गलियों और गप्पों का शहर भोपाल

 
Source: राजेश जोशी     Designation: लोकप्रिय कवि
 
 
 
| Email  Print Comment
 
 
 
 
http://unified.bhaskar.com/city_blogger_author_images/thumb_image/100121_thumb.jpg यह गलियों का शहर है और गप्पों का। न कहीं गलियां खत्म होती हैं, न कहीं गप्पें। एक गली में से दूसरी गली निकलती है और फिर वह किसी तीसरी गली में खुल जाती है। मतलब यह कि गलियों का ऐसा जाल कि कहने वाले कहते हैं कि गलियों ही गलियों में घूमते हुए आप पूरा शहर छान सकते हैं। और गप्पों का सिलसिला चल निकले तो न जाने कितनी रातें रतजगा करते हुए बीत जाएं।


अगर आप साठ के दशक में हमारे भोपाल में आए होते, उस समय यहां एक ही सवारी थी-तांगा, आप किसी भी तांगे पर बैठते या कितने ही तांगों पर बैठते, हर तांगे वाला यही बताता कि नया दौर की शूटिंग में जो तांगा यूसुफ भाई.. नई समझे! याने अपने दिलीप साहब ने चलाया था, वो तांगा यही था। इसके बाद आपके ठिकाने के आने तक वह दिलीप साहब के न जाने कितने मनगढ़ंत किस्से आपको सुना डालता।


भोपालियों में किस्से बनाने का हुनर भी है और किस्से सुनाने का हुनर भी है। कई किस्से तो बकायदा इतिहास की किताबों में अपनी जगह बना चुके हैं। भोपाल क्योंकि मालवा के पूरब से सटा है, फिर दोस्त मोहम्मद के आने से पहले का कोई विश्वसनीय इतिहास भी मौजूद नहीं है। इसलिए इसे राजा भोज के नाम से जोड़ा जाना लाजिमी था।


खींचतान कर एक तर्क गढ़ा गया कि पहले इसका नाम भोजपाल रहा होगा। जो बाद में चलकर भोपाल हो गया। एक किस्सा बना तो दूसरा किस्सा बनना ही था। कहा जाता है कि एक रात राजा भोज अपने महल की छत पर लेटा था तभी उसने चांद को दो टुकड़े होते देखा। इसके बाद राजा भोज ने इसका मतलब समझने के लिए अरब तक अपने दूत भेजे। दूतों ने आकर जो बात बताई, कहते हैं कि उसके बाद राजा भोज ने इस्लाम कबूल कर लिया। शाहजहां बेगम ने अपनी किताब में इस किस्से का हवाला दिया है, पर साथ ही यह भी कि इस वाकिये की तारीख का पता नहीं चलता। अब किस्सों की भी भला कोई तारीख होती है।
 
आपके विचार
 
अपने विचार पोस्ट करने के लिए लॉग इन करें

लॉग इन करे:
या
अपने बारे में बताएं
 
 

दिखाया जायेगा

 
 

दिखाया जायेगा

 
कोड:
6 + 10

 
विज्ञापन

बड़ी खबरें

 

रोचक खबरें

 

बॉलीवुड

 

जीवन मंत्र

 
 

क्रिकेट

 

 

जोक्स

 

पसंदीदा खबरें

 
 
| Glamour
-->

फोटो फीचर