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फ्रेंच-इंडो आर्किटेक्चर का नमूना सदर मंजिल

 
Source: अलीम बजमी     Designation: पत्रकार और लेखक।
 
 
 
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http://unified.bhaskar.com/city_blogger_author_images/thumb_image/100155_thumb.jpg फ्रेंच और मुगल स्थापत्यकला के बेजोड़ नमूने के रूप में कायम है सदर मंजिल।


अपने विशाल आकार और नक्काशी के कारण सैलानियों के बीच यह आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। इस इमारत का मेहराबदार दरवाजा और झरोखे, दालान इसके वैभव का प्रतीक है। इसका बगीचा और फौव्वारा राजसी ठाठबाट को दर्शाता है तो दूसरी मंजिल का बड़ा गलियारा और दालान सर्द मौसम, बारिश के लुत्फ के ताल्लुक को बयां करता है। इमारत की भीतर से खासियत इसके बड़े-बड़े हाल और ताकदान हैं। नवाब हमीदुल्ला खां के जमाने से यहां म्युनिस्पिल का दफ्तर है। इसे पूर्व में बल्दिया कहा जाता था।



सदर मंजिल में सागौन के तीस फुट ऊंचे दरवाजे की खासियत यह है कि अकेला आदमी इसको न तो बंद कर सकता है और न ही खोल सकता है। दरवाजे के ऊपर बने झरोखे से प्रवेश करने वाला व्यक्ति दिखाई देता है। यहां पूर्व महापौर विभा पटेल के कार्यकाल में सुरक्षा की दृष्टि से सीसीटीवी कैमरे भी लगाए गए हैं, जो अब भी चालू हैं।




इमारत में दाखिल होते ही दाए और बाए तरफ बगीचा है तो बीच में एक फौव्वारा बना हुआ है, जो अब भी चालू है। इसके आगे सेहन और दालान है। इस दालान को दरबार हाल के नाम से भी जाना जाता है। यहां नवाबी दौर का प्लेटफार्म भी है। इसकी खासियत यह थी कि दरबार में जब नवाब सुल्तान जहां बेगम यहां अपने तख्त पर बैठती थीं, तब उनके ताज में जड़े हीरों का प्रतिबिम्ब हाल में दिखाई देता है। इंटैक संचालक मीरादास के मुताबिक दरबार हाल में खास किस्म के प्लास्टर के कारण यह दृश्य नजर आता था और दरबार हाल की भव्यता, इसमें किए गए मिरगान (स्वर्ण धातु के रंग) का काम है।



गौरतलब है कि नगर-निगम की पूर्व प्रशासक रश्मि अरुण शमी ने निजी रुचि लेकर इसका सौंदर्यीकरण कराया था। इसके लिए राज्य पुरातत्व विभाग की सलाह पर इंटैक को सौंदर्यीकरण की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसके लिए पांच लाख रुपए भी इंटैक को दिए गए थे। शायर नसीम अंसारी बताते हैं कि नवाब शाहजहां बेगम के दौर में इस इमारत का निर्माण वर्ष 1864 के दौरान शुरु हुआ। नवाब सुल्तान जहां बेगम के दौर में सदर मंजिल समेत पांच महलों का निर्माण हुआ था इन्हें हमीद मंजिल, शौकत महल, शीशमहल, हमीदिया मदरसा स्कूल और जीपीओ बिल्डिंग के नाम से जाना जाता है।





इन सभी में गलियारों के भीतर से आवाजाही का रास्ता है। हमीद मंजिल को अपना रहवास बनाने वाली खुद नवाब सुल्तान जहां बेगम दरबार हाल में खुसूसी रास्ते से आती थी। यह रास्ता करीब छह दशक पहले बंद हो चुका है। नवाब सुल्तान जहां बेगम दरबाल हाल में ब्रिटिश आफीसर समेत अन्य राजे-रजवाड़ों की शख्सियतों और आम लोगों से मिलती थी। वर्ष 1999 में इस इमारत को टाउन हाल बनाने के लिए तत्कालीन महापौर उमाशंकर गुप्ता ने प्रयास किए थे।
 
  
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