तहजीब, संस्कृति और विरासत का शहर
Source: नासिर फराज Designation: मशहूर शायर और फिल्म गीतकार
|
मैं अकसर अपने दोस्तों से मिलने भोपाल आता रहता हूं। कभी-कभार जब कहीं मुशायरे के सिलसिले में यहां से गुजरना होता है, तब भी भोपाल में रुकना सुकून देता है। मुंबई मेरी कर्मस्थली है। लिहाजा वहां रहना आवश्यकता है, लेकिन यदि कोई मेरी ख्वाहिश पूछे, तो मैं भोपाल में बसना चाहूंगा।
मैं नहीं, यह सब कहते हैं कि भोपाल में कुछ बात तो है, जो एक बार यहां आये-वो बार-बार आने की तमन्ना रखता है। मेरे कई मित्र इस शहर में रहते हैं। मैं उनसे पूछता हूं कि आखिर इस शहर में ऐसा क्या है, जो दुनियाभर के लोगों के दिलों में यूं रच-बस जाता है, मानो उनका जन्म-जन्मांतर का नाता हो? वे मेरे सवाल पर मुस्कराते हैं और सिर्फ इतना कहते हैं-यहां की माटी में तहजीब रची-बसी है, संस्कृति में अपनापन है, विविधताओं के रंग हैं और विरासत ऐसी कि, जिस पर हम गर्व कर सकें।
मेरे नजरिये से भी भोपाल वाकई नवाबी शहर है। यहां के विरासतों में ही नहीं, लोगों की बातचीत में भी नवाबी शान-ओ-शौकत दिखाई देती है। समय के साथ बदलाव आना स्वाभाविक बात है। नई चीजें दुनिया में आ रही हैं। लोगों का रहन-सहन बदल रहा है। खान-पान, जीने के तौर-तरीकों में परिवर्तन आ रहा है, लेकिन मैंने देखा है कि पुराने भोपाल में अभी भी पुराना समय दौड़ रहा है। वही पटिया संस्कृति, पान की गुमठियों पर खड़े होकर गपियाना और फुर्सत के पलों में अपनी खुली जीप में बैठकर बड़े तालाब या दूसरे अन्य खूबसूरत स्थलों की ओर सैर-सपाटे के लिए निकल पड़ना।
यह शहर सिनेमा और दूसरी सभी कलाओं को खूब जीता है। यहां लगातार रंगमंच की गतिविधियां होना, फिल्में बनना और अन्य कला-आयोजन होते रहना, यह साबित करता है कि भोपाल के लोग व्यस्त जिंदगी के बीच से कुछ पल निकालकर जीना जानते हैं। मैं जब भी यहां के बड़े तालाब को देखता हूं, तो यूं लगता है गोया, यह एक बड़ी नदी है, जो अमन-चैन, खुशहाली और तहजीब का संदेश अपनी उछाल भरती धाराओं से शहर के कौने-कौने में प्रसारित कर रही है।
बस यहां के लोगों की कुछ आदतें खलती हैं। वो यह कि भोपाल की विरासत को बचाए रखें, इस खूबसूरत शहर को गंदा न करें। यह हमारा अपना शहर है, इसकी विरासत बचाना, तहजीब बचाना और संस्कृति बचाना हमारा परम कर्तव्य होना चाहिए।
बहरहाल, मौका मिलता रहेगा और मैं भोपाल आता रहूंगा। क्योंकि यह शहर-अपना-सा लगता है।