सरकती, सिसकती, घिसटती जिंदगी
Source: भगवान उपाध्याय Designation: पत्रकार और लेखक।
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2-3 दिसंबर 1984 की वह सर्द रात। नार्थ टीटी नगर भोपाल के तिमंजिला मकान की दूसरी मंजिल का कमरा। कमरे की खिड़की पुराने शहर की तरफ खुलती थी। सड़क पर शोरगुल मचा तो रात के ढाई बजे नींद खुली। रजाई के अंदर दुबक कर सो रहे थे, तब तक तो ठीक था। जैसे ही रजाई से बाहर मुंह निकाला और आंखें खोली तो जलन और खांसी का दौर शुरू हो गया।
भाइयों के साथ घर के बाहर निकले, पता नहीं जल्दबाजी में घर का ताला भी लगाया था या नहीं, सड़क पर आ गए और जिधर भीड़ भाग रही थी, उसी दिशा में भागने लगे। खैर, यह अकेले मेरी नहीं, शहर के लाखों लोगों की हालत थी। गमों की वह रात आज भी याद आती है तो सिहर उठते हैं हम। अगले दिन स्कूल जाते समय अपने एक दोस्त की मां का सड़क पर शव देखा। पता चला कि रात में बदहवास हालत में भागते वक्त वे गिर गई थीं, भीड़ इतनी थी कि लोगों के पैरों ने उन्हें उठने का मौका ही नहीं दिया। इस घटना के बाद स्कूली दोस्तों ने फैसला लिया कि हमीदिया अस्पताल चलकर कुछ काम तलाशते हैं। वहां लगातार तीन दिन तक जो काम किया, उसका शब्दों में वर्णन करना उचित नहीं लगता।
पिछले 28 सालों से छलनी सीने में अपनों को खोने का दर्द और राहत की तमाशाई तस्वीर लेकर लाखों लोग सरकती, सिसकती और घिसटती जिंदगी जी रहे हैं। जेपी नगर, राजेंद्र नगर, छोला, द्वारका नगर, अशोका गार्डन जैसे इलाकों के लोगों ने गैस त्रासदी का जो दर्द भोगा है, उसे न तो अब तक सच्चे अर्थों में जुबान मिल सकी है और न ही मरहम। इलाज के प्रयोग, बीमारी की खोज और गैस के असर पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए लेकिन वास्तविक पीडि़तों को मुआवजे के नाम पर सिर्फ ठगा ही गया है। कानूनी लड़ाई अपनी जगह है लेकिन जितनी शिकायतें अपनों से है, उतनी अमेरिकीयों से नहीं। यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन ने जो रकम दी थी, वह मुआवजे के तौर पर पूरी बांटी ही नहीं गई। अपनों ने ही ऐसा नहीं होने दिया। करोड़ों खर्च कर भोपाल मेमोरियल अस्पताल बना दिया लेकिन वहां इलाज किसे नसीब हो रहा है? वास्तविक गैस पीडि़तों को वहां धक्के खाते और भटकते अक्सर देखा जा सकता है। करोड़ों की मशीनें अभी भी ताले में बंद पड़ी हैं। उन्हें चलाने वाले ही नहीं मिल सके सरकार को।
राहत के नाम पर राज्य सरकार, केंद्र सरकार, अमेरीकी सरकार से लेकर अन्य कई संस्थानों से करोड़ों रुपए मिले, कहां गए, कोई खबर नहीं। कोई बहीखाता नहीं। खा गए। जीम गए कफन का पैसा भी। डकार गए, मगर डकार भी नहीं ले रहे। डॉक्टरों ने गुमटी को अस्पताल में बदल लिया, अफसरों ने जमीनें खरीद ली, नेता मालामाल हो गए, गैस पीडि़त वहीं के वहीं रह गए। जांच करा लीजिए। मुआवजा भी चेहरा देखकर बांटा गया। बड़े लोगों को ज्यादा। तिल-तिलकर मर रहे गैस पीडि़तों को राई जैसा। फर्जी गैस पीडि़त भी लूट ले गए। उनके मददगार बने सरकारी नुमाइंदे। जांच करा लीजिए। कुछ गैस पीडि़तों के अगुआ बने तथाकथित समाजसेवियों की भी जांच होनी चाहिए। किसके लिए लड़ रहे थे..? क्या पाया...? जेब खाली थी। अब गले तक भर गए हैं।
हे ईश्वर, परमेश्वर... ऐसी त्रासदी कहीं भी, कभी भी न हो। लोग मर जाते हैं, पीडि़त भोगते रह जाते हैं और भला हो जाता है ईमान गिरवी रखने वालों का। ईमान के लिए आपकी कसम खाई जाती है, इसलिए आपको कसम है, कसम से ऐसी त्रासदी कहीं न हो।