अहा ज़िंदगी
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  • मैं चाहे ये करूं मैं चाहे वो करूं मेरी मर्जी
    आजकल दिगदिगंत औरतों की आवाजों से गूंज रहे हैं। अधिकतर आवाजें तो औरतों की ही हैं। वे हैं टीवी पर, रेडियो पर, लोकसभा में, अस्पताल में, बिजनेस स्कूल में, राज्यसभा में, पक्ष और विपक्ष के नेताओं के रूप में, पुलिस और सेना की वर्दी में, अंतरिक्ष में, हर कहीं। हमारे यहां पश्चिम की तरह औरतों को मीडिया बैशिंग नहीं झेलनी पड़ी है, न ही वोट के अधिकार के लिए सत्तर वर्ष तक संघर्ष करना पड़ा है। अमेरिका में औरतों को वोट देने का अधिकार मिलने में सत्तर वर्ष लग गए थे। तब वहां के लोग वोट का अधिकार मांगने वाली औरतों का...
    October 20, 06:24 PM
  • भावनाओं और नियंत्रण का खेल
    तकनीक के साथ-साथ हमारा वास्तविक जीवन और हमारा वचरुअल चेहरा लगभग एक हो गए हैं। हमें नहीं पता है कि हम कहां खत्म होते हैं और हमारी फेसबुक जिंदगी कहां शुरू होती है और खतरा यहीं कहीं बीच में मंडरा रहा होता है। हाल ही में एक खबर पढ़ी। देहरादून की एक महिला फेसबुक पर किसी से मिली और दोस्ती में उन्हें एक करोड़ रुपए दे भी दिए। उनके फेसबुक फ्रेंड बुजुर्गो के लिए एक आश्रम खोलना चाहते थे। मामला फर्जी निकला। महिला अपने पैसे खो बैठी और उनके फ्रेंड पैसे लेकर फरार हो गए। आप सोच सकते हैं कि यह महिला बेवकूफ थी,...
    September 24, 03:43 PM
  • फेसबुक लम्हा-लम्हा दर्ज होती जिंदगी
    यह इंस्टेंट कॉफी का जमाना है। हर चीज इंस्टेंट। सुख, दुख, प्रेम, विरह, रचनाधर्मिता, कला, कविता, कहानी, फोटोग्राफी, समीक्षा, आंदोलन, खबरें, गॉसिप, गुटबाजी सब कुछ इंस्टेंट। फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप और न जाने क्या-क्या। बात दिमाग में पूरी तरह आ भी नहीं पाती कि चौराहे पर टंग जाती है। बात पूरी समझ भी नहीं पाते हैं कि लाइक्स और कमेंट्स की भीड़ बढ़ने लगती है। अजीब-सा नशा है इसमें.. नशा.. हां, नशा ही तो है.. इस कदर नशा कि एक भी पल इसके बिना रहना मुश्किल लगता है। काश कोई हमें सुन लेता, वहां से जहां शब्दों का कोई काम...
    September 24, 03:25 PM
  • खुले पंख चेतना के
    यह बल्गारिया की राजधानी सोफिया थी, जहां के ओवरब्रिज के नीचे से भारत से गए हम चार लोगों का समूह जैसे ही निकलकर बाहर आने के करीब था कि लगभग छह-सात बल्गेरियन लड़कियों का झुंड हाथ जोड़कर नमस्ते कहते हुए हम लोगों के सामने अचानक प्रकट हुआ और आई लव यू कहने के बाद वहां के माहौल को एक सुहावनी-खिलंदड़ी हंसी से सराबोर कर दिया। दरअसल उनका यह आई लव यू हमारे लिए नहीं, बल्कि उस देश के लिए था, जहां से हम उनके देश में गए हुए थे, जैसा कि उन्हीं में से एक ने कहा था आपके देश में राधा हुई थी और कृष्ण भी। जाहिर है कि उसके...
    August 20, 01:32 PM
  • भारत एक अनंत संभावना है..
    भारत क्या है? क्या एक देश? एक सभ्यता? एक संस्कृति? कैसा है यह देश, यह सभ्यता, यह संस्कृति? हम लंबे अरसे तक जानते ही न थे कि हम यह देश हैं, फिर जानना शुरू किया तो विदेशियों के नजरिए से खुद को देखा, और गलत जाना। जब बोध हुआ तो अपने नजरिए तलाशने शुरू किए और अपने बारे में ढेरों गलतफहमियां गढ़ लीं। परिणाम यह हुआ कि एक पराजित हीनताबोध और एक मिथ्या श्रेष्ठता ग्रंथि के तहत आज हम इस देश को जानते हैं। इसमें अपने अस्तित्व के बारे में हम या तो उदासीन हैं, या आज भी औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त हैं या फिर अतीत के...
    August 20, 01:30 PM
  • ऐसे उजड़े कि फिर न बस सके
    (प्रतीकात्मक फोटो) पेरिस से करीब 180 मील दूर, क्यूस नदी के किनारे बसा यह कस्बा कभी जीवन के कलरव से गूंजता था, लेकिन कहते हैं कि आज यहां भूतों का बसेरा है। पर.. यह भूत और कौन हो सकता है सिवाय अतीत के! जो भी हो, फिलहाल इस कस्बे को पर्यटन की चीज बना दिया गया है, ताकि आने वाले यहां के भूत और वर्तमान को तोलते हुए मर्माहत भले न हों, पर युद्ध के विचार पर एक बार पुनर्विचार अवश्य कर सकें। फ्रांस के इस कस्बे का नाम है वेर्डन। इसके दक्षिण पूर्व में करीब चार मील पर डायमोंट नाम का एक खुशहाल गांव हुआ करता था। जहां कुल...
    July 21, 02:04 PM
  • 1914 से 2014 महायुद्ध एक सदी
    एक महायुद्ध की एक सदी पूरी हुई। उससे जुड़े विमर्शो और आकलनों की भी एक सदी पूरी हुई। दरअसल, जिस समय मानवीय उदारता के प्रति स्वयं मानव के विश्वास को खंडित और क्षत-विक्षत करने वाली यह घटना घटित हो रही थी, उस समय विश्व, मस्तिष्क से अधिक आंख थी और जो विचार थे भी वह आंख के देखे हुए को ही कह रहे थे। विचार की सही-सही स्थितियां बाद में पैदा हुईं। उस समय पैदा हुईं, जब समय का सब-कुछ आंखों के आगे से गुजरकर संपूर्ण रूप में मस्तिष्क तक पहुंचा। पिछले सौ वर्षो में लगभग 25 हजार विचारपरक पुस्तकें, लाखों विद्वतापूर्ण...
    July 21, 01:46 PM
  • तेवर में नया या तकनीक में?
    फ़िल्म में कोई नारा भी नहीं था और चीखती संवादबाजी भी नहीं थी। एक शांत बहते सोते की तरह फ़िल्म शुरू होती है और अछूत मानसिकता पर चोट करती हुई पूरी हो जाती है। सुजाता देखी तो पहली बार यह बात समझ में आई कि सिनेमा के सामाजिक संदर्भ की बात जब हम करते हैं, तब कैसा सिनेमा हमसे कैसे बात करता है। ब्राह्मण युवक अधीर (सुनील दत्त) और कहीं अनाथालय से गोद ली गई अछूत बालिका सुजाता (नूतन) के बीच पनपते संबंधों को लेकर छूत-अछूत मानसिकता की विकृति की पूरी कहानी बिमल रॉय ने जिस तरह कही है, उसके बाद यह पूछना कई अर्थो में...
    June 20, 03:49 PM
  • समझो कि सवेरा दूर नहीं
    शोर बनता जा रहा है संगीत गीत कालजयी बने अब इस ओर किसी का ध्यान नहीं जाता है। सभी चाहते हैं कि कोई एक ऐसा गाना मिल जाए, जो एक महीने तक ही लोगों को याद रहे। जमकर उसे बजाएं, उस पर नाचें फिर चाहे उसे भूल जाए। उन्हें फर्क नहीं पड़ता है। यही वजह है कि लोगों का ध्यान गानों पर आकर्षित करने के लिए धड़ल्ले से अपशब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है। निजी तौर पर मैं इस चलन के खिलाफ हूं और ऐसे गीतों से दूर रहना ही पसंद करती हूं। संगीत अब शोरशराबे में बदलता जा रहा है, क्योंकि हम पश्चिम के संगीत से प्रभावित हो रहे...
    June 20, 03:45 PM
  • बदल गया अंदाज
    मुझे आज के फिल्मकारों पर पूरा विश्वास है। आजकल के फिल्मकार उन विषयों पर फिल्में बना रहे हैं, जो रियल हैं। फिल्में हमारे वक्त भी बनती थीं। उस वक्त भी विषय होते थे, लेकिन आज उन फिल्मों को देखो, तो लगता है कहीं कोई कमी रह गई। उस वक्तफिल्मों में हम विषय में ड्रामेबाजी ज्यादा कर देते थे। आज के फिल्मकार इससे उलट हैं। वह मैच्योर सिनेमा दिखा रहे हैं। उन्हें ड्रामेबाजी नहीं दिखानी, जो है सो है। वह ज्यों-का-त्यों रख रहे हैं। फिल्मों का दौर इस लिहाज से भी बदला है कि अब डाकिया डाक लाया.. जैसे गाने नहीं बन सकते,...
    June 20, 12:49 PM
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