Nov 7th, 2009, 6:40 pm [IST]  
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संडे स्‍पेशल: ‘..रुकावट के लिए खेद है’

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दोस्तो, आज न जाने क्यों यह जुमला बार-बार मेरे कानों में गूंज रहा है- ‘रुकावट के लिए खेद है’। याद आया हमारे अपने, प्यारे दूरदर्शन के पर्दे पर बार-बार उभरने वाला जुमला? 80 के दशक में हिंदुस्तान के हर ख़ास-ओ-आम की जिंदगी में एक अजीब-सा बदलाव लाने वाले दूरदर्शन ने उस दौर में जो-जो कारनामे अपनी रुकावट के लिए लगातार खेद प्रकट करते हुए अंजाम दिए, उन्हें याद करता हूं, तो जी चाहता है कि कह दूं-...

 
 
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‘दुनिया, ये दुनिया.. तूफ़ान मेल’

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आपके साथ ऐसा कितनी बार हुआ है कि आपने जिस चीज को अपनी कच्ची उम्र में महज एक खेल समझा हो और आगे चलकर पता चला हो कि वह दरअसल दुनिया का सच था? मेरे साथ तो कच्ची उम्र से लेकर इस पकी उम्र तक कमोबेश ऐसा होता ही रहा है। और कहूं तो अब भी हो रहा है और इंशा अल्ला होता ही रहेगा। आख़िर को कैरेक्टर भी कोई चीज होती है। ऐसे ही बचपन में एक गीत सुना था ‘दुनिया, ये दुनिया, तूफ़ान मेल’। हम मोहल्ले के छह-आठ बच्चों...
 
 
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‘आ जा सनम मधुर चांदनी में हम..’

सीने कहा है कि ‘मैं जब इस दुनिया में आया, तो इसे देखकर इस क़दर हैरान हो गया कि कई साल तक ठीक से बोल भी नहीं पाया’। हम सबकी भी तो वही कहानी है। इस दुनिया में आंख खुलने के बाद कितने दिन तक घर की दीवारों, मां-बाप के चेहरे, भाई-बहनों की गोद, पड़ोसियों का प्यार, सब कुछ हैरत से देखते ही रहे। संगीत की दुनिया भी इससे कुछ ज्‍यादा अलग नहीं है। मेरे अनुभव से इसमें एक अंतर इतना जरूर है कि इस दुनिया में...
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‘उसकी मुस्कान से उड़ता हूं’

इंदौर. उस गली में मुस्कुराता है एक बच्चा, हर शाम निकलता हूं जब मैं अपने काम पर। उसकी मुस्कान दे देती है मुझे पंख.. कुछ इस तरह उन्होंने कविता शुरू की और सभी को एक बच्चे की मुस्कान से हंसने, खुश होने की प्रेरणा दी। यहां बात हो रही है वरिष्ठ कवि राजकुमार केसवानी की कविताओं की। शनिवार शाम श्री मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति द्वारा उनका एकल काव्य पाठ का आयोजन किया गया। श्री केसवानी ने आम...
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एक सच्ची आत्मा

आज की कहानी असल में आत्मा की कहानी है। एक ऐसी आत्मा की कहानी, जिसने ख़ुद को अपने आराध्य से इतना एकमएक कर लिया कि जब उसकी आवाज निकलती, तो लोग भरम में पड़ जाते कि यह के.एल. सहगल की आवाज है या आत्मा की। इस आत्मा के नाम के आगे दो शब्द और भी जुड़े थे- सी.एच. मतलब चैनानी हशमतराय। पूरा नाम था आत्माराम हशमतराय चैनानी, मगर हमेशा ख़ुद को आत्मा ही माना। इस आत्मा ने सहगल वाले अंदाÊा में जीवन को ढाला, सहगल...
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एक गुंडा जो कवि भी था

बात शुरू करने से पहले एक बात बताना जरूरी समझता हूं। बात ऐसी है कि आज मैं एक गुंडे की बात करने वाला हूं। मतलब वो कोई ऐसा-वैसा गुंडा नहीं था, जो सिर्फ़ सड़कों पर गुंडई करता रहा हो, वह बाक़ायदा कवि भी था। इस गुंडे कवि का एक कविता संग्रह भी प्रकाशित है। नाम बताऊं? नाम है ‘बदमाश दर्पण’। है न बिल्कुल सही, कवि के चरित्र के अनुरूप नाम। इससे पहले कि हम लोग इन गुंडे महाशय की कविताएं पढ़ें, Êारा उनके...
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संगीत और रहमान की जय हो...

एक ऐसे समय में, जब सारी दुनिया जय हो! जय हो! से गूंज रही है, मैं कैसे चुप रह सकता हूं। सो, जय हो! संगीत की जय हो। रहमान की जय हो। गुलज़ार की जय हो और जय हो भारत के उन झुग्गी में रहने वाले मासूम बच्चों की, जिनकी ज़िंदगी उनके अपने लिए तो अक्सर बहुत कुछ ख़ास नहीं कर पाती, मगर कभी ‘सलाम बांबे’ जैसी फिल्में बनवा देती है और कभी ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ की प्रेरणा देती है। जय हो भारत भाग्य विधाता। जय हे, जय...
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अरे पी ले, पी ले हरि नाम का प्याला

आपने यह गीत सुना है- ‘अरे पी ले, पी ले, पी ले-पी ले, हरी नाम का प्याला’? मैं सचमुच यह बात जानने को बेचैन हूं कि आप जब इसे सुनते हैं, तो आपका क्या हाल होता है। क्या? पहले मैं बताऊं ? बिल्कुल मैंने बताने के लिए ही तो बात शुरू की है। मैं यह बताने से पहले यह बताना जरूरी समझता हूं कि मैं कुमार सचिन देव बर्मन के ग़ैर-फिल्मी गीत सुनने के लिए तैयारी क्या-क्या करता हूं। अरे हां, माफ़ कीजिएगा मैंने अभी तक...
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आहें न भरीं, शिकवे न किए...

कभी आपने सोचा कि अगर हमारी दुनिया में फुरसतिए न होते, तो क्या होता? मैंने सोचा तो मुझे फिलहाल तो एक ही बात समझ में आई- शायद लतीफे न होते, चुटकुले न होते, पैरोडी न होती, लफ्फाजियां न होतीं। यानी ढेर सारी खुशी देने वाली बातें न होतीं। फुरसती आदमी की च्क्रिएटिविटीज् की उम्र, मेरे अपने अनुभव के अनुसार, बहुत कम होती है। इसकी वजह शायद यह है कि जिंदगी में खुद फुरसत की उम्र ही बहुत कम होती है।...

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भुलाए न बने...

इंसान, जब सफल हो जाए तो बहुत बड़ा आदमी लगता है। ऐसा लगता है मानो पैदाइश के दिन ही इतना बड़ा पैदा हुआ हो। उस सच की कहानी सुनो, तो कभी-कभी वह बड़ा आदमी और भी बड़ा लगने लगता है। अभी कुछ दिन पहले ही जब अपने काग़जों को खंगाल रहा था, तो 1955 की च्फिल्मफेयरज् पत्रिका का एक अंक हाथ आ गया। इस अंक में संगीतकार सचिन देव बर्मन का लिखा एक लेख था, जिसमें उनके फिल्मी दुनिया में अपने संघर्ष के दिनों और उनसे...
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दीवार-ए-कहकहा

इस दुनिया में एक ऐसी दीवार भी है, जिसको देखने वाला खिलखिलाकर हंसने लगता है। एक मिनट..आप मेरा चेहरा देखना चाहते हैं कि मैं खुद हंस रहा हूं क्या? अरे हां! इसमें छिपाने की क्या बात है। हंस रहा हूं। मैंने अगर दीवार नहीं देखी, तो मैं हंसूंगा ही नहीं क्या? मुझे तो इस विचार भर से हंसी आ जाती है। मगर मैं फिर से कह रहा हूं कि मैंने किसी फ़साने में या किसी और जगह यह पढ़ा है कि चीन में कहीं एक ऐसी दीवार...
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एक था शेख़ मुख्तार

इन दिनों पाकिस्तान में महेश भट्ट की फिल्म ‘आवारापन’ को लेकर हल्ला मचा हुआ है। एक पाकिस्तानी फिल्म निर्माता यूनुस मलिक ने अदालत में शिकायत की है कि सरकार ने क़ानून तोड़कर एक हिंदुस्तानी फिल्म को रिलीज करने की इजाजत दी है। याद रहे कि 1965 से वहां भारतीय फिल्मों के रिलीज पर पाबंदी लगी हुई है। यह ख़बर पढ़ते ही मुझे बेसा़ख्ता एक भूले-बिसरे कलाकार की याद आ गई- शेख़ मु़ख्तार की, जिसकी फिल्म...
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.. कभी नाम तो लो

सिनेमा का माध्यम दिखने और दिखाने का है। जो दिखता है, वही बिकता है और वही पहचाना और पूजा जाता है। फिल्म में सितारों के नाम के साथ ही संगीत निर्देशक और गायक का नाम तो आ जाता है, लेकिन वे सैकड़ों म्यूजीशियन बेनामो-निशां रह जाते हैं, जो बजाते तो संगीतकार के नोटशन के हिसाब से हैं, मगर अंदाज होता है अपना-अपना। अभी कुछ दिन पहले ही एक ऐसे सितारे का अस्त हुआ है, जिसने अपनी उंगलियों के कमाल से न...
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