तर्कों के आइने में पौराणिक पात्र
Source: Navneet Gurjar Designation: पत्रकार व ब्लॉगर
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पौराणिक पात्रों के दिलचस्प तार्किक रूप समय-समय पर सामने आए हैं।
ब्रह्म पुराण के गौतम-अहिल्या वृतांत में वर्णन है कि एक बार जब गौतम तीर्थ दर्शन को गए तो इंद्र उन्हीं का रूप धारण कर अहिल्या के पास पहुंच गए। तभी गौतम आए और उन्होंने अहिल्या और इंद्र को शाप दे दिया। इसी प्रतीकात्मक गाथा को तार्किक रूप में विद्वानों ने कहा- गौतम किरण -विज्ञान के पहले ज्ञाता थे। वे अंधेरे के पार जा सके। अंतर को रोशन कर सके। तम से पार पा सके, इसलिए गौतम नाम हुआ... अहिल्या का अर्थ है- जो हिल न पाए। यह एक रासायनिक पदार्थ था, गौतम ऋषि की प्रयोगशाला में।
इंद्र सूर्य मंडल के अंतर की एक किरण का नाम है। वही किरण प्रयोगशाला में आई, तो खोज का काम आगे बढ़ा।
इसी तरह राधा-कृष्ण के प्रेम को लीजिए। तार्किक दृष्टि से राधा कौन है? भक्ति की जो धारा कृष्ण तक जाती है, वही अपने चरम पर पहुंच कर यानी कृष्ण से मिलकर उलटी बहती है तो राधा हो जाती है। धारा का उलटा राधा ।
ऐसे ही तर्क रावण के बारे में हैं। रावण के पिता ऋषि विश्रवा ने सोचा भी नहीं होगा कि वे दस पुत्रों का बल, बुद्धि और तार्किक शक्ति जिस एक पुत्र में चाहते थे, उसे युगों-युगों तक लोग इस तरह जलाएंगे-फूंकेंगे। हर दशहरे पर रावण को जला रही आग, हवा की तरह दांतों में कंघी रख, आवाज किया करती है। कुछ फटी-फटी, भीनी-भीनी। बालिग होते लड़कों की आवाज की तरह। कहीं-कहीं आस-पास खड़े रावणों को फूंक रही आग तड़-तड़ की ऊंची आवाज में बात करती है जैसे- देहात के दो दोस्त अचानक मिलकर गांवभर का हाल पूछा करते हैं।
दरअसल तर्क कहता है रावण यानी अहम्। अपने भीतर का मैं। अहंकार। जलाना-फूंकना इसे चाहिए। हो सकता है जलाने की परंपरा यही मानकर किसी विद्वान ने शुरू की होगी। लेकिन समय बीतते यह केवल भौतिक रूप में बची रह गई। अंतरमन से इसका ज्यादा वास्ता नहीं रहा।
आज हालत यह है कि रावण हर गली, सड़क, चौराहे, मोहल्ले में जलता है। रामलीला में रुचि घट गई। राम का पात्र निभाने वालों का मिलना भी मुश्किल हो चला है।