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ताजुल मसाजिद

ताजुल मसाजिद के मायने होते हैं-मस्जिदों का ताज। दिल्ली की जामा मस्जिद की हूबहू यह नकल एशिया की छठीं सबसे बड़ी मस्जिद में शुमार है। लेकिन यदि क्षेत्रफल और मूल नक्शे के लिहाज से देखें, तो बकौल इतिहासविद अख्तर हुसैन-‘यह दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिद है।’ सिकन्दर बेगम ने इस मस्जिद को तामीर करवाने का ख्वाब देखा था। दरअसल सन् 1861 के इलाहाबाद दरबार के बाद जब वह दिल्ली गर्इं, तो उन्होने पाया कि दिल्ली की जामा मस्जिद को ब्रिटिश सेना की घुड़साल में तब्दील कर दिया गया है। उन्होंने अपनी वफादारियों के बदले अंग्रेजों से इस मस्जिद को हासिल किया और खुद हाथ बंटाते हुए इसकी सफाई करवाकर शाही इमाम की स्थापना की। इस मस्जिद से प्रेरित होकर बेगम ने भोपाल में भी ऐसी ही मस्जिद बनवाना तय किया। सिकन्दर जहां का ये ख्वाब उनके जीते जी पूरा न हो पाया, तो उनकी बेटी शाहजहां बेगम ने उसे साकार करने का बीड़ा उठाया। ध्वनि तरंग के सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए 21 खाली गुब्बदों की एक ऐसी संरचना का मॉडल तैयार किया गया कि; मुख्य गुंबद के नीचे खड़े होकर जब ईमाम कुछ कहेगा तो उसकी आवाज पूरी मस्जिद में गूंजेगी। शाहजहां बेगम ने इस मस्जिद के लिए विदेश से 15 लाख रुपए का पत्थर भी मंगवाया किन्तु, इसमें अक्स दिखता था, लिहाजा मौलवियों ने इसके इस्तेमाल पर रोक लगा दी। हालांकि शाहजहां बेगम का ख्वाब भी अधूरा ही रह गया, क्योंकि गाल के कैंसर के चलते उनकी असामयिक मृत्यु हो गई। इसके बाद सुल्तानजहां और उनके बेटा भी इस मस्जिद का काम पूरा नहीं करवा सके। आज जो ताजुल मसाजिद हमें दिखाई देती है, उसे बनवाने का श्रेय मौलाना मुहम्मद इमरान को जाता है, जिन्होने 1970 में इसे मुकम्मल करवाया।

Address: गांधी मेडिकल कॉलेज के सामने, भोपाल।

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