समुद्र की थाह और भावों का विस्तार था उनके गायन में
Source: Devesh varma Designation: पत्रकार
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अबके बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें.. खरज के शांत सुरों की माला में पिरोए हुए उनके शब्द दिल को छू लेते हैं। उनके गायन में समुद्र सी थाह और भावों का अनंत विस्तार था। उन्होंने जितना गाया, जैसा गाया, वह एक शब्द में यदि बांधा जाए तो वह है च्कमाल"। सुरों की दुनिया के अनन्य बादशाह थे, हैं और रहेंगे मेहंदी हसन।
झुंझनू के पास लूणा गांव में जन्मे मेहंदी अपनी मिट्टी से 1947 के बंटवारे के दौरान अलग हुए लेकिन उसकी खुसूसियत हमेशा उनके दिल में बसी रही।
22 फरवरी 2012 को लूणा में उनके शिष्य तबलानवाज उस्ताद तारी खां जब इंदौर के आरिफ शाह के साथ पहुंचे तो बड़ी इज्जत से मिट्टी को माथे पर लगाया। गजल की बारहखड़ी उन्होंने मेहंदी हसन से सीखी थी। मेहंदी हसन के इस गांव में ठाकुर साहब नाम से जाने जाने वाले मित्र ने उन्हें बताया कि मेहंदी और वे घने रिश्तों वाली दोस्ती के वाहक रहे हैं। मेहंदी को गाना अच्छा लगता था और वे उन्हें गजलें लिखकर देते रहे।
मेहंदी का जीवन मुसीबतों का पिटारा भी रहा। पाकिस्तान में साइकिल की दुकान से लेकर कार मैकेनिक के रूप में भी उन्हें संघर्ष करना पड़ा। संगीत की तालीम उन्होंने पिता उस्ताद अजीम खान और चाचा उस्ताद इस्माइल खान से ली। ये दोनों ही ध्रुपद गायक थे। उनके परिवार में 16 पीढ़ी से संगीत की सेवा की जाती रही। 1957 में रेडियो पाकिस्तान से उनकी गाई एक ठुमरी प्रसारित की गई और फिर संगीत का कारवां चल पड़ा। मेहंदी हसन को उर्दू शायरी में बहुत दिलचस्पी थी और वहीं से उन्होंने रेडियो पाकिस्तान के दो प्रोडच्यूसर्स जेड ए बुखारी और रफीक अनवर की मदद से गजलें गाना शुरू कीं। रफ्ता-रफ्ता वो सबकी हस्ती का सामां हो गए गजल ने उन्हें ऊं चाई प्रदान की। भारत में जगजीत सिंह, हरिहरन और तलत अजीज उनके शिष्य थे।
उनके गानों में रफ्तार वाली गायिकी के साथ सुरों की पहुंच क्लिष्ट गानों को भी आसान बना देती थी। शास्त्रीयता का निर्वाह कर मेहंदी हसन ने फिल्मी गीतों को भी नया रंग दिया। उनके गाने क्लासेस और मासेस तक आसानी से पहुंच पाए। १९८७-८८ में लता अलंकरण समारोह के दौरान वे भारत और खासकर राजस्थान के प्रति अपने प्रेम को जाहिर करने से रोक न सके। संगीत के प्रति अपनी संजीदगी को उन्होंने अल्लाह की इबादत बताया।
इंदौर के आरिफ शाह ने कहा कि मेहंदी हसन जी की बहुत इच्छा थी कि वे भारत आते खास तौर पर अपने गांव लूणा देखना चाहते थे। लूणा में 22 फरवरी को ही उस्ताद तारी खां की गायकी में सजी गजल गुंचा ए शोख लगा है खिलने.. फिर तुझे याद किया है दिल ने.. मेहंदी हसन ने अपने मोबाइल पर खुद सुना और कहा आरिफ को शिष्य जरूर बनाना। उसमें समझ अच्छी है।
उनकी शायरी का चयन और गजल तक पहुंचने का आलम कुछ अलग हुआ करता था। धीमी, शांत समुद्र की लहरों की अठखेलियां उनके गले में सजे शास्त्रीय अंदाज में संवरती और सुनने वालों की दिलों की गहराई में बस जाती। गजल में न गाए हुए शब्द भी श्रोताओं को समझ की ऊंचाई तक ले जाने को मजबूर करते और हमेशा न गाकर भी मेहंदी शब्दों की सरलता को प्राणवान बना देते।