रसरंग
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  • घाटे के सौदे से चाहिए अन्नदाता को मुक्ति
    सरकार कहती है जमीन लेकर रहेंगे, विपक्षी कहते हैं किसान जमीन नहीं देना चाहते जबकि सामाजिक संगठनों की चिंता पर्यावरण और खाद्य सुरक्षा को लेकर है। पर किसान इनके सरोकारों के स्वार्थ को खूब समझता है। वह अधिग्रहण और विकास के बीच लाभ में अपनी भरपूर भागीदारी चाहता है, उसे भी गांवों की असुविधाओं से मुक्ति चाहिए इसलिए गांवों में बची किसानों की आखिरी जमात भी अब चौराहों से शहरों की ओर बढ़ने को आतुर है। अधिग्रहण को तैयार किसान! घटती आमदनी के चलते किसान निराश हैं। मोदी सरकार को इस मुद्दे का हल किसानों...
    March 29, 12:00 AM
  • बिन जल, जंगल कैसा जीवन
    दिवस विशेष 21 मार्च : विश्व वानकी दिवस 22 मार्च : विश्व जल दिवस कल विश्व वानिकी दिवस और आज विश्व जल दिवस के दिन सिर्फ वृक्ष और पानी के संरक्षण की चिंता करने से कतई बात नहीं बनेगी। पूरे वर्षभर और अनेक वर्षों तक रोज, दिन-रात हमें सजग होकर जंगलों और पानी के स्रोतों की रक्षा करनी होगी और गांठ बांधनी होगी कि वन है तो हम हैं, जल है तो हम हैं, वरना कुछ नहीं है। करीब दशक भर पहले बुंदेलखंड क्षेत्र में मैं एक चुनाव के सिलसिले में भारी गर्मी में एक गांव से दूसरे गांव भटक रहा था। दूर-दूर तक चिलचिलाती धूप,...
    March 22, 09:28 AM
  • जिसका विकास उसका बजट
    बजट का सामाजिक पक्ष राष्ट्रीय आय अनुमान से काफी कम हुई और राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए ये जरूरी था कि खर्च को कम किया जाए। कुछ खर्चों को कम करने का अख़्तियार वित्तमंत्री के वश में भी नहीं होता, मसलन ब्याज भुगतान या रक्षा बजट। जो कम किया जा सकता है, वो सामाजिक क्षेत्र पर होने वाला व्यय ही है। वित्तमंत्री द्वारा हर वर्ष बजट पेश करना सरकार और मीडिया के लिए एक वार्षिकोत्सव जैसा होता है। बजट के आंकड़ों और घोषणाओं के साथ-साथ सेंसेक्स का उतार-चढ़ाव नाटकीय ढंग से दिखाया जाता है। सरकार और सरकार के...
    March 15, 12:00 AM
  • हाउस वाइफ की मेहनत का नहीं कोई मोल
    अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाज़ार बन चुके भारत में अब तक घरेलू ज़िम्मेदारियां निभाने के लिए किए गए श्रम को कोई सामाजिक-आर्थिक मान्यता नहीं मिली है... देश में 16 करोड़ महिलाओं का मुख्य काम घर की जिम्मेदारियां निभाना है। इसे समाज में भावनात्मक काम के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, इसलिए कभी ये श्रमिक हड़ताल नहीं करते। आप कल्पना कीजिए यदि इनकी हड़ताल हो तो क्या होगा? घर में खाना न बनेगा, सफाई न होगी, बच्चों की देखभाल न हो पाएगी, कपड़े नहीं धुलेंगे, मेहमान-नवाजी नहीं हो...
    March 8, 12:00 AM
  • स्वाइन फ्लू, छोटा रोग बड़ा बाजार
    हमारे देश में इंफ्लुएंजा वैक्सीन और उसके टेस्ट का आज तक बाजार नहीं बन पाया है जबकि अमेरिका, ब्रिटेन की जनता इस वैक्सीन का बहुत प्रयोग करती है। ऑस्ट्रेलिया अपनी जनता को यह वैक्सीन मुफ्त में लगाता है। अंदाजा लगाइए कि अगर 500 रुपए के इस वैक्सीन को लेकर 125 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में नीति बन जाती है तो कितना बड़ा बाजार खड़ा हो जाएगा। हरियाणा के बल्लभगढ़ में हम फ्लू के रिसर्च प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। उसी दौरान मेरी बेटी इंफ्लुएंजा फ्लू से बीमार हो गई। टीम के डॉक्टर साथियों ने राय दी कि हमलोग सबका...
    March 1, 09:27 AM
  • ऑस्कर अवॉर्ड पर रंगभेद के छींटे
    87वें ऑस्कर अवॉर्ड पर विशेष आज लॉस एंजिल्स में जहां एक ओर ऑस्कर अवॉर्ड्स की धूम मचेगी, वहीं कुछ सवाल भी उठेंगे और समानता की दुहाई देने वाले अमेरिका के हॉलीवुड में रंगभेद की गहरी खाई भी साफ-साफ दिखेगी। ऑस्कर पुरस्कारों में अश्वेतों कीउम्दा अभिनय क्षमता और उनकी बेहतरीन फिल्मों को जिस तरह से हाशिए पर डाला जाता रहा है, उससे सवाल यह उठता है कि हॉलीवुड की यह रंगभेदी तस्वीर कभी बदलेगी भी या नहीं? कहने को अमेरिका ने ओबामा को अपने देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर दो बार चुन कर रंगभेद समाप्ति का ऐलान...
    February 22, 12:00 AM
  • हर बार लांघी जाती है लक्ष्मण रेखा
    एआईबी रोस्ट पर उठे विवादों के बाद फिर एक बार कहा जा रहा है कि अभिव्यक्ति के नाम पर कुछ भी कहा और सुना नहीं जा सकता। लेकिन हजारों लोगों ने गालियों और लैंगिक फब्तियों से भरे इस वीडियो को हास्य बताकर देखा, शेयर किया। अब यह वीडियो यू-ट्यूब से हटा लिया गया है। फिर भी सवाल है कि अभिव्यक्ति की लक्ष्मण रेखा क्या हो? क्राइम तो नहीं है एडल्ट कॉमेडी असीम त्रिवेदी वीडियो इंटरनेट पर अपलोड करने की शुरुआत ही चेतावनी के साथ होती है। फिर भी कोई पूरा वीडियो देखता चला जाता है तो ये माना जाना चाहिए कि आहत होने...
    February 15, 12:00 AM
  • प्रेम पर प्रतिष्ठा के पहरे
    वैलेंटाइन डे पर विशेष स्त्री के अन्दर प्रेम एक ऐसी शक्ति होती है जो शरीर में वरदान की तरह रहती है और बिछोह में भी अपना असर दिखाती रहती है। यह विशुद्ध प्यार के तंतुओं से निर्मित होती है तभी तो किसी भी हुक्मरान से भिड़ने का साहस रखती है। उसके पास आघात झेलने के लिए फूल से भी कोमल हृदय होता है मगर चाहतें फौलादी होती हैं। धुऋतु की हर आहट उसके मन में छिपे प्रेम को झकझोर जाती है और वह अपने उल्लसित प्यार को दबाने के लिए बाध्य रहती है क्योंकि उसके कानों में कड़े हुक्म की सांकले झंकारती रहती हैं- स्त्री,...
    February 8, 12:00 AM
  • रगों में बसा है हमारा कश्मीर
    कश्मीरी पंडितों के निर्वासन के 25 साल पर विशेष... अल्पसंख्यकों के अधिकारों की दुहाई देने वालों की आंखों में मोतियाबिंद उतर आता है जब मैं कहता हूं कि कश्मीरी पंडित भी कश्मीर में अल्पसंख्यक थे। 1990 में साढ़े तीन लाख कश्मीरी पंडितों को अपना वो वतन छोड़ना पड़ा जिस जमीन पर उनके पूर्वज हजारों सालों से रह रहे थे। सात सौ से ज्यादा पंडितों की हत्या कर दी गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक कोट इन दिनों बहुत चर्चा में है। सोशल मीिडया पर इस कोट की नज़दीक की तस्वीरें शेयर पर शेयर हो रही हैं। इस कोट...
    February 2, 11:47 AM
  • ​सीख जो हम बीजिंग से ले सकते हैं..
    देश में हर तरफ विकास की बात हो रही है लेकिन मंजिल अभी दूर है। कुछ मुद्दे ऐसे हैं, जिनका हल हमारे पड़ोसी देश चीन के पास मौजूद है। हाल ही में चीन के बीजिंग शहर की यात्रा के दौरान इसका आभास हुआ। यहां छह साल पहले हुए ओलिंपिक खेलों के लिए बना बर्ड नेस्ट स्टेडियम आज भी पर्यटकों, खिलाडि़यों का स्वर्ग बना हुआ है पर हमारे यहां ऐसा नहीं है... पेकिंग (बीजिंग) में मैं कम से कम दो हजार किलोमीटर दूरी की सड़कों से गुजरा। टैक्सी, बस, पैदल, और सबवे यानी मेट्रो, कई बाग-बगीचे, शॉपिंग मॉल, दर्शनीय स्थल भी बमुश्किल कहीं...
    January 25, 12:00 AM
  • विज्ञापनों में आए औरतों के अच्छे दिन
    विज्ञापनों में महिलाओं की पेशगी या तो बेहद पारंपरिक खाना बनाने वाली, बच्चे पालने वाली, सुघड़, सुशील महिला के रूप में किया जाता रहा है या फिर सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से सफल और सबल महिलाओं को दिखा कर अब विज्ञापन कंपनियां भी उन लाखों महिलाओं तक पहुँचना चाह रही हैं जो बदलते दौर में घर में ही नहीं करियर और समाज में भी ऊंचाइयां छूने लगी हैं। पिछले दिनों एयरटेल ने अपने एक विज्ञापन में महिला की प्रगतिशील छवि को दर्शाया। इस विज्ञापन में एक महिला बॉस ऑफिस में बैठे अपने जूनियर...
    January 18, 09:14 AM
  • सीबीआई, जिसकी लाठी, उसकी भैंस
    सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में सीबीआई द्वारा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को मिली क्लीन चिट के बाद पार्टी की किरकिरी हो रही है। कांग्रेस शासन में भी उसे कांग्रेस ब्यूरो आॅफ इनवेस्टिगेशन तक कहा जाता रहा है। ऐसे में सवाल है कि क्या सीबीआई की नियति इस या उस सत्ताधारी की कठपुतली बने रहना ही है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भ्रष्टाचार के सफाए को लेकर देश में नई आशाएं पल्लवित हुई थीं। यदि एनडीए और भाजपा ने बड़ी संख्या में सांसद जितवाकर दिल्ली भेजे तो उस सफलता में कांग्रेस के दस वर्ष...
    January 11, 12:00 AM
  • मोहब्बत और दिल का रिश्ता
    क्रिसमस हो, ईद हो या होली, दिवाली इन त्योहारों की असली खुशी बच्चों से होती है। लेकिन दुनिया में अभी तक ग़रीबी, ना बराबरी ने बहुत से बच्चों से इन त्यौहारों की खुशियां छीन रखी हैं। क्रिसमस के साथ दुनिया के हर कोने में इस रोज़ ख़ुशियां मनाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। सांता क्लॉज़ जिन्हें बच्चे प्यार से फादर क्रिसमस कहते हैं, उनकी सफेद लंबी दाढ़ी, फुंदे वाली लाल टोपी और गाड़ी में घोड़ों की जगह जुते हुए बारहसिंगे, उनके गले में झूलती घंटियों की टनटनाहट हर बच्चों के कानों में गूंजने लगती हैं। सांता...
    January 4, 10:55 AM
  • संसाधनों पर क्यों नहीं बराबर का हक
    पुरुष-स्त्री असमानता की खाई आज दिनों दिन चौड़ी होती जा रही है। महिलाओं के साथ कहीं कुछ भी घटित हो तो सबसे पहले दोषी उसी को ठहरा दिया जाता है, मान लिया जाता है कि स्त्री का चाल चलन ही ठीक नहीं रहा होगा, इसलिए ऐसा हुआ। पुरुष और समाज कहीं भी उसके साथ खड़ा होते नहीं दिखता। ऐसे में न्याय की उम्मीद वह कैसे कर सकती है? परंपरा, संस्कृति के नाम पर गाहे-बगाहे पुरुष और स्त्री के बीच असमानता साफ देखने को मिल जाती है। तो हम आने वाले साल 2015 या कई आने वाले सालों में स्त्री-पुरुष की समानता की कल्पना कैसे कर सकते हैं?...
    December 28, 09:11 AM
  • बिना भेदभाव की हो शिक्षा
    आने वाला वर्ष कई मायनों में पिछले वर्षों जैसा ही होगा पर देश की बदली राजनीतिक स्थितियों ने नई संभावनाएं और चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। भारत का भविष्य संवारने में जुटे सत्तापक्ष को समझना होगा कि व्यापक जनता से जुड़े कुछ मसले ऐसे हैं जो लगते तो पुराने हैं मगर उनको पूरा करने की जरूरत उतनी ही प्रासंगिक है। ऐसे ही कई अहम सवालों को हम यहां नई रोशनी में रख रहे हैं जिससे देश की व्यापक आबादी का प्रत्यक्ष सरोकार है। - देश का विकास तब ही संभव है जबकि हर बच्चा शिक्षित हो। ऐसे में तीन चुनौतियां अहम हैं... आज...
    December 28, 09:07 AM
  • अपहण नहीं इश्क है!
    शहरों-गांवों से दूर, सांस्कृतिक-धार्मिक सीमाओं से परे यह लड़कियां अपने जीवन साथी का हाथ थामे प्रेम के सारी यातनाएं सहते हुए साझे में सपने देख रही हैं। अपने घरों से दूर, चौखटों के पार वह अपनी दुनिया बनाने के लिए जीवन साथी चुनने के जिद पर अड़ी हैं, अपने अच्छे-बुरे की मालिक होने के गर्व से भरी हैं। मगर आंकड़ों में घर से भागी ये लड़कियां अपहृत हैं। इश्क़ पर जोर नहीं, है ये वो आतिश ग़ालिब कि लगाए न लगे, और बुझाए न बुझे... सैकड़ों साल पहले 18वीं सदी में लिखीं ग़ालिब की ये पंक्तियां आज भी भारत में मोहब्बत...
    December 21, 12:00 AM
  • नौकरी का नया अर्थशास्त्र
    18 दिसंबर : विश्व प्रवासी दिवस रोजी- रोटी के लिए परदेश जाने की परंपरा नई नहीं है, लेकिन वैश्वीकरण के इस दौर में पलायन के अर्थशास्त्र को आयात-निर्यात की तरह देखा जाने लगा है। एक सर्वेक्षण से पता चला है कि पलायन के इस नए अर्थशास्त्र में भारत सबसे आगे है। इसे आर्थिक उदारीकरण का फलसफा कहें या दुनिया के बदलते अर्थशास्त्र का तकाजा अब विश्व बैंक नौकरी/ रोजगार को भी आयात-निर्यात की दृष्टि से देखने लगा है। किसी देश की वित्तीय साख के निर्धारण के दौरान अब विश्व बैंक इस बात को भी ध्यान में रखता है कि उक्त...
    December 14, 12:00 AM
  • पहले कर्तव्य फिर अधिकारों की बात
    केस 1 10 से 15 नवंबर के बीच 13 गरीब आदिवासी महिलाओं की जान डॉक्टरों की लापरवाही से चली गई। यहां इनके बेहतर स्वास्थ्य सुविधा पाने के अिधकार का हनन हुआ। केस 2 मैसूर के कुपेगाला गांव के स्कूल में अभिभावकों ने अपने बच्चों को मिड डे मिल में मिलने वाले खाना खाने से मना कर दिया, क्योंकि वहां खाना बनाने वाला रसोईया एक दलित था। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया खुद इस गांव में पढ़े हैं। केस 3 छत्तीसगढ़, आंध्र, उड़ीसा, तेलंगाना, असम समेत देश के कई राज्यों में नक्सलवाद ने यहां रहने वालों की ज़िंदगी में दहशत...
    December 7, 11:33 AM
  • भोपाल गैस त्रासदी: तीस साल से सालता अन्याय
    हमारे देश में दुनिया के तमाम उद्योगपतियों के मोटे मुनाफे के सामने इंसान को किस क़दर बौना और किस कदर सस्ता बना दिया गया है, यह त्रासदी इस हक़ीक़त का सुबूत है। तीस बरस गुज़र गए और आज भी इस कहानी का कोई अंत नज़र नहीं आता। शायद असल ज़िंदगी में शुरू होने वाली कहानियां असल ज़िंदगी के साथ ही ख़त्म होती हैं। कम से कम भोपाल की इस कहानी की हक़ीक़त यही है। इस कहानी का बीज तो ज़माना पहले पड़ चुका था लेकिन ज़माने पर यह ज़ाहिर हुई 1984 में। दो और तीन दिसम्बर की दरम्यानी रात। रविवार की इस सर्द रात में जब तमाम लोग ठंड से कांपते...
    December 2, 11:59 AM
  • कमाऊ किशोरों की बड़ी होती दुनिया
    पहले माना जाता था कि उम्र गुजरने और बहुत सारा अनुभव लेने के बाद ही समझ विकसित होती है। तब व्यापार जैसे काम में समझ और उम्र की बहुत भूमिका मानी जाती थी लेकिन आजकल इंटरनेट और मीडिया की वजह से आप चुटकियों में जानकारियां, ज्ञान और दूसरों के अनुभवों को बटोर सकते हैं। हमारे देश में एक बहुत पुरानी कहावत है, पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं। इसका जो मतलब समझाया गया है वो ये है कि युवा या प्रौढ़ होकर जो बच्चे कुछ कर सकेंगे, उनके लक्षण बचपन में ही समझ में आने लगते हैं। ये कहावत अपने अर्थ और आशय के साथ अब...
    November 23, 04:00 AM
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