था। जहां कुल...
    July 21, 02:04 PM
  • 1914 से 2014 महायुद्ध एक सदी
    एक महायुद्ध की एक सदी पूरी हुई। उससे जुड़े विमर्शो और आकलनों की भी एक सदी पूरी हुई। दरअसल, जिस समय मानवीय उदारता के प्रति स्वयं मानव के विश्वास को खंडित और क्षत-विक्षत करने वाली यह घटना घटित हो रही थी, उस समय विश्व, मस्तिष्क से अधिक आंख थी और जो विचार थे भी वह आंख के देखे हुए को ही कह रहे थे। विचार की सही-सही स्थितियां बाद में पैदा हुईं। उस समय पैदा हुईं, जब समय का सब-कुछ आंखों के आगे से गुजरकर संपूर्ण रूप में मस्तिष्क तक पहुंचा। पिछले सौ वर्षो में लगभग 25 हजार विचारपरक पुस्तकें, लाखों विद्वतापूर्ण...
    July 21, 01:46 PM
  • तेवर में नया या तकनीक में?
    फ़िल्म में कोई नारा भी नहीं था और चीखती संवादबाजी भी नहीं थी। एक शांत बहते सोते की तरह फ़िल्म शुरू होती है और अछूत मानसिकता पर चोट करती हुई पूरी हो जाती है। सुजाता देखी तो पहली बार यह बात समझ में आई कि सिनेमा के सामाजिक संदर्भ की बात जब हम करते हैं, तब कैसा सिनेमा हमसे कैसे बात करता है। ब्राह्मण युवक अधीर (सुनील दत्त) और कहीं अनाथालय से गोद ली गई अछूत बालिका सुजाता (नूतन) के बीच पनपते संबंधों को लेकर छूत-अछूत मानसिकता की विकृति की पूरी कहानी बिमल रॉय ने जिस तरह कही है, उसके बाद यह पूछना कई अर्थो में...
    June 20, 03:49 PM
  • समझो कि सवेरा दूर नहीं
    शोर बनता जा रहा है संगीत गीत कालजयी बने अब इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। सभी चाहते हैं कि कोई एक ऐसा गाना मिल जाए, जो एक महीने तक ही लोगों को याद रहे। जमकर उसे बजाएं, उस पर नाचें फिर चाहे उसे भूल जाए। उन्हें फर्क नहीं पड़ता है। यही वजह है कि लोगों का ध्यान गानों पर आकर्षित करने के लिए धड़ल्ले से अपशब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है। निजी तौर पर मैं इस चलन के खिलाफ हूं और ऐसे गीतों से दूर रहना ही पसंद करती हूं। संगीत अब शोरशराबे में बदलता जा रहा है, क्योंकि हम पश्चिम के संगीत से प्रभावित हो रहे...
    June 20, 03:45 PM
  • बदल गया अंदाज
    मुझे आज के फिल्मकारों पर पूरा विश्वास है। आजकल के फिल्मकार उन विषयों पर फिल्में बना रहे हैं, जो रियल हैं। फिल्में हमारे वक्त भी बनती थीं। उस वक्त भी विषय होते थे, लेकिन आज उन फिल्मों को देखो, तो लगता है कहीं कोई कमी रह गई। उस वक्तफिल्मों में हम विषय में ड्रामेबाजी ज्यादा कर देते थे। आज के फिल्मकार इससे उलट हैं। वह मैच्योर सिनेमा दिखा रहे हैं। उन्हें ड्रामेबाजी नहीं दिखानी, जो है सो है। वह ज्यों-का-त्यों रख रहे हैं। फिल्मों का दौर इस लिहाज से भी बदला है कि अब डाकिया डाक लाया.. जैसे गाने नहीं बन सकते,...
    June 20, 12:49 PM
  • जिसे भाग जाने से भय है..
    कौन है वो, जो चिड़िया की मुस्कुराहट की परवाह करता है? कहते हैं वो नायक है। नायक हर समाज की संरचना का मूल अंश है। काल बदलते हैं, मगर नायक का स्वरूप नहीं बदलता। उसकी अहमियत के तत्व नहीं बदलते हैं। अगर नायक पर लिखना हो, तो यूं तो बहुत आसान है, जैसे किसी विषय पर अक्सर लिखा जाता है कि उसके तत्व और कुछ उदाहरण ताकिपाठक को आसानी से समझ आए.. मगर फिर वो गलत होगा, जो सदियों से दिख रहा है, कहा गया है, क्या वही, बस वही नायक है? अगर ऐसा है तो यह चर्चा यहीं खत्म हो जानी चाहिए, सभी जानते हैं। चलिए, पहले थोड़ा-सा संवाद को...
    May 30, 10:02 AM
  • नायक रास्तों का अनुसरण नहीं करते
    जब-जब धर्म की हानि होगी मैं जन्म लूंगा। मैं कौन? एक नायक, जो असत् का विनाश कर सत्य और न्याय का पुनर्सृजन करेगा। गीता के इस आश्वासन को थामे समय ने घोर बेचैनियों के बीच सदैव नायकों की राह तकी है, और उसकी यह प्रतीक्षा हर काल, हर समय, हर इतिहास में पूरी भी हुई है। समय की कराह पर भीड़ के बीच से हर बार कोई नायक उभरा है। नायकत्व के अतीत को टटोलना शुरू करें तो पता चलता है कि नायकों का अस्तित्व तब से रहा है, जब से मानव ने समूह में रहना शुरू किया। मनोविज्ञान की मानें तो हर व्यक्ति में एक नायक होता है, लेकिन उसका...
    May 30, 09:57 AM
  • नायकत्व यानी ऊर्जा का सकारात्मक निवेश
    अक्सर लोग कहते हैं कि अपनी कहानी का हीरो बनना इतना आसान नहीं होता। सवाल यह है कि फिर आसान क्या है? अपनी कमियों, ख़ामियों और असफलताओं के लिए दुनिया को दोष देना? नहीं.. हीरो होने का मतलब है, दायित्व उठाना। अपने हर सही-गलत निर्णय का, अपनी हर सफलता-असफलता का, अपनी हर ख़ूबी और ख़ामी का दायित्व उठाने का साहस! हम उसी क्षण अपने जीवन के नायक होने लगते हैं, जिस क्षण जान लेते हैं कि हमारे सपनों, महत्वाकांक्षाओं और लक्ष्यों की जिम्मेदारी सिर्फ़ और सिर्फ़ हमारी है। कहते हैं, जिन खोजा तिन पाइयां.. यानी जिसने खोजा...
    May 30, 09:54 AM
  • यात्राओं से झांकता वैभवशाली अतीत
    यात्रा और जीवन, जीवन और यात्रा मिलते-बिछुड़ते साथ-साथ चलते। यात्रा तो आपने भी की होगी पर उनकी मंजिल निश्चित रही होगी। मंजिल तक पहुंचने के लिए रास्ते पहले से ही बने-बनाए होंगे। केवल उस पर चलकर अपनी मंजिल को पा लेना भर था। पर इतनी सरल यात्रा भी हममें से ज्यादातर लोगों को कठिन लगती है। कभी-कभी पहुंचने की जल्दी में हम यात्रा करने के आनंद को ही खो देते हैं। पर कुछ लोगों ने अपने जीवन में ऐसी यात्राएं की हैं, जिनकी मंजिल तो तय थी पर रास्ते नहीं। उन्होंने अपने रास्ते पहाड़ों के शिखर और समुद्री तूफानों के...
    April 20, 05:04 AM
  • पथिक, यात्रा, पड़ाव और जीवन
    मुंह अंधेरे ही उठना होता है ..सड़क कहीं बहुत आगे जमीन में नीचे की तरफ जाती दिखती है। मैंने चाहा था कि देखा जाए दूर दिखती नीचे की तरफ जाती सड़क आखिर जाती कहां है? चलते-चलते भी सपाट ही रही। मैं भी चलता रहा सड़क का छोर कहीं हाथ आ जाए ..दिख तो रहा है मगर छूना कैसे होगा उसे.. छोर का रंग न जाने कब बदल जाता है.. मेरा मैं लगातार पीछा कर रहा है, आखिर ये सड़क जाती कहां है? कैसे जानें.. तो दरवेश बन ढूंढ़ना है। निर्मल वर्मा कहीं कुंभ के संदर्भ में लिखते हैं, मैं सोचता नहीं, सिर्फ घिसटता जाता हूं। गंगा मेरे साथ बह रही है,...
    April 20, 05:00 AM
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