गुम हो गई सुबह-शाम की पहचान
Source: Navneet Gurjar Designation: पत्रकार व ब्लॉगर
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जैसे नानीबाई के मायरे में जिन-जिन लोगों ने कपड़े-लत्तों के लिए ताने मारे थे, कृष्ण ने उन सबके सिरों पर गठरियां-पोटलियां दे मारी थीं। वैसे ही लंबे सूखे के बाद बादलों ने बीते तीन दिनों में चुन-चुनकर गांवों-कस्बों-शहरों पर बारिशों की बाल्टियां उलट दी है।
गोरी, सफेद पगडंडियों के मुंह पर कोई कालिख पोत गया है। जहां पानी भरा पड़ा है, लगता है उन खेतों की हरियाली पर सफेदा पोत दिया गया हो। ...और जो खेत ढलान पर हैं। पानी नहीं है, फसलों को देख लगता है हरियाली अभी-अभी ब्यूटीपार्लर से आई हो।
नदियां अपनी हदें पार कर इठला रही हैं और उनसे घिरे गांव जैसे गांव नहीं, पुरानी-मटमैली संदूकों में बंद पोटली हो गए हो।
शहरों की सड़कें ज्यादा नहीं बदलीं। वैसी ही हैं, लेकिन दौड़ते वाहनों को चुर्र-चुर्र की अजीब-सी आवाजें निकालकर चिढ़ा रही हैं। जैसे गांवों में बच्चे पीछे से पिचकारियां मारकर आते-जाते को चिढ़ाते हैं। गाडिय़ों के टायर पानियों के कुल्ले कर रहे हैं।
सूरज रूई का फोया हो गया है। गहरे, काले बादलों ने उसे धुन दिया है। तीन दिन से रूठे, दुबके-बैठे सूर्य ने सुबह, दोपहर और शाम, तीनों के दरवाजे से उनके नामों की तख्तियां हटा दी हैं। पहचान गुम हो गई है। कोई अंतर नहीं लगता। सुबह कौन है, शाम कौन और कहां है दोपहर...?