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सारे रंग घुलते-मिलते देखे भोपाल में

 
Source: डॉ. अर्चना मुखर्जी     Designation: लेक्चरर फाइन आर्ट
 
 
 
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http://unified.bhaskar.com/city_blogger_author_images/thumb_image/100066_thumb.jpg भोपाल को तालों की नगरी कहा जाता है। ये वो ताल हैं, जो वर्षों से भोपालवासियों को एक सूत्र में पिरोये हुए हैं। बगैर किसी भेदभाव के लोगों को पानी पिला रहे हैं, उन्हें सैर-सपाटे के लिए आमंत्रित कर रहे हैं।


भोपाल के सामाजिक ढांचे को बैलेंस करने में धर्म-जातियों को बड़ा योगदान रहा है। लेकिन हम उन्हें भी याद रखें, तो बेहतर होगा, जो पुरुष-स्त्री तो नहीं हैं, लेकिन भोपाल के अमन-चैन और खुशहाली के लिए इनकी दुआयें हमेशा काम करती हैं। हम भोपाल में बसे किन्नरों की बात कर रहे हैं। हिंदू और मुस्लिम धर्मों के सामन्जस्य से महकते भोपाल की एक पहचान यहां का किन्नर समुदाय भी है।

मेरे मस्तिष्क पटल पर आज भी वो घटना ताजी है। बसंत पंचमी के पावन पर्व पर जब में नवविवाहिता होकर अपने बाबुल का घर छोड़कर ससुराल आई थी। शंख ध्वनि से मेरा स्वागत किया गया। मेरे आगमन के तुरंत बाद दरवाजे पर किन्नरों ने दस्तक दी। मेरी मात्रतुल्या सासू मां ने मुझे अपनी नवीनतम साड़ी के साथ मुहमांगी इनाम राशि उन्हें देने के लिए निर्देशित किया। मेरे लिए ये घटना बड़ी अचरज पैदा करने वाली थी।
समय गुजरता गया और अगले बसंत ने करवट ली। घर में नन्हे शिशु यानी मेरे बड़े बेटे की किलकारिया गूंज उठीं। पुन: दरवाजे पर उनके की दस्तक सुनाई दी। मां ने फिर उनकी खुशी-खुशी अगवानी की।


अब में भी ससुराल में अपनी जगह बना चुकी थी। मैंने साहस कर मां से इनके आत्मीय स्वागत का रहस्य पूछ ही लिया। तब मां ने मुझे जो घटना बताई,मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं था..!
मेरी माताजी अपने जमाने की उच्चकुलीन, सुशिक्षित उच्च व्यक्तित्व की धनी थीं। उन्होंने बताया की अजमेर के मेयो कॉलेज से जब वह इंग्लिश ओनर्स कर रही थीं, तभी उनकी एक प्रतिभाशाली सहपाठी को अचानक एक दिन कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया। कारण जो सामने आया वो यह था कि वह छात्रा किन्नर समाज से थी। मां की आंखों के पोर भीग चुके थे। आगे वे बोलीं कि, मासूम सी वह भोली लड़की रोती हुई जब गई,पूरा कॉलेज स्तब्ध रह गया।
मुझे मेरे प्रश्न का जवाब मिल चुका था। शायद यही मानवीय संवेदनाएं मां के मुख-मंडल की आभा का रहस्य थीं, जो उनके अंतिम दिवस तक रहीं।
बात थोड़ी पारिवारिक हो गई है। विषय पर लौटती हूं। मेरे शहर भोपाल के अमन-चैन में एक बहुत बड़ी भूमिका किन्नर समाज की दुआओं की भी है।


हो सकता है कि कुछ किन्नर हमारी खुशियों के दौरान जोर-जबर्दस्ती से पैसा वसूलने की कोशिश करते हों, लेकिन ज्यादातर हमारी खुशहाली के लिए दुआयें भी तो मांगते हैं। इसलिए हमें उनके प्रति बुरी भावना नहीं रखनी चाहिए।
 

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