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क्या नकलबंदी, रोमियोबंदी व पीकबंदी सांप्रदायिक है?

अंकुर चौहान | Apr 01, 2017, 07:27 IST

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क्या नकलबंदी, रोमियोबंदी व पीकबंदी सांप्रदायिक है?
बोर्ड परीक्षाओं में नकल, मनचलों की सरेआम युवतियों से छेड़छाड़ और भद्‌दी छींटाकशी, सड़कों में गड्‌ढे, सरकारी कार्यालयों में पान और गुटके की पीक, अवैध मीट की दुकानें, एवं भ्रष्टाचार से जमा की गई काली कमाई- ये समस्याएं ऐसी हैं, जो आम आदमी वर्षों से बर्दाश्त करता आया है। उत्तर प्रदेश में सालो-साल कांग्रेस एवं अन्य क्षेत्रीय दलों की सरकार रही लेकिन, उन्होंने बोर्ड परीक्षाओं में नकल की धांधली को कभी सख्ती से नहीं लिया और यही कारण है की आज मोबाइल से वीडियो बन जाने और फोटो खींच जाने से न घबराते हुए नकल से पास करने का कारोबार धड़ल्ले से चल रहा है।

कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों से मूल रूप से भिन्न तथा सांप्रदायिक दल होने का दंश झेलने वाली भाजपा के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने पहली बार 1991-92 में नकलचियों की धरपकड़ कर उन्हें जेल में ठूंस दिया था लेकिन, उनके बाद उत्तर प्रदेश में जितने मुख्यमंत्री बने उन्होंने नकलचियों को वोट बैंक बनाने के लालच में उन पर कोई अंकुश नहीं लगाया। नकल करने वाले ये युवक वही होते हैं, जो दिनभर सड़कों पर युवतियों के साथ छेड़छाड़ करते नज़र आते हैं और परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर सरकारी नौकरियों के लिए लाखों रुपए रिश्वत में देकर पैसे और पहुंच के बल पर शैक्षिक रूप से योग्य युवक-युवतियों की नौकरी छीन लेते है।

उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जहां एक तरफ एंटी-रोमियो दस्ता बनाकर इन युवाओं की धरपकड़ कर रहे है, वहीं दूसरी तरफ नकल जैसी दीमक को देश के सबसे बड़े प्रदेश से निकाल फेंककर काबिलियत को सम्मान प्रदान कर रहे है। यदि यह कहें कि वे प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छ और भ्रष्टाचार मुक्त भारत के सपने को अपने क्रियाकलापों से नई उड़ान देते भी दिख रहे हैं तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। हालांकि, विचार का विषय यह है कि क्यों विपक्षी दल, भाजपा और उसके नेताओं के नकलबंदी, नोटबंदी, मीटबंदी, रोमियोबंदी और पीकबंदी जैसे देशहित के फैसलों में केवल साम्प्रदायिकता ढूंढ़ते हैं?
अंकुर चौहान, 28
रिसर्च स्कॉलर, आईआईएम, रोहतक
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Web Title: ankur chauhan editorial
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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