संडे स्पेशल: ‘..रुकावट के लिए खेद है’
दोस्तो, आज न जाने क्यों यह जुमला बार-बार मेरे कानों में गूंज रहा है- ‘रुकावट के लिए खेद है’। याद आया हमारे अपने, प्यारे दूरदर्शन के पर्दे पर बार-बार उभरने वाला जुमला? 80 के दशक में हिंदुस्तान के हर ख़ास-ओ-आम की जिंदगी में एक अजीब-सा बदलाव लाने वाले दूरदर्शन ने उस दौर में जो-जो कारनामे अपनी रुकावट के लिए लगातार खेद प्रकट करते हुए अंजाम दिए, उन्हें याद करता हूं, तो जी चाहता है कि कह दूं-...
‘दुनिया, ये दुनिया.. तूफ़ान मेल’
‘आ जा सनम मधुर चांदनी में हम..’
‘उसकी मुस्कान से उड़ता हूं’
एक सच्ची आत्मा
एक गुंडा जो कवि भी था
संगीत और रहमान की जय हो...
अरे पी ले, पी ले हरि नाम का प्याला
आहें न भरीं, शिकवे न किए...
कभी आपने सोचा कि अगर हमारी दुनिया में फुरसतिए न होते, तो क्या होता? मैंने सोचा तो मुझे फिलहाल तो एक ही बात समझ में आई- शायद लतीफे न होते, चुटकुले न होते, पैरोडी न होती, लफ्फाजियां न होतीं। यानी ढेर सारी खुशी देने वाली बातें न होतीं। फुरसती आदमी की च्क्रिएटिविटीज् की उम्र, मेरे अपने अनुभव के अनुसार, बहुत कम होती है। इसकी वजह शायद यह है कि जिंदगी में खुद फुरसत की उम्र ही बहुत कम होती है।...
भुलाए न बने...
दीवार-ए-कहकहा
एक था शेख़ मुख्तार
.. कभी नाम तो लो









