भगवान बचाए इन चटोरों को
Source: Dr. Sanjay vaid Designation: Suprientendent T.B. Hospital
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इंदौर के लोगों कि खूबियां यदि गिनानी हों तो मिलनसारिता, नेकनीयती आदि के अलावा जो गुण उभरकर सामने आता है वो है खाउपन। यहाँ के लोगों में पेटू होने का दुर्गुण नहीं बल्कि उत्तम और स्वादिष्ट खाने के शौकीन होने का सदगुण है। उत्कृष्ट स्वाद और बेहतरीन क्वालिटी के खाने के साथ ही अलग-अलग फ्लेवर वाकई इंदौरी लोगों की दीवानगी का कारण है। पहले परंपरागत पकवान घरों में पकाए जाते थे , अब बाहर खाने का चलन बढ़ गया है। किसी भी कोने में चले जाइये स्वादिष्ट मेनू के साथ खोमचे ,ठेलो से लगाकर सितारा हैसियत तक के रेस्त्रां और होटलें मौजूद हैं लेकिन जब एक डाक्टर की नजर ले कर शहर से गुजरता हूँ, तो हैरत होती है कि स्वाद के शौकीनों को आखिर क्या परोसा जा रहा है ?अब देखिये चाट पकौड़ी के लिए मशहूर छपप्पन दुकान , आनंद बाज़ार , मल्हारगंज , राजवाडा या अन्नपूर्णा कहीं भी चले जाइए युवा लोग चटखारे ले कर पानीपुरी लीलते दीख पड़ेंगे। मुझे लगता है कि पकौड़ी वाले भैया के हाथों में भरे हुए टाईफाइड , पीलिया और अन्य कीटाणु भी पकौड़ी के साथ लोगों के पेट में विराजमान होते जा रहे हैं। इमली की चटनी और तीखा पानी एसिडिटी कि पताका थामे हैं सो अलग। इस काम के लिए समोसे कचोरी आलू चाट आदि भी पीछे नहीं है ! कई बार मिल क्षेत्र के साधारण तबके के बाज़ार से गुजरता हूँ तो विभिन्न रंग बिरंगी मिठाइयों पर नादान बच्चे टूटे पड़े रहते हैं , पर ये अबोध कौन सा मावा किन जहरीले रंगों से सना हुआ खा कर इतने खुश हो रहे हैं ये खुद नहीं जानते। जो मिठाइयाँ बड़े स्टोरों में ४००/-,६००/- रु. किलो तक है वो यहाँ १५०/- २००/- रु, में उपलब्ध है। बड़ी दुकाने क्वालिटी के नाम पर जेब पर डाका डाल रही हैं तो यहाँ किफ़ायत के नाम पर सेहत से खिलवाड़ किया जा रहा है ! सस्ते दूषित मावे से ये मिठाइयां किन परिस्थियों में बनाइ जा रही हैं उसका जिक्र भी करना पाप है! हर मौसम में सेहत से खिलवाड़ के नए खिलाड़ी मौजूद हैं। गर्मियो में हर गली मोहोल्ले में पाच दस रु. में पायनापल ,चीकू, मोसंबी आदि के जूस मिलते हैं ! इस भाव में फलो के रस ? दुकानों के सामने कार का शीशा चढ़ाकर बहाने से नज़र रखता हूँ, तो सचाई सामने आ जाती है । नाम मात्र के फल का टुकड़ा खराब दूध और ढेर सारी खराब बरफ। इंदौर में बरफ कैसे बनती है, जानते हैं न आप? ये बरफ नाले के पानी से बनी है या किसी स्वर्ग वासी का बदन ठंडा कर के आई है , आप कभी नहीं जान सकेंगे। ठेलों पर बिकने वाली कुल्फी या गन्ने का रस , ठेले देखता हूँ, तो जहर बुझे तीर दिखाई देते हैं! बारिश में जगह-जगह मूंग के भजिये बनते हुए दिखेंगे ! मुझे अचरज होता है कि कढ़ाई में डाले जा रहे तेल पर ग्राहक नज़र क्यों नहीं डालते ? खालिस काले रंग का कई बार उपयोग किया हुआ , ना जाने कौन सा तेल आप के मंगोड़े तल रहा है . मेरा तो सारा कोलेस्ट्राल ज्ञान धरा रह जाता है ! जाड़ो में गजक खाते समय ध्यान रखिएगा इसमें स्वाद कि रौनक बनाने वाले के पसीने आदि से बढाई गई है, इसके अलावा ठण्ड में गराडू या भुट्टे का किस खाते देखता हूँ, तो लोगो पर दया आती है ! सब्जियां लाना घर में मेरा काम नहीं है , पर पत्नी के साथ सब्जियां खरीदते समय गाडी में बैठ कर नजर डालता हूँ तो उनके ताजेपन , और हरेपन पर निहाल हो जाता हूँ। घर पर आकर जब सब्जियां धुलती हैं तो उन पर चढ़े कृत्रिम जहरीले रंगों के साथ मेरी ख़ुशी भी बह जाती है। जी हां इंदौर में सब्जियों पर हरा रंग पोत कर उन्हें ताजा दिखा कर ज्यादा दाम में बेचीं जाती हैं। एक जारुक पत्रकार ने तो इसकी मुकम्मल खोजबीन करके जांच भी कि थी परन्तु दो चार छापे-वापे पड़े फिर पहले जैसी हरियाली छा गई। ये जानना जरुरी है कि ये केमिकल रंग न केवल लीवर किडनी नष्ट करते हैं बल्कि विभिन्न केंसर के भी वाहक होते हैं। साधारण जगह ही नहीं बड़े होटलों का हाल भी कुछ जुदा नहीं है मैंने देर शाम को अच्छे- अच्छे होटलों में वो सब्जियां आते देखी है जिन्हें दिन भर हर ग्राहक ने ठुकरा दिया था कई बार तो इन्हें गाय - बैलों ने भी नकार दिया होता है। लेकिन अगले दिन जब एसी हाल में फर्नीचर के बीच सूटधारी वेटर बेहतरीन करी के साथ इन्हें परोसता है तो आप तारीफ़ के पुल बांधते नहीं थकते ! सोचता हूं कहाँ कहाँ नज़र नहीं डालू ? मंदिरों में प्रसाद तक अछूते नहीं रहे ! प्रशासन कई बार नामी मंदिरों के परिसरों में सड़ा मावा और दूषित लड्डू पकड़ चुका है पर नतीजा वही ढाक के तीन पात । बच्चों के गोली बिस्किट और दुधमुंहे बच्चो का दूध तक मिलावट कि भेंट चढ़ चुका है। समझ नहीं आता मुनाफा खोरी कि ये प्रवृत्ति कहां तक जाएगी? लाभ कमाने और जहर बेच कर लूटने में कब फर्क रेखांकित होगा ? ईश्वर सद्बुधी दे और बीमारियों से अगली पीढ़ी को बचाए। आमीन